काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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तथा स्निडोस१ (Cnidos) नामक तीन सम्प्रदाय थे, जिनमें पाथागोरस के समकालीन डेमोकेडिस (Democedes) आदि बहुत से विद्वान् वैद्य२) थे। भारत पर उनके प्रभाव के विषय में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। ये सम्प्रदाय भी हिपोक्रिटस से अधिक से अधिक सौ वर्ष पूर्व३ ही थे। इससे अधिक प्राचीन प्रतीत नहीं होते हैं। इन सम्प्रदायों में से भी एक तो वही मन्त्रप्रधान सम्प्रदाय ही प्रतीत होता है। शेष दोनों में दार्शनिक विषय मिला हुआ। भारत से ग्रीस में अध्यात्म विद्या ले जाने वाले पाथागोरस के समकालीन होने से, उसके साथ संबन्ध होने से तथा पाथागोरस के संबन्ध में वर्णन करने वाले उन दोनों पूर्व सम्प्रदायों में भी कहीं-कहीं भारतीय विषय का सम्पर्क दिखाई देने से उनमें ग्रीक प्रभाव तथा उतना विज्ञान का संबन्ध नहीं मिलता है। सुसानगर के कारागार में दासों के साथ बन्दी हुए डेमोकेडिस द्वारा घोड़े से गिरने से टूटी हुई इरानदेश के राजा की टांग को बिना शस्त्रों के ही यथास्थान जोड़कर अच्छा कर देने से भाग्य से यश४ के मिलने पर भी तद्विषयक वर्णन में शस्त्र आदि उपकरणों की पूर्णता के अभाव५ का उल्लेख होने से उस समय तक ग्रीस में शस्त्र क्रिया की अपूर्णता का ज्ञान होने से प्रतीत होता है कि उस समय ग्रीक वैद्यक अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी। यदि ग्रीस में प्राचीन काल से ही चिकित्सा विज्ञान प्रौढ़रूप में विद्यमान होता तो उसके बाद हिपोक्रिटस को चिकित्सा विज्ञान के पिता (Father of Medicine) के पद पर आरूढ़ न किया जाता। हिपोक्रिटस को उस पद पर आरूढ़ करने से उस समय ग्रीक वैद्यक की शैशवावस्था प्रतीत होती है। उस समय ग्रीस देश में यदि भैषज्य विद्या उन्नत अवस्था में होती तो ग्रोटस६ नामक विद्वान् द्वारा मिश्र देश की भैषज्य विद्या के विषय में पाथागोरस के विस्मय का उल्लेख न होता। इसलिये पाथागोरस के विस्मय से यह सूचित होता है कि उस समय अन्य देशों के द्वारा कास आदि स्थानों में विज्ञानयुक्त भैषज्य विद्या के नवोत्थान के होने पर भी मिश्र देश के समान उन्नत अवस्था नहीं थी। प्रो. ओसलर७ (Osler) नामक विद्वान् का भी कहना है कि ग्रीस में विज्ञान युक्त चिकित्सा ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी से ही प्रारम्भ हुआ है। हिपोक्रिटस से पूर्व के इन सम्प्रदायों में भी भारतीय चिकित्सा के समान दार्शनिक विषयों का सम्मिश्रण तथा भारतीय शब्दों की छाया आदि भारतीय विज्ञान के चिह्न मिलने हैं। मिश्र देश में ग्रीस देश से पूर्व चिकित्सा विज्ञान के मिलने से तथा ग्रीस देश पर मिश्र के प्रभाव का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि ग्रीसदेश ने चिकित्सा विज्ञान मिश्र८ से
१. इन दो सम्प्रदाओं के अतिरिक्त एक और भी प्रसिद्ध सम्प्रदाय स्निडोस में था। 'उग्ररूपों में पथ्य नामक हिपोक्रिटस की रचना में इसके सिद्धान्तों का खण्डन है। (Hipporates VoI. I Introduction p. 13)
२. २-३ तक की टि. सं. उपो. पृ. १२२ में देखें।
४. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२२ में देखें।
५. यद्यपि वह शल्यक्रिया के साधनों (उपकरणों) से सम्पन्न नहीं था। फिर भी पहले वर्ष में ही वह इतना सफल हुआ कि उस द्वीप के निवासियों ने उससे समझौता कर लिया कि वह एक टेलेण्ट के वेतन पर वहां एक वर्ष तक रहेगा। (लगभग ३८३ स्टलिंग=एक इजिनियन टेलेन्ट) (History of Greece Vol. IV P. 180-181 Grotes.)
६. पाथागोरस के समय मिश्र की वैद्यक की इतनी उन्नति हो गई थी कि एक जिज्ञासु यात्री का ध्यान आकृष्ट कर सके। उसके सिद्धान्तों का श्रेणीकरण और विभाजन हो गया था। उनके चिकित्सा व्यवसाय के नियम निर्धारित हो गये थे।
(Herodotus II 84 History of Greece Vol. IV P. 395 by Grotes.)
७. शास्त्रीय ओषधियों का—जो कि धर्म और विज्ञान के संमिश्रण का परिणाम है—उद्गम छठी सदी ई. पू. के यूनानियों की प्रतिभा और सामाजिक अवस्था है। (Osler) देखिये—(The Surgical Instruments. of the Hindus
Vol. I P. 329. G. N. Mukhopadhyay.)
८. नील की घाटी और मेसोपोटमिया दोनों में ही चिकित्सा शास्त्र जादू टोने और विज्ञान का संमिश्रण था। इस प्रणाली का यूनान पर बहुत पूर्वकाल में ही प्रभाव पड़ गया था। (E. R. E. Vol. VI. P. 541 by E. Thramer