भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७५

अष्ट सप्त त्रिधा चैषां क्रमाद्भेदः प्रवक्ष्यते। सत्त्वानां, सत्त्वविज्ञानं हितमौषधकल्पने।।

इन सत्त्वों के क्रमशः आठ, सात और तीन भेद होते हैं अर्थात् श्रेष्ठ (शुद्ध) सत्त्व के ८ भेद, मध्य (राजस) सत्त्व के ७ भेद तथा अधम (तामस) सत्त्व के ३ भेद होते हैं। औषध कल्पना में सत्त्व का जानना हितकर होता है।

तपःसत्यदयाशौचदानशीलरतं समम्। ज्ञानविज्ञानसंपन्नं ब्राह्मं विद्याज्जितेन्द्रियम् ।।

शुद्ध सत्व के भेद—१. ब्राह्मसत्त्व—ब्राह्मसत्त्व से युक्त व्यक्ति तप, सत्य, दया, पवित्रता, दान तथा शील से युक्त, सम (सब प्राणियों में सम दृष्टि रखने वाला), ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त और जितेन्द्रिय होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—शुचिं स याभिसन्धं जितात्मान संविभागिनं ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसम्पन्नं स्मृतिमन्तं कामक्रोधलोभमानमोहेर्ष्याहर्षामर्षोपेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ।। सुश्रुत. शा. अ. ४ में भी कहा है—शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुल्पूजनम्। प्रियातिथित्वमिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ।।

प्रजावन्तं क्रियावन्तं धर्मशीलं जगत्प्रियम्। अनीर्ष्यमशठं प्राज्ञः प्राजापत्यं वदेच्छुचिम् ।।

२. प्राजापत्य सत्त्व—प्राजापत्य सत्त्व वाला व्यक्ति प्रजा (सन्तान) युक्त, क्रियाओं (यज्ञ आदि कों) को करने वाला, धर्मशील (धार्मिक), जगत्प्रिय (सम्पूर्ण जगत् जिसको प्रिय है अथवा जो सम्पूर्ण जगत् को प्रिय है), ईर्ष्या रहित, शठता (दुष्टता) रहित तथा पवित्र होता है ।।

शौचव्रतेज्याध्ययनब्रह्मचर्यदयापरम्। जितमानमदक्रोधं वक्तारं चाषमादिशेत् ।।

३. आर्षसत्त्व—शौच, व्रत, इज्या (यज्ञ), अध्ययन, ब्रह्मचर्य तथा दया से युक्त, मान (अहंकार) मद, तथा क्रोध को जिसने जीत लिया है तथा जो वक्ता है वह आर्ष सत्त्व होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—इज्याध्ययनव्रतहोमब्रह्मचर्यपरमतिथिव्रतमुपशान्तमदमानरागद्वेषमोहेलोभरोषणं प्रतिभावचनविज्ञानोपधारणशक्तिसम्पन्नमार्षं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम्। ज्ञानविज्ञानसम्पन्नमृषिसत्त्वं नरं विदुः ।।

त्रिवर्गनित्यं विद्वांसं शूरमक्लिष्टकारिणम्। प्राहुरैन्द्रं महाभागमधिष्ठातारमीश्वरम् ।।

४. ऐन्द्रसत्त्व—ऐन्द्रसत्त्व वाला व्यक्ति त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ तथा काम) में लगा हुआ, विद्वान्, शूरवीर, निन्दित कर्म न करने वाला, महाभाग (महात्मा), अधिष्ठाता (स्वामी) तथा ऐश्वर्ययुक्त होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वान शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लिष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—माहात्म्यं शौर्यमाशा च सतत शास्त्रबुद्धिता। भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ।।

त्यक्तदम्भभयक्रोधं प्राप्तकारिणीमीश्वरम्। समं मित्रे च शत्रौ च याम्यं विद्यात् सुनिश्चितम् ।।

५. याम्यसत्त्व—जिसने दम्भ (अहंकार), भय तथा क्रोध का त्याग कर दिया है, जो प्राप्तकारी (युक्त कार्य करने वाला) ऐश्वर्यशाली, मित्र तथा शत्रुमें समान व्यवहार करने वाला तथा सुनिश्चित (दृढ़निश्चयी) व्यक्ति है—वह याम्यसत्त्व वाला होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—लेखास्थवृतं प्राप्त कारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्यालम्बिनं व्यपगतरागद्वेषमोहं याम्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—प्राप्तकारी दृढ़ोत्थानो निर्भयः स्मृतिमान् शुचिः। रागमोहमदद्वेषैर्वर्जितो याम्यसत्त्ववान् ।।

अशुचिविशुचिः शूरः शीघ्रक्रोधप्रसादवान्। पुण्यशीलो महाभागो वारुणो वरुणप्रियः ।।

६. वारुणसत्त्व—जो व्यक्ति अशुचि, विशुचि, शूर, शीघ्र ही क्रुद्ध एवं शीघ्र ही प्रसन्न होने वाला, पुण्यशील, महाभाग (महात्मा) तथा वरुणप्रिय है—वह वारुणसत्त्व होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं