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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लक्षणाध्यायः २८]


में कहा है—अनुषक्तकाममजस्त्रमाहारविहारपरमनवस्थितममर्षिणमसंचयं शाकुनं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्त्राहार एव च। अमर्ष णोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम्॥

इत्येतद्राजसं सत्त्वं सप्तधा क्रोधकारितम्। व्यामिश्रगुणदोषं च रज एवोपलक्षयेत्।।

इस प्रकार क्रोध से उत्पन्न होने वाला राजससत्त्व सात प्रकार का है। इनमें गुण एवं दोषों के मिले होने से इन्हें राजस ही समझें।

वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में राजससत्त्व के ६ भेद दिये हैं, उनमें याक्षसत्त्व नहीं दिया है। चरक में कहा है—इत्येतवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विधं भेदांशं विद्यात् रोषांशत्वात्। सुश्रुत में भी कहा है—"षडेते राजसाः कायाः"।।

आहारमैथुनपरं स्वप्नशीलममेधसम्। अथैवं पाशवं विद्यान्मृजाऽलङ्कारवर्जितम्।।

तामस सत्त्व के भेद १. पाशव सत्त्व—सदा आहार तथा मैथुन में लगे हुए, अत्यधिक सोने वाले, निन्दित अथवा कम बुद्धिवाले, शुद्धि तथा अलंकार (आभूषण या सजावट) से रहित व्यक्ति को पाशवसत्त्व जानें। चरक शा. अ. ४ में कहा है—निराकरिष्णुमवमवेशं जुगुप्सिताचाराहारं मैथुनपरं स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्नमैथुननित्यता। निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः।।

भीरुमप्रज्ञमाद्यूतं कामक्रोधवशं गतम्। हिंस्रमात्मपरं विद्यान्मात्स्यं सुप्रजसं शठम्।।

२. मात्स्य सत्त्व—भीरु, मूर्ख, आद्यून¹ (बहुत खाने वाला पेटू), कामी तथा क्रोधी (काम तथा क्रोध में लगा हुआ) हिंसक, आत्मपर (सदा अपने में ही लगा रहने वाला—दूसरों की परवाह न करने वाला), अधिक सन्तान वाला तथा धूर्त व्यक्ति मात्स्यसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्तकामक्रोधं सरणशीलं तोयकामं मात्स्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—अनवस्थितता मौर्ख्यं भीरुत्वं सलिलार्थिता। परस्पराभिमर्दश्चमत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्।।

बधबन्धपरिक्लेशशीतवातातपक्षकम्। बुद्धयङ्गहीनमलसं वानस्पत्यं वदेदृजुम्।।

३. वानस्पत्य सत्त्व—वध, बन्धन, दुःख, सर्दी, वायु तथा धूप को सहने वाले, बुद्धि तथा अङ्गों से हीन, आलसी तथा ऋजु (सरल-सीधे सादे) व्यक्ति को वानस्पत्य सत्त्व कहते हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—एकस्थानरतिर्नित्यमाहारे केवले रतः। वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकायार्थवर्जितः॥

इत्येतत्त्रिविधं सत्त्वं तामसं मोहसंभवम्। यच्चामेध्यमकल्याणं सर्वं तच्चापि तामसम्।।

इस प्रकार मोह से उत्पन्न यह तीन प्रकार का तामससत्त्व कहा है। और जो कुछ भी अपवित्र तथा अकल्याणकारी होता है वह सब तामस कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—इत्येवं खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविधं भेदांशं विद्यान्मोहांशत्वात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा॥

सत्त्वं प्रकाशकं विद्धि, रजश्चापि प्रवर्तकम्। तमो नियामकं प्रोक्तमन्योन्यमिथुनप्रियम्।।

सत्त्व गुण प्रकाशक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रकाशित अर्थात् विशद करने वाला है), रजोगुणप्रवर्तक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रवृत्त करने वाला—गति देने वाला है) तथा तमोगुण नियामक (नियन्त्रण करने वाला) होता है। ये तीनों परस्पर एक दूसरे को प्रिय होते हैं अर्थात् ये तीनों परस्पर संयोग से कार्य करते हैं। सांख्यकारिका में कहा है—


