काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ७६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लक्षणाध्यायः २८] |
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यज्ज्वानमम्भोविहाररतिमक्लिष्टकर्माणं स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्गल्यं परिकेशता। प्रियवादित्वमित्येतद्वारुणं कायलक्षणम्।
स्थानमानपरीचारधर्मकामार्थलोभिनम्। क्रोधप्रसादफलदं कौबेरं प्राहूरूजितम् ।।
७. कौबेरसत्त्व—जो व्यक्ति स्थान (भूमि-मकान आदि), मान (आदर), परिचार (सेवा), धर्म, काम तथा अर्थ (धन) का लोभी अर्थात् स्थान, मान आदि का इच्छुक हो, जिसका क्रोध एवं प्रसाद (प्रसन्नता) फलप्रद हो अर्थात् क्रोध एवं प्रसाद निरर्थक न हो तथा बलवान् हो—वह कौबेरसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—स्थानमानोपभोगपरिवारसम्पन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं शुचिं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात्॥ सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयौः। महाप्रसवशक्तित्वं कौबेर कायलक्षणम्॥
श्लोकाख्यानेतिहासज्ञं गन्धमाल्याम्बरप्रियम्। नृत्तगीतोपहासज्ञं गान्धर्वं सुभगं विदुः ।।
८. गान्धर्वसत्त्व—जो व्यक्ति श्लोक, आख्यान (कथा) तथा इतिहास का जाननेवाला है, गन्ध (इत्र आदि) माला तथा वस्त्रों का प्रेमी है, नृत्य गीत तथा उपहास का ज्ञाता एवं ऐश्वर्यशाली है—वह गान्धर्वसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—प्रियनृत्यगीतवादित्रोल्लापकं श्लोकाख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलं गन्धमाल्यानुलेपनवसनस्त्रीविहारनित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात्॥ सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—गन्धमाल्यप्रियत्वं च नृत्यवादित्रकामिता। विहारशीलता चैव गान्धर्व कायलक्षणम्॥
ये चान्येऽपि शुभा भावाः शुद्धास्ते चापि सात्त्विकाः।
एतत् कल्याणभूयिष्ठं शुद्धं सत्त्वमिहाष्टधा ।।
इसके अतिरिक्त अन्य भी जो शुभ एवं सात्त्विक भाव होते हैं वे शुद्ध कहलाते हैं। इस प्रकार यह कल्याण अंश की प्रधानता वाला शुद्ध सत्त्व ८ प्रकार का कहा है।
वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में सात्त्विक या शुद्ध सत्त्व के ७ भेद दिये गये हैं। उनमें प्राजापत्य सत्त्व का उल्लेख नहीं है। चरक. शा. अ. ४ में कहा है—इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात् कल्याणांशत्वात्, संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत्॥ इन सातों सात्त्विक सत्त्वों में से भी ब्राह्मसत्त्व शुद्धतम जानना चाहिये। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—सप्तैते सात्त्विकाः कायाः—॥
आरोग्यं प्रशमो रूपं ज्ञानविज्ञानमार्यता। दीर्घमायुः सुखात्यक्तं सामान्यं शुद्धलक्षणम् ।।
शुद्ध सत्त्व के सामान्य लक्षण आरोग्य, शान्ति, रूप, ज्ञान, विज्ञान, आर्यता (स्वामित्व), दीर्घायु, सुख की प्राप्ति ये शुद्ध सत्त्व के सामान्य लक्षण हैं॥
ईश्वरोऽसूयकश्चण्ड आत्मपूजोपधिप्रियः। सानुक्रोशभयो रौद्रो हन्ता शूरस्तथाऽऽसुरः ।।
राजस सत्त्व के भेद—१. आसुर सत्त्व—ऐश्वर्यशाली, दूसरों के गुणों में दोषारोपण करने वाला, तीव्र क्रोधवाला, आत्मपूजा (अपनी प्रशंसा करने वाला अथवा अपनी ही आहार आदि के द्वारा पूजा करने वाला—स्वार्थी) तथा उपधिप्रिय (रागद्वेष अथवा छल-कपट का प्रेमी), अनुक्रोश (दया) तथा भय से युक्त, रौद्र (भीषण या उग्रस्वभाव), हत्या करने वाला तथा शूरवीर व्यक्ति—आसुर सत्त्व होता है। चरक. शा. अ. ४ में कहा है—शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजकमासुरं विद्यात्। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम्। एकाशिनं चौदरिकमासुरं सत्त्वमीदृशम्॥