काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ८१
परमगौरवयुक्ताः क्लेशसहाः सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिरसमाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनादस्निग्धगम्भीरमहास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसम्मानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तुल्यगुणविस्तीर्णपत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति। इनमें से सब सारों से युक्त व्यक्ति अत्यन्त बलवान्, गौरवयुक्त, क्लेश को सहने वाले, आत्मविश्वासी आदि होते हैं। वे स्निग्ध, गम्भीर एवं महान् स्वर वाले होते हैं। वे सुख ऐश्वर्य, धन उपभोग एवं सम्मान से युक्त होते हैं। उन्हें वृद्धावस्था तथा रोग देर में होते हैं। वे दीर्घायु होते हैं तथा इनकी सन्तान भी इन्हीं गुणों से युक्त होती है। इन सारों के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३५ में निम्न वर्णन मिलता है—स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौर्यशौचोपेतं कल्याणाभिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्, स्निग्धसंहतश्वेतास्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुक्रेण, अकृशमुत्तमबलं स्निग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मज्ज्ञा, महाशिरःस्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः, स्निग्धमूत्रस्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा, अच्छिद्रगात्रं गूढास्थिसन्धि मांसोपचितं च मांसेन, स्निग्धताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलं रक्तेन, सुप्रसन्नमृदुत्वग्ग्रीमाणं त्वक्सारं विद्यादिति। एषां पूर्वं पूर्वं प्रधानमायुःसौभाग्ययोरिति।
पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से कररेखाओं तथा उनके शुभाशुभ फलों का वर्णन करते हैं। कर रेखाओं के द्वारा बालकों की आयु, भाग्य, ऐश्वर्य, विद्या, बुद्धि, धन, सुख तथा दुःख आदि का ज्ञान होता है। हाथ में स्थित विशेष रेखाओं तथा वज्र, नक्षत्र, यव आदि चिह्नों का विशेष प्रभाव माना गया है। इसलिये बालकों के दीर्घायुष्य को जानने के लिये अन्य प्रशस्त एवं अप्रशस्त शारीरिक लक्षणों के साथ २ इन हस्तरेखाओं का जानना भी आवश्यक है। चिकित्सक को इन हस्तरेखाओं से विशेष सहायता मिल सकती है। हमारे पूर्वज सामुद्रिक शास्त्रवेत्ताओं ने हस्तरेखाओं के विषय में जो विचार किये हैं वे संक्षेप में निम्नप्रकार से हैं। हस्तरेखाओं को हम मुख्यरूप से तीन श्रेणियों (classes) में विभक्त कर सकते हैं। (१) मुख्य रेखाएँ, (२) अनुरेखाएँ, (३) वज्र नक्षत्रादि विशेष प्रकार के चिह्न। १. प्रथम श्रेणी की मुख्य रेखाएं निम्न हैं—i. पितृ रेखा—जो तर्जनी अंगुली के मूल से मणिबन्ध के मध्यभाग तक फैली हुई होती है। ii. मातृरेखा—जो इसी के लगभग समानान्तर हथेली के मध्य में रहती है। iii. आयुरेखा—जो कनिष्ठिका अंगुली के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। iv. भाग्यरेखा—यह मणिबन्ध के मध्य से लेकर मध्यमाङ्गुली तक जाती है। v. रविरेखा या विद्यारेखा—जो अनामिका अंगुली के मूल से पितृरेखा तक जाती है। vi. वाणिज्य या स्वास्थ्य रेखा—जो पितृ रेखा से लेकर कनिष्ठिका तक जाती है। ये ६ मुख्य रेखायें मानी जाती हैं। २. इनके अतिरिक्त दूसरी श्रेणी की कुछ गौण रेखायें होती हैं जिन्हें अनुग रेखायें कहते हैं। i. पितृरेखा की अनुरेखा। ii. वाणिज्यरेखा की अनुरेखा—इसे प्रवृत्तिरेखा भी कहते हैं। iii. एक आयु रेखा की अनुग रेखा भी होती है। इसे शुक्रबुध संयोजिनी रेखा कहते हैं। ये द्वितीय श्रेणी की गौण रेखायें हैं। ३. तृतीय श्रेणी की रेखायें—ये हाथ में भिन्न २ स्थानों पर विशेष २ प्रकार के चिह्न होते हैं जिनके द्वारा शुभ एवं अशुभ भावों का ज्ञान होता है। ये निम्न हैं—
i. वज्ररेखा ii. नक्षत्र रेखा, iii. यव रेखा, iv. चतुष्कोण रेखा, v. त्रिकोण रेखा, ये सब रेखायें हाथ में करतल (Palm) के स्थानविशेष में विशेष फल देती हैं।
इन उपर्युक्त रेखाओं के अतिरिक्त करतल में सप्तग्रहों के भी पृथक् २ स्थान होते हैं। आगे ये सब दिखाये गये हैं। १. रविस्थान—अनामिका के निचे का अंश रविस्थान कहलाता है। २. चन्द्रस्थान—मणिबन्ध के बाईं तरफ का स्थान। ३. मंगलस्थान—करतल का मध्यस्थल। ४. बुधस्थान—कनिष्ठिका का निम्न स्थान। ५. बृहस्पतिस्थान—तर्जनी अंगुली का निम्न भाग। ६. शुक्रस्थान—अंगुष्ठ का निम्न स्थान। ७. शनि स्थान—मध्यमा अङ्गलि का निम्न स्थान। हाथ में भिन्न २ प्रकार की रेखाओं, चिह्नों तथा ग्रहों के स्थानों को देने के बाद अब हम संक्षेप से उनके फलों का वर्णन करते हैं। पितृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण पितृज भावों का परिचय होता है। शरीर के अन्दर जितने भी कठिन (कठोर) भाव होते हैं वे सब पितृज भाव माने जाते हैं। इससे ज्ञात होता है कि बालक में कितनी दृढ़ता है। शरीर के दृढ़ होने से आयु का संबन्ध है अर्थात् इस रेखा को देखकर आयु का विचार किया जाता है। इसी लिये पाश्चात्य विद्वान् पितृरेखा को आयु रेखा (Line of life) मानते हैं। मातृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण मातृज भावों का ज्ञान होता है। शरीर में जितनी भी स्निग्ध एवं कोमल वस्तुएं तथा भाव हैं वे सब मातृज कहलाते हैं। मस्तुलुङ्ग (Brain-मस्तिष्क) भी मातृज भाव माना जाता है। इसीलिये पाश्चात्य विद्वान् मातृरेखा को शिरोरेखा (Line of head) मानते हैं। आयु-