भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद२९५

में न मिलने तथा रूपान्तरित अवस्था में मिलने का ज्ञान होता है। यदि उसके नाम से मिलने वाले सब ग्रन्थ उसके द्वारा लिखे हुए तथा उसी काल के होते तथा ग्रीस में उसके ग्रन्थों का उसी के समय से ही प्रचार भी होता तो प्लेटो तथा अरिष्टाटल द्वारा भैषज्य तथा आध्यात्मिक विषयों में इसके नाम के निर्देश की तरह प्लेटो के टिभियस नामक ग्रन्थ में तथा ग्रीस के अन्य प्राचीन विद्वानों के ग्रन्थों में भी उसके भैषज्य ग्रन्थों के प्रचार के संबन्ध में बहुत कुछ उल्लेख मिलना चाहिये था। यदि चिकित्सा विज्ञान के पिता समझे जानेवाले हिपोक्रिटस के सम्प्रदाय का अपने देश में ही विशेषरूप से प्रचार होता तो उसके बाद के व्यक्ति भैषज्य विद्या में विशेषता प्राप्त करने के लिये मिश्र देश में न जाते। हिपोक्रिटस के बाद ३८२-३६४ ईस्वी पूर्व में यूडाक्सस (Eudoxas) नामक विद्वान् द्वारा मिश्रदेश में जाकर १५ मास तक हेलियोपोलिस नामक स्थान के एक भिषक् पुरोहित से भैषज्य विद्या के अध्ययन का वर्णन इतिहास में मिलता १ है। पूर्वकाल के समान बाद में भी ग्रीसवालों का चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिये मिश्रदेश में जाने से उस समय तक भी ग्रीस में मिश्र देश का प्रभाव प्रकट होता है।

अपने सम्प्रदाय के प्रचार के लिये स्नीडस (Cnidos) अथवा मतान्तर से कास (Cos) नामक स्थान के रहने वाले हिपोक्रिटस के पूर्व पुस्तकालय को जलाने के अभियोग से तथा विद्यावृद्धि के लिये युवावस्था में ही अपने स्थान को छोड़कर दूसरी जगह चले जाने का इतिहास मिलता २ है। अपने मुख्य स्थान पर रहकर उसके प्रचार की सुविधा नहीं थी। उस समय मुद्रण कला आदि का अभाव होने से आजकल के समान प्रचार की सुविधा नहीं थी। इधर उधर मिलने वाले बहुत से प्रतीक लेखों के अनुसार प्राचीन काल में अध्ययन तथा अध्यापन ही प्रचार के साधन मिलते हैं। ग्रीस तथा अलेक्जेण्ड्रिया में किये गये उसके प्रचार अथवा कार्पस का संग्रह मिल जाता तो ग्यालन की दृष्टि का बहिर्भाव न होता तथा उसे केवल एशिया माइनर और सिसली से ही ढूंढने का प्रयत्न भी न किया जाता। लिटरे ३ का भी यही कथन है। ग्रीस के बाहर मिश्र देश में ईस्वी पूर्व तृतीय शताब्दी वाले एण्ड्रीयस नामक विद्वान् तथा रोमदेश में ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी के एस्किलपियाडिस (Asclepiades) नामक विद्वान् हिपोक्रिटस के विरोध ४ में अपना कार्य करते हुए प्रतीत होते हैं। लिटरे का कहना है कि कास नामक स्थान में हिपोक्रिटस सम्प्रदाय के पुस्तकालय के होने का प्रमाण भी नहीं मिलता है। लिटरे के अनुसार (Hippocrates Vol PP. XXVIII-XXIX) कार्पस संग्रह के १०० से ३०० वर्ष के अन्दर ग्यालन की व्याख्या के बाद वह संग्रह हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार रूपान्तरित अवस्था में इधर-उधर विद्यमान उसके नाम से मिलने वाले सब ग्रन्थों का ग्यालन द्वारा संकलन करने से, इनमें से कुछ ग्रन्थों की व्याख्या करने


१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. ११५-११६ में देखें।
२. (a) इस प्रकार यह निश्चित प्रतीत होता है कि हिपोक्रिटस ने अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही अपने देश को सदा के लिये छोड़ दिया था। Vita ने इसके तीन विभिन्न कारण दिये हैं—
स्वप्न मिला हुआ आदेश, २-ज्ञानवृद्धि करने की उसकी अदम्य अभिलाषा, ३-उस पर लगाया हुआ यह इलजाम कि उसने निडिया (Cnidia) के पुस्तकालय को जलाया था। (E. R. E. Vol VI P. 51 E. thramer)
(b) हिपोक्रिटस के पुराने जीवन वृत्तान्त में एक किस्सा मिलता है कि उसने नीडोस के इसीप्रकार के एक अन्य किस्से के अनुसार कास (Cos) के 'आरोग्यमन्दिर' के पुस्तकालय को जला डाला ताकि वह उस पुस्तकाय में संगृहीत ज्ञान का एक मात्र ज्ञाता होने का पूरा लाभ ले सके। (Hippocrates Vol I P. XXIX)
४. केरिस्टस (Carystus) के एण्ड्रियस (Andreas)—जो ई. पू. तीसरी सदी के अन्तिम चरण में मिश्र में चिकित्सा करता था और बिथिनिय (Bithynia) निवासी एस्कलीपीडियस (Asclepiades) जो पहली सदी ई. पू. में रोम में चिकित्सा करता था—ये दोनों उसके कट्टर निन्दकों में थे। इन दोनों ही का कोई ग्रन्थ आजकल नहीं मिलता है। (E. B. Vol XI P. 584)


२० का.सं.