भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लक्षणाध्यायः २८]

रक्तसार बालक—अरुण आभा वाला ..... (होता है) ........................................................................... (सूत्र स्थान का इतना ही भाग उपलब्ध हुआ है)

वक्तव्य—उपर्युक्त श्लोक के बीच में ही यह अध्याय खण्डित हो गया है। अतः हम पाठकों के ज्ञान के लिये अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर इन सारों के लक्षण कहते हैं—चरक वि. अ. ८ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—त्वक्सार के लक्षण—तत्र स्निग्धश्लक्ष्णमृदुप्रसन्नसूक्ष्माल्पगम्भीरसुकुमारलोमा सप्रभेव च त्वक् त्वक्साराणां, सा सारता सुखसौभाग्यैश्वर्योपभोगबुद्धिविद्यारोग्यप्रहर्षणा न्यायुर्र्यान्वितरमाचष्टे । त्वक्सार पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, कोमल, निर्मल, पतली तथा थोड़े गहरे सुकुमार बालों वाली एवं प्रभायुक्त होती है। यह सारता सुख, सौभाग्य, उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रसन्नता तथा दीर्घायुष्य को प्रकट करती है। रक्तसार के लक्षण—कर्णाक्षिमूखजिह्वाना-सौष्ठपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्धरक्तं श्रीमद् भ्राजिष्णु रक्तसाराणां, सा सारता सुखमुद्ग्रतां मेधां मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेशसहिष्णु वमृष्णासहिष्णुत्वं चाचष्टे । रक्तसार पुरुष के कान, आंख, मुख, जिह्वा, नाक, होंठ, हस्ततल, पादतल, नाखून, मस्तक तथा मूत्रेन्द्रिय आदि स्निग्ध, लाल, शोभायुक्त तथा उज्ज्वल होते हैं। यह सारता सुख, क्रूरता, मेधा, तेजस्विता, सुकुमारता, अधिक बल का न होना, क्लेश को सहना तथा गर्मी को न सहना इत्यादि बातों को बताती है। मांस सार के लक्षण-शङ्खललाटकृकाटिकाऽक्षिगण्डहनुग्रीवास्कन्धोदरकक्षवक्षःपाणिपादसन्धयो गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणां, सा सारता क्षमां धृतिमलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे । मांससार पुरुषों के शङ्ख, ललाट, कृकाटिका, आंख, गाल, हनु, ग्रीवा, कन्धे, पेट, कक्ष, वक्ष (छाती), हाथ, पैर एवं सन्धियां भारी स्थिर तथा मांस से भरी हुई होती हैं। यह सारता, क्षमा, धैर्य, अलोलुपता, धन, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और आयुका सूचक है। मेदः सार के लक्षण—वर्णस्वरनेत्रकेशलोमनखदन्तौष्ठमूत्रपुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदः-साराणां, सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारोपचारतां चाचष्टे, मेदः सार पुरुषों के वर्ण, स्वर; नेत्र, केश, लोम, नख, दन्त, ओष्ठ, मूत्र तथा पुरीष में स्नेह भी विशेषतः होती है। यह सारता धन, ऐश्वर्य, सुख, उपभोग, दान, सरलता तथा मृदु उपचार के योग्य होना—इत्यादि का सूचक है। अस्थिसार के लक्षण—पार्ष्णिगुल्फ-जान्वरत्नजत्रुचिबुकशिरःपर्वस्थूलाः स्थूलास्थिनखदन्ताश्चास्थिसाराः, ते महोत्साहाः क्रियावन्तः क्लेशसहाः सारस्थिरशरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च । अस्थिसार पुरुषों की एड़ी, गुल्फ, जानु, कोहनी, जत्रु, ठोडी, शिर, पर्व, हड्डी, नख तथा दांत स्थूल होते हैं। वे बड़े उत्साही, क्रियाशील, क्लेश को सहने वाले, दृढ़ एवं स्थिर शरीर वाले और दीर्घायु होते हैं। मज्जासार के लक्षण—तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूलदीर्घवृत्तसन्धयश्च मज्जसाराः, ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुतविज्ञानवित्तापत्यसम्मानभाजश्च भवन्ति । मज्जासार पुरुषों के अङ्ग पतले होते हैं, वे बलवान्, स्निग्ध वर्ण एवं स्वरवाले, मोटी-लम्बी एवं गोल सन्धियों वाले, दीर्घायु, बलवान्, श्रुत (शास्त्रज्ञान), विज्ञान, धन, सन्तान एवं सम्मानयुक्त होते हैं। शुक्रसार के लक्षण-सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्धवृत्तसारसमसंहतशिखरदशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः, ते स्त्रीप्रिया; प्रियोपभोगबलवन्तः सु श्र्यारोग्यवित्तसम्मानापत्यभाजश्च भवन्ति । शुक्रसार पुरुष सौम्य तथा सौम्यदृष्टि होते हैं। उनकी आंखें दूध के समान तृप्त अथवा शुभ्र होती हैं। उनको ध्वजोच्छ्राय (Ercetion) बहुत होता है। उनके दांत स्निग्ध, गोल, दृढ़, सम, संगठित तथा तीक्ष्ण अग्रभाग वाले होते हैं। वर्ण और स्वर निर्मल एवं स्निग्ध होते हैं। वे कान्तियुक्त होते हैं। उनके नितम्ब बड़े होते हैं। वे स्त्रियों के प्रिय होते हैं अथवा वे स्त्रियों को बहुत चाहने वाले होते हैं। वे उपभोग प्रिय एवं बलवान् होते हैं तथा सुख, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन, सम्मान तथा सन्तान से युक्त होते हैं। सत्त्वसार के लक्षण—स्मृतिमन्तोभक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः स्ववस्थितगतिगंभीरबुद्धिचेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः, तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः । सत्त्वसार पुरुष स्मृति एवं शक्ति से सम्पन्न, भक्तियुक्त, कृतज्ञ, बुद्धिमान, पवित्र, अत्यन्त उत्साही, कुशल तथा धीर होते हैं। रण में विक्रमपूर्वक लड़ते हैं। उन्हें विषाद बिलकुल नहीं होता, उनकी गति स्थिर होती है। बुद्धि तथा चेष्टायें गम्भीर होती हैं। वे कल्याण में तत्पर होते हैं। तत्र सर्वैः सारैरूपेताः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः

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