भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७९


सत्त्वं लघुप्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः । गुरुवरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः ।। प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणाः ।

यदा यच्चाधिकं यस्य स देही तेन भावितः । शुभाशुभान्याचरति फलं भुङ्क्ते तथाविधम् ।।

जिस व्यक्ति में जिस समय जिस सत्त्व की अधिकता (प्रधानता) होती है वह उसी के अनुसार शुभ एवं अशुभ आचरण करता है। तथा उसी के अनुसार (वैसा ही) वह फल भोगता है ।।

समानसत्त्वा बालानां तस्माद्धात्री प्रशस्यते । उद्वेगवित्रासकरी विपरीता न शस्यते ।।

इसलिये बालकों के लिये समान सत्त्ववाली धात्री प्रशस्त मानी गई है विपरीत सत्त्ववाली धात्री उद्वेग तथा कष्ट उत्पन्न करने वाली होने से निषिद्ध मानी गई है।

न जीवन्त्यथ जीवन्ति कृच्छ्रा धात्रीविपर्यये । समान त्त्वा बालानां पुष्टिरायुर्बलं सुखम् ।।

धात्री के विपरीत सत्त्व (गुणों) वाली होने से, बालक जीवित नहीं रहते हैं। और यदि जीवित रहते भी हैं तो अत्यन्त कठिनता से। समान सत्त्व वाली धात्री बालकों की पुष्टि, आयु, बल एवं सुख को देने वाली होती है ।।

त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ।
ओजः सत्त्वं च सर्वं च तत्सारं तु निबोध मे ।।

त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र—ये सात धातुएँ, ओज तथा सत्त्व—ये सब ९ शरीर में सार होते हैं। उनके लक्षणों को तू मुझ से सुन। चरक में जिन २ लक्षणों द्वारा मनुष्य के बल की परीक्षा की जाती है; उन प्रकृति-विकृति आदि के साथ सार को भी दिया है। अर्थात् सार के द्वारा रोगी के बल की परीक्षा करने का भी विधान चरक वि. अ. ८ में कहा है—सारतश्चेति-साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुपदिश्यन्ते। तद्यथा—त्वग्रक्त-मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रसत्त्वानि। बल के प्रमाण को जानने के लिये सारों द्वारा लक्षण कहे गये हैं। सार के विषय में चक्रपाणि ने कहा है-‘विशुद्धतरो धातुरुच्यते’ अर्थात् विशुद्धतर धातु को ‘सार’ कहते हैं। जिस गुण की विशेषता होती है बालक उसी सार वाला कहलाता है। उदाहरणार्थ—जो बालक सत्त्वगुण विशिष्ट होता है उसे सत्त्वसार कहते हैं। यहां आठ सारों का वर्णन किया गया है। प्रकृत ग्रन्थ में ९ सार गिनाये गये हैं यहां ओज को अधिक गिना गया है ।।

त्वग्रोगरहितो भोगी प्रसन्नव्यञ्जनच्छविः । सद्यःक्षतप्ररोहश्च त्वक्सारः सुतनूरुहः ।।

त्वक् सार बालक के लक्षण—जो त्वचा के रोगों (Skin diseases) से रहित है, भोगी है, जिसके शरीर की छवि (कान्ति) निर्मल तथा स्पष्टरूप से दिखाई देने वाली है, जिसके घाव शीघ्र भर जाते हैं तथा जिसके रोग प्रशस्त होते हैं—वह बालक त्वक्सार कहलाता है ।।

रक्तसारोऽरुणाभासः ................................ ।।
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(इति ताडपत्रपुस्तके ४९ तमं$^१$ पत्रम् ।)
(सूत्रस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।)


१. इससे आगे इस ताड़पत्रपुस्तक में ५० से लेकर ७४ तक के २५ पृष्ठ लुप्त हुए हैं, जिसमें सम्भवतः सूत्रस्थान का अवशिष्ट अंश, सम्पूर्ण निदान स्थान तथा विमान स्थान का भी पर्याप्त अंश होना चाहिये।


२८ का.सं.