१. 'आद्यूनः स्यादौदरिकः' इत्यमरः।

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७९


सत्त्वं लघुप्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः । गुरुवरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः ।। प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणाः ।

यदा यच्चाधिकं यस्य स देही तेन भावितः । शुभाशुभान्याचरति फलं भुङ्क्ते तथाविधम् ।।

जिस व्यक्ति में जिस समय जिस सत्त्व की अधिकता (प्रधानता) होती है वह उसी के अनुसार शुभ एवं अशुभ आचरण करता है। तथा उसी के अनुसार (वैसा ही) वह फल भोगता है ।।

समानसत्त्वा बालानां तस्माद्धात्री प्रशस्यते । उद्वेगवित्रासकरी विपरीता न शस्यते ।।

इसलिये बालकों के लिये समान सत्त्ववाली धात्री प्रशस्त मानी गई है विपरीत सत्त्ववाली धात्री उद्वेग तथा कष्ट उत्पन्न करने वाली होने से निषिद्ध मानी गई है।

न जीवन्त्यथ जीवन्ति कृच्छ्रा धात्रीविपर्यये । समान त्त्वा बालानां पुष्टिरायुर्बलं सुखम् ।।

धात्री के विपरीत सत्त्व (गुणों) वाली होने से, बालक जीवित नहीं रहते हैं। और यदि जीवित रहते भी हैं तो अत्यन्त कठिनता से। समान सत्त्व वाली धात्री बालकों की पुष्टि, आयु, बल एवं सुख को देने वाली होती है ।।

त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ।
ओजः सत्त्वं च सर्वं च तत्सारं तु निबोध मे ।।

त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र—ये सात धातुएँ, ओज तथा सत्त्व—ये सब ९ शरीर में सार होते हैं। उनके लक्षणों को तू मुझ से सुन। चरक में जिन २ लक्षणों द्वारा मनुष्य के बल की परीक्षा की जाती है; उन प्रकृति-विकृति आदि के साथ सार को भी दिया है। अर्थात् सार के द्वारा रोगी के बल की परीक्षा करने का भी विधान चरक वि. अ. ८ में कहा है—सारतश्चेति-साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुपदिश्यन्ते। तद्यथा—त्वग्रक्त-मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रसत्त्वानि। बल के प्रमाण को जानने के लिये सारों द्वारा लक्षण कहे गये हैं। सार के विषय में चक्रपाणि ने कहा है-‘विशुद्धतरो धातुरुच्यते’ अर्थात् विशुद्धतर धातु को ‘सार’ कहते हैं। जिस गुण की विशेषता होती है बालक उसी सार वाला कहलाता है। उदाहरणार्थ—जो बालक सत्त्वगुण विशिष्ट होता है उसे सत्त्वसार कहते हैं। यहां आठ सारों का वर्णन किया गया है। प्रकृत ग्रन्थ में ९ सार गिनाये गये हैं यहां ओज को अधिक गिना गया है ।।

त्वग्रोगरहितो भोगी प्रसन्नव्यञ्जनच्छविः । सद्यःक्षतप्ररोहश्च त्वक्सारः सुतनूरुहः ।।

त्वक् सार बालक के लक्षण—जो त्वचा के रोगों (Skin diseases) से रहित है, भोगी है, जिसके शरीर की छवि (कान्ति) निर्मल तथा स्पष्टरूप से दिखाई देने वाली है, जिसके घाव शीघ्र भर जाते हैं तथा जिसके रोग प्रशस्त होते हैं—वह बालक त्वक्सार कहलाता है ।।

रक्तसारोऽरुणाभासः ................................ ।।
..................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ४९ तमं$^१$ पत्रम् ।)
(सूत्रस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।)


१. इससे आगे इस ताड़पत्रपुस्तक में ५० से लेकर ७४ तक के २५ पृष्ठ लुप्त हुए हैं, जिसमें सम्भवतः सूत्रस्थान का अवशिष्ट अंश, सम्पूर्ण निदान स्थान तथा विमान स्थान का भी पर्याप्त अंश होना चाहिये।


२८ का.सं.

