काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लक्षणाध्यायः २८]
में कहा है—अनुषक्तकाममजस्त्रमाहारविहारपरमनवस्थितममर्षिणमसंचयं शाकुनं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्त्राहार एव च। अमर्ष णोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम्॥
इत्येतद्राजसं सत्त्वं सप्तधा क्रोधकारितम्। व्यामिश्रगुणदोषं च रज एवोपलक्षयेत्।।
इस प्रकार क्रोध से उत्पन्न होने वाला राजससत्त्व सात प्रकार का है। इनमें गुण एवं दोषों के मिले होने से इन्हें राजस ही समझें।
वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में राजससत्त्व के ६ भेद दिये हैं, उनमें याक्षसत्त्व नहीं दिया है। चरक में कहा है—इत्येतवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विधं भेदांशं विद्यात् रोषांशत्वात्। सुश्रुत में भी कहा है—"षडेते राजसाः कायाः"।।
आहारमैथुनपरं स्वप्नशीलममेधसम्। अथैवं पाशवं विद्यान्मृजाऽलङ्कारवर्जितम्।।
तामस सत्त्व के भेद १. पाशव सत्त्व—सदा आहार तथा मैथुन में लगे हुए, अत्यधिक सोने वाले, निन्दित अथवा कम बुद्धिवाले, शुद्धि तथा अलंकार (आभूषण या सजावट) से रहित व्यक्ति को पाशवसत्त्व जानें। चरक शा. अ. ४ में कहा है—निराकरिष्णुमवमवेशं जुगुप्सिताचाराहारं मैथुनपरं स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्नमैथुननित्यता। निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः।।
भीरुमप्रज्ञमाद्यूतं कामक्रोधवशं गतम्। हिंस्रमात्मपरं विद्यान्मात्स्यं सुप्रजसं शठम्।।
२. मात्स्य सत्त्व—भीरु, मूर्ख, आद्यून¹ (बहुत खाने वाला पेटू), कामी तथा क्रोधी (काम तथा क्रोध में लगा हुआ) हिंसक, आत्मपर (सदा अपने में ही लगा रहने वाला—दूसरों की परवाह न करने वाला), अधिक सन्तान वाला तथा धूर्त व्यक्ति मात्स्यसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्तकामक्रोधं सरणशीलं तोयकामं मात्स्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—अनवस्थितता मौर्ख्यं भीरुत्वं सलिलार्थिता। परस्पराभिमर्दश्चमत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्।।
बधबन्धपरिक्लेशशीतवातातपक्षकम्। बुद्धयङ्गहीनमलसं वानस्पत्यं वदेदृजुम्।।
३. वानस्पत्य सत्त्व—वध, बन्धन, दुःख, सर्दी, वायु तथा धूप को सहने वाले, बुद्धि तथा अङ्गों से हीन, आलसी तथा ऋजु (सरल-सीधे सादे) व्यक्ति को वानस्पत्य सत्त्व कहते हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—एकस्थानरतिर्नित्यमाहारे केवले रतः। वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकायार्थवर्जितः॥
इत्येतत्त्रिविधं सत्त्वं तामसं मोहसंभवम्। यच्चामेध्यमकल्याणं सर्वं तच्चापि तामसम्।।
इस प्रकार मोह से उत्पन्न यह तीन प्रकार का तामससत्त्व कहा है। और जो कुछ भी अपवित्र तथा अकल्याणकारी होता है वह सब तामस कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—इत्येवं खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविधं भेदांशं विद्यान्मोहांशत्वात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा॥
सत्त्वं प्रकाशकं विद्धि, रजश्चापि प्रवर्तकम्। तमो नियामकं प्रोक्तमन्योन्यमिथुनप्रियम्।।
सत्त्व गुण प्रकाशक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रकाशित अर्थात् विशद करने वाला है), रजोगुणप्रवर्तक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रवृत्त करने वाला—गति देने वाला है) तथा तमोगुण नियामक (नियन्त्रण करने वाला) होता है। ये तीनों परस्पर एक दूसरे को प्रिय होते हैं अर्थात् ये तीनों परस्पर संयोग से कार्य करते हैं। सांख्यकारिका में कहा है—
१. 'आद्यूनः स्यादौदरिकः' इत्यमरः।