काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७७
क्रूरच्छिद्रप्रहारी च रोषेर्ष्यामर्षसन्ततः । वैरमांसाशनायासः १ कलहार्थी च राक्षसः ।।
२. राक्षस सत्त्व—जो व्यक्ति क्रूर, छिद्रप्रहारी (अवकाश अथवा दुर्बलता पाकर प्रहार करने वाला), क्रोध, ईर्ष्या, एवं अमर्ष (असहिष्णुता-क्षमा न करना) से युक्त, वैर करनेवाला, मांस खाने वाला तथा कलहप्रिय (झगड़ालू) है, वह राक्षससत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—अमर्षिणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमामिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमीर्षुं राक्षसं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—एकान्तग्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाह्यता । भृशमात्मस्तवश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ।।
शुचिद्विड्शुचिः क्रूरोऽभीरुर्भीषयिताऽऽविलः । मद्यमांसप्रियः शङ्की पैशाचो बहुभोजनः ।।
३. पैशाचसत्त्व—जो व्यक्ति पवित्रता से द्वेष करने वाला, अपवित्र, क्रूर, अभीरु (जो डरपोक न हो), दूसरों को डराने वाला, कलुषित, मद्य तथा मांस का प्रेमी, शङ्का (सन्देह) करने वाला, तथा बहुत भोजन करने वाला है—वह पैशाच सत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—महालसं स्त्रैणं स्त्रीरहस्काममशुचिं शुचिद्वेषिणं भीरुं भीषयितारं विकृतविहाराहारशीलं पैशाचं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रियता तथा । स्त्रीलोलुपत्वं नैर्लज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ।।
तीक्ष्णमायासबहुलं निद्रालुं बहुवैरिणम् । अक्रुद्धभीरुं स्त्रैणं च सार्पं नित्यौष्ठलेहिनम् ।।
४. सार्पसत्त्व—जो व्यक्ति तीक्ष्ण, बहुत परिश्रमी, बहुत सोने वाला, बहुत समय तक वैर रखने वाला, अक्रुद्धभीरु२ (जब तक क्रुद्ध न हो तब तक डरपोक), स्त्री के वश में रहने वाला, सदा होठों को चाटने वाला अथवा सदा खाते रहने वाला है—वह सार्पसत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—क्रुद्धं शूरमक्रुद्धभीरुं तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहारपरं सार्पं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—तीक्ष्णमायासिनां भीरु चण्डं मायान्वितं तथा । विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ।।
दानशय्यात्यलङ्कारपानभोजनमैथुनैः । नित्योपेतं प्रमुदितं याक्षं विद्यात् प्रभक्षणम् ।।
५. याक्षसत्त्व—नित्य दान, शय्या (शयन), अतिअलंकार (आभूषण अथवा सजावट), अतिपान, अतिभोजन तथा अतिमैथुन में लगा हुआ, प्रसन्न तथा खूब खाने वाला व्यक्ति याक्षसत्त्व कहलाता है ।।
अहङ्कृता महाहारा वैरिणो विकृताननाः । विरूपा विकृतात्मानो भूतसत्त्वा निशाप्रियाः ।।
६. भूतसत्त्व—जो व्यक्ति अहंकारी, बहुत खानेवाले, वैरी, विकृत मुख (चेहरे) वाले, विकृतरूप वाले तथा विकृत आत्मा वाले हैं तथा जिन्हें रात्रि प्रिय है—वे भूतसत्त्व वाले होते हैं । चरक तथा सुश्रुत में इसे प्रैतसत्त्व नाम से कहा गया है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलोलुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—असंविभागमलसं दुःशीलमसूयकम् । लोलुपं चाप्यदातारं प्रतसत्त्वं विदुर्नरम् ।।
अमर्षिकुत्सिताहारवाग्द्यूतं नित्यशङ्कितम् । चलं दुर्मेधसं भीरुं शाकुनं विद्ध्यनोकसम् ।।
७. शाकुनसत्त्व असहिष्णु, कुत्सित (निन्दित) आहार तथा निन्दित वाणी में लगे हुए (अर्थात् निन्दित आहार एवं निन्दित शब्दों का प्रयोग करने वाले) नित्य शंका (सन्देह) करने वाले, चल (अस्थिर मति), कुण्ठित बुद्धि वाले तथा भीरु एवं जिसके रहने का स्थान ठीक तरह से निश्चित न हो ऐसे व्यक्ति को शाकुन सत्त्व कहते हैं । चरक शा. अ. ४
१. वैरे मांसाशने च आयासो यस्येत्यर्थः ।
२. यावन्नक्रुध्यति तावद्भीरुरित्यर्थः ।