८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लक्षणाध्यायः २८]

रक्तसार बालक—अरुण आभा वाला ..... (होता है) ........................................................................... (सूत्र स्थान का इतना ही भाग उपलब्ध हुआ है)

वक्तव्य—उपर्युक्त श्लोक के बीच में ही यह अध्याय खण्डित हो गया है। अतः हम पाठकों के ज्ञान के लिये अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर इन सारों के लक्षण कहते हैं—चरक वि. अ. ८ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—त्वक्सार के लक्षण—तत्र स्निग्धश्लक्ष्णमृदुप्रसन्नसूक्ष्माल्पगम्भीरसुकुमारलोमा सप्रभेव च त्वक् त्वक्साराणां, सा सारता सुखसौभाग्यैश्वर्योपभोगबुद्धिविद्यारोग्यप्रहर्षणा न्यायुर्र्यान्वितरमाचष्टे । त्वक्सार पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, कोमल, निर्मल, पतली तथा थोड़े गहरे सुकुमार बालों वाली एवं प्रभायुक्त होती है। यह सारता सुख, सौभाग्य, उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रसन्नता तथा दीर्घायुष्य को प्रकट करती है। रक्तसार के लक्षण—कर्णाक्षिमूखजिह्वाना-सौष्ठपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्धरक्तं श्रीमद् भ्राजिष्णु रक्तसाराणां, सा सारता सुखमुद्ग्रतां मेधां मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेशसहिष्णु वमृष्णासहिष्णुत्वं चाचष्टे । रक्तसार पुरुष के कान, आंख, मुख, जिह्वा, नाक, होंठ, हस्ततल, पादतल, नाखून, मस्तक तथा मूत्रेन्द्रिय आदि स्निग्ध, लाल, शोभायुक्त तथा उज्ज्वल होते हैं। यह सारता सुख, क्रूरता, मेधा, तेजस्विता, सुकुमारता, अधिक बल का न होना, क्लेश को सहना तथा गर्मी को न सहना इत्यादि बातों को बताती है। मांस सार के लक्षण-शङ्खललाटकृकाटिकाऽक्षिगण्डहनुग्रीवास्कन्धोदरकक्षवक्षःपाणिपादसन्धयो गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणां, सा सारता क्षमां धृतिमलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे । मांससार पुरुषों के शङ्ख, ललाट, कृकाटिका, आंख, गाल, हनु, ग्रीवा, कन्धे, पेट, कक्ष, वक्ष (छाती), हाथ, पैर एवं सन्धियां भारी स्थिर तथा मांस से भरी हुई होती हैं। यह सारता, क्षमा, धैर्य, अलोलुपता, धन, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और आयुका सूचक है। मेदः सार के लक्षण—वर्णस्वरनेत्रकेशलोमनखदन्तौष्ठमूत्रपुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदः-साराणां, सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारोपचारतां चाचष्टे, मेदः सार पुरुषों के वर्ण, स्वर; नेत्र, केश, लोम, नख, दन्त, ओष्ठ, मूत्र तथा पुरीष में स्नेह भी विशेषतः होती है। यह सारता धन, ऐश्वर्य, सुख, उपभोग, दान, सरलता तथा मृदु उपचार के योग्य होना—इत्यादि का सूचक है। अस्थिसार के लक्षण—पार्ष्णिगुल्फ-जान्वरत्नजत्रुचिबुकशिरःपर्वस्थूलाः स्थूलास्थिनखदन्ताश्चास्थिसाराः, ते महोत्साहाः क्रियावन्तः क्लेशसहाः सारस्थिरशरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च । अस्थिसार पुरुषों की एड़ी, गुल्फ, जानु, कोहनी, जत्रु, ठोडी, शिर, पर्व, हड्डी, नख तथा दांत स्थूल होते हैं। वे बड़े उत्साही, क्रियाशील, क्लेश को सहने वाले, दृढ़ एवं स्थिर शरीर वाले और दीर्घायु होते हैं। मज्जासार के लक्षण—तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूलदीर्घवृत्तसन्धयश्च मज्जसाराः, ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुतविज्ञानवित्तापत्यसम्मानभाजश्च भवन्ति । मज्जासार पुरुषों के अङ्ग पतले होते हैं, वे बलवान्, स्निग्ध वर्ण एवं स्वरवाले, मोटी-लम्बी एवं गोल सन्धियों वाले, दीर्घायु, बलवान्, श्रुत (शास्त्रज्ञान), विज्ञान, धन, सन्तान एवं सम्मानयुक्त होते हैं। शुक्रसार के लक्षण-सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्धवृत्तसारसमसंहतशिखरदशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः, ते स्त्रीप्रिया; प्रियोपभोगबलवन्तः सु श्र्यारोग्यवित्तसम्मानापत्यभाजश्च भवन्ति । शुक्रसार पुरुष सौम्य तथा सौम्यदृष्टि होते हैं। उनकी आंखें दूध के समान तृप्त अथवा शुभ्र होती हैं। उनको ध्वजोच्छ्राय (Ercetion) बहुत होता है। उनके दांत स्निग्ध, गोल, दृढ़, सम, संगठित तथा तीक्ष्ण अग्रभाग वाले होते हैं। वर्ण और स्वर निर्मल एवं स्निग्ध होते हैं। वे कान्तियुक्त होते हैं। उनके नितम्ब बड़े होते हैं। वे स्त्रियों के प्रिय होते हैं अथवा वे स्त्रियों को बहुत चाहने वाले होते हैं। वे उपभोग प्रिय एवं बलवान् होते हैं तथा सुख, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन, सम्मान तथा सन्तान से युक्त होते हैं। सत्त्वसार के लक्षण—स्मृतिमन्तोभक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः स्ववस्थितगतिगंभीरबुद्धिचेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः, तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः । सत्त्वसार पुरुष स्मृति एवं शक्ति से सम्पन्न, भक्तियुक्त, कृतज्ञ, बुद्धिमान, पवित्र, अत्यन्त उत्साही, कुशल तथा धीर होते हैं। रण में विक्रमपूर्वक लड़ते हैं। उन्हें विषाद बिलकुल नहीं होता, उनकी गति स्थिर होती है। बुद्धि तथा चेष्टायें गम्भीर होती हैं। वे कल्याण में तत्पर होते हैं। तत्र सर्वैः सारैरूपेताः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ८१

परमगौरवयुक्ताः क्लेशसहाः सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिरसमाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनादस्निग्धगम्भीरमहास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसम्मानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तुल्यगुणविस्तीर्णपत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति। इनमें से सब सारों से युक्त व्यक्ति अत्यन्त बलवान्, गौरवयुक्त, क्लेश को सहने वाले, आत्मविश्वासी आदि होते हैं। वे स्निग्ध, गम्भीर एवं महान् स्वर वाले होते हैं। वे सुख ऐश्वर्य, धन उपभोग एवं सम्मान से युक्त होते हैं। उन्हें वृद्धावस्था तथा रोग देर में होते हैं। वे दीर्घायु होते हैं तथा इनकी सन्तान भी इन्हीं गुणों से युक्त होती है। इन सारों के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३५ में निम्न वर्णन मिलता है—स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौर्यशौचोपेतं कल्याणाभिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्, स्निग्धसंहतश्वेतास्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुक्रेण, अकृशमुत्तमबलं स्निग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मज्ज्ञा, महाशिरःस्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः, स्निग्धमूत्रस्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा, अच्छिद्रगात्रं गूढास्थिसन्धि मांसोपचितं च मांसेन, स्निग्धताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलं रक्तेन, सुप्रसन्नमृदुत्वग्ग्रीमाणं त्वक्सारं विद्यादिति। एषां पूर्वं पूर्वं प्रधानमायुःसौभाग्ययोरिति।

पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से कररेखाओं तथा उनके शुभाशुभ फलों का वर्णन करते हैं। कर रेखाओं के द्वारा बालकों की आयु, भाग्य, ऐश्वर्य, विद्या, बुद्धि, धन, सुख तथा दुःख आदि का ज्ञान होता है। हाथ में स्थित विशेष रेखाओं तथा वज्र, नक्षत्र, यव आदि चिह्नों का विशेष प्रभाव माना गया है। इसलिये बालकों के दीर्घायुष्य को जानने के लिये अन्य प्रशस्त एवं अप्रशस्त शारीरिक लक्षणों के साथ २ इन हस्तरेखाओं का जानना भी आवश्यक है। चिकित्सक को इन हस्तरेखाओं से विशेष सहायता मिल सकती है। हमारे पूर्वज सामुद्रिक शास्त्रवेत्ताओं ने हस्तरेखाओं के विषय में जो विचार किये हैं वे संक्षेप में निम्नप्रकार से हैं। हस्तरेखाओं को हम मुख्यरूप से तीन श्रेणियों (classes) में विभक्त कर सकते हैं। (१) मुख्य रेखाएँ, (२) अनुरेखाएँ, (३) वज्र नक्षत्रादि विशेष प्रकार के चिह्न। १. प्रथम श्रेणी की मुख्य रेखाएं निम्न हैं—i. पितृ रेखा—जो तर्जनी अंगुली के मूल से मणिबन्ध के मध्यभाग तक फैली हुई होती है। ii. मातृरेखा—जो इसी के लगभग समानान्तर हथेली के मध्य में रहती है। iii. आयुरेखा—जो कनिष्ठिका अंगुली के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। iv. भाग्यरेखा—यह मणिबन्ध के मध्य से लेकर मध्यमाङ्गुली तक जाती है। v. रविरेखा या विद्यारेखा—जो अनामिका अंगुली के मूल से पितृरेखा तक जाती है। vi. वाणिज्य या स्वास्थ्य रेखा—जो पितृ रेखा से लेकर कनिष्ठिका तक जाती है। ये ६ मुख्य रेखायें मानी जाती हैं। २. इनके अतिरिक्त दूसरी श्रेणी की कुछ गौण रेखायें होती हैं जिन्हें अनुग रेखायें कहते हैं। i. पितृरेखा की अनुरेखा। ii. वाणिज्यरेखा की अनुरेखा—इसे प्रवृत्तिरेखा भी कहते हैं। iii. एक आयु रेखा की अनुग रेखा भी होती है। इसे शुक्रबुध संयोजिनी रेखा कहते हैं। ये द्वितीय श्रेणी की गौण रेखायें हैं। ३. तृतीय श्रेणी की रेखायें—ये हाथ में भिन्न २ स्थानों पर विशेष २ प्रकार के चिह्न होते हैं जिनके द्वारा शुभ एवं अशुभ भावों का ज्ञान होता है। ये निम्न हैं—

i. वज्ररेखा ii. नक्षत्र रेखा, iii. यव रेखा, iv. चतुष्कोण रेखा, v. त्रिकोण रेखा, ये सब रेखायें हाथ में करतल (Palm) के स्थानविशेष में विशेष फल देती हैं।

इन उपर्युक्त रेखाओं के अतिरिक्त करतल में सप्तग्रहों के भी पृथक् २ स्थान होते हैं। आगे ये सब दिखाये गये हैं। १. रविस्थान—अनामिका के निचे का अंश रविस्थान कहलाता है। २. चन्द्रस्थान—मणिबन्ध के बाईं तरफ का स्थान। ३. मंगलस्थान—करतल का मध्यस्थल। ४. बुधस्थान—कनिष्ठिका का निम्न स्थान। ५. बृहस्पतिस्थान—तर्जनी अंगुली का निम्न भाग। ६. शुक्रस्थान—अंगुष्ठ का निम्न स्थान। ७. शनि स्थान—मध्यमा अङ्गलि का निम्न स्थान। हाथ में भिन्न २ प्रकार की रेखाओं, चिह्नों तथा ग्रहों के स्थानों को देने के बाद अब हम संक्षेप से उनके फलों का वर्णन करते हैं। पितृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण पितृज भावों का परिचय होता है। शरीर के अन्दर जितने भी कठिन (कठोर) भाव होते हैं वे सब पितृज भाव माने जाते हैं। इससे ज्ञात होता है कि बालक में कितनी दृढ़ता है। शरीर के दृढ़ होने से आयु का संबन्ध है अर्थात् इस रेखा को देखकर आयु का विचार किया जाता है। इसी लिये पाश्चात्य विद्वान् पितृरेखा को आयु रेखा (Line of life) मानते हैं। मातृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण मातृज भावों का ज्ञान होता है। शरीर में जितनी भी स्निग्ध एवं कोमल वस्तुएं तथा भाव हैं वे सब मातृज कहलाते हैं। मस्तुलुङ्ग (Brain-मस्तिष्क) भी मातृज भाव माना जाता है। इसीलिये पाश्चात्य विद्वान् मातृरेखा को शिरोरेखा (Line of head) मानते हैं। आयु-

८२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

रेखा—पहले बताया जा चुका है कि आयुरेखा कनिष्ठका के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। इस रेखा से प्रत्यक्ष रूप से बालक की आयु का विचार किया जाता है। मनुष्य की पूर्ण आयु १२० वर्ष की मानी गई है। कहा भी है— समाः षष्ठिर्द्विघ्ना मनुजकरिणां पञ्च च निशा। हयानां द्विपष्ठिः............ इत्यादि ।। (वराहमिहिर) यह आयु बुध स्थान से लेकर बृहस्पति स्थान तक क्रमशः १०, २०, ४० एवं ५० (= १२०) गणना के अनुसार ४ भागों में विभक्त हुई पूर्ण आयु (१२० वर्ष) को प्रकट करती है। भाग्यरेखा—इस रेखा से अधिकतर बालक के कार्य (राजसेवा-नौकरी) इत्यादि का विचार किया जाता है। रविरेखा—इस रेखा से बालक की विद्या एवं यश, प्रभाव आदि का विचार होता है। वाणिज्यरेखा—इस रेखा से स्वास्थ्य का विषय तथा व्यवसाय आदि का विचार किया जाता है इन तीनों रेखाओं (भाग्य, रवि तथा वाणिज्य रेखाओं) को सम्मिलित रूप से भाग्यरेखा कहा जा सकता है क्योंकि इन तीनों रेखाओं के द्वारा बालक के भव्य का ज्ञान होता है इन मुख्य रेखाओं के फलों के अतिरिक्त अनुग रेखाएं अपनी-अपनी मुख्य रेखाओं को दोषरहित करके अधिक बलवान बनाती है तृतीय श्रेणी की रेखाएं—वज्ररेखा-शुभस्थान अर्थात् बृहस्पति, शुक्र और सम उच्च चन्द्रमा तथा बुध के स्थान में भी ग्रहों के अपने २ स्वाभाविक भावों को बढ़ाते हैं। यदि यह वज्र रेखा क्रूर ग्रहों के स्थानों में (विशेषकर मंगल और शनि) हो तो उनकी स्वाभाविक अनिष्टकारिता को बढ़ाते हैं। नक्षत्ररेखा—इसके फल भी प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। परन्तु नक्षत्रचिह्न वज्र की अपेक्षा अधिक बलशाली होता है। यवचिह्न—यह किसी रेखा या स्थान पर हो तो अनिष्टकारी माना जाता है। केवल अंगुष्ठ के मध्य में यदि यह चिह्न हो तो शुभ माना जाता है। उस अवस्था में बालक विद्वान्, अवि अथवा धनवान होता है। चतुष्कोण—इस रेखा के फल-बुध एवं बृहस्पति स्थान में शुभ होते हैं। इनके अतिरिक्त स्थानों में इसका होना अनिष्टकारक होता है। त्रिकोण—यह रेखा जिस ग्रह के स्थान में होती है उसी ग्रह की सबलता प्रकट करती है। यह चिह्न साधारणतया सभी स्थानों में प्रशस्त माना जाता है। इन उपर्युक्त सभी हस्तरेखाओं एवं चिह्नों का विचार करके बालक की आयु, भाग्य तथा कर्माजीव आदि का निर्णय किया जाता है। विषयान्तर होने से हमने संक्षेप में ही इस विषय को यहां दिया है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह विषय अन्यत्र देखना चाहिये।


(चित्र: हस्तरेखा एवं ग्रह-स्थान)

  • भाग्य रेखा
  • बृहस्पति, शनि, रवि, बुध
  • मंगल
  • रवि रेखा
  • शुक्र
  • चन्द्र
  • भाग्य रेखा

करतल में सप्तग्रहों के पृथक्-पृथक् स्थान, पृष्ठ (सूत्रस्थान)

तृतीयं विमानस्थानम्

........................

**वक्तव्य—**इस अध्याय की केवल अन्तिम दो पंक्तियां ही उपलब्ध हुई हैं। शेष सम्पूर्ण अध्याय खण्डित है। अध्याय की समाप्ति-सूचक अन्तिम वाक्य '(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं विमानम्' भी अत्यन्त अस्पष्ट है। इसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि इस अध्याय का क्या विषय है। अन्तिम पंक्ति से थोड़ी सी ध्वनि अवश्य निकलती है। 'अवेक्षितजान् गदान्' को देखकर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः इसमें दृष्टि-दोष से उत्पन्न होने वाले रोगों का वर्णन किया गया होगा। अन्त में उन्हीं का देवता तथा नक्षत्र आदिकों की पूजा के द्वारा प्रतीकार दिया हुआ है। इससे अधिक इसके विषय में कुछ कहना कठिन है।

पृथक् पूजा हिताशनम्।
तिथिनक्षत्रदेवार्चा घ्नन्त्यवेक्षितजान् गदान्॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः॥
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥

पृथक् २ देवताओं की पूजा, हिताशन (पथ्य आहार का सेवन) तथा तिथि, नक्षत्र और देवताओं की अर्चना से दृष्टिदोष नष्ट होते हैं॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥


शिष्योपक्रमणीयविमानाध्यायः

अथातः शिष्योपक्रमणीयं विमानमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शिष्योपक्रमणीय विमानाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

**वक्तव्य—**शिष्योपक्रमणीय का अभिप्राय शिष्य का अध्ययन के निमित्त गुरु के पास आना है। गुरु उसकी सम्यक् प्रकार से परीक्षा करके उसे शास्त्र का ज्ञान देता है। शिष्य विद्या का अधिकारी है या नहीं, यह जानने के लिये ही इस अध्याय का उपक्रम किया गया है ॥१-२॥

अथ खलु गुरुः शिष्यमभिगतं विद्यार्थिनं शिष्यगुणान्वितं विधिनोपनयेदुदगयने पुण्याहे नक्षत्रेऽश्वयुजि रोहिण्यामुत्तरास्वन्यस्मिन् वा। पुण्ये प्रागुदक्प्रवणदेशे गोमयेनाद्भिश्च गोचर्ममात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य; यथोक्तं तत्र लक्षणोल्लेखनाग्निप्रणयन-परिसमूहनपर्युक्षणब्रह्मप्रणीतास्तरणाज्योत्पवनाधाराज्यभागप्रिग्रहोमान् कृत्वा, पालाशीः समिधो घृताक्ता जुहोति—अग्नयेस्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय

८४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]

स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इति हुत्वा; ब्राह्मणं हविष्यौदनेन दक्षिणावता तर्पयित्वा, देवांश्च बलिभिः, गुरवे पूर्णकुम्भं दक्षिणां दत्त्वा, 'दधिक्राव्ण' इति प्राङ्मुखो दधि प्राश्य, उपस्पृश्याद्भिः, परिक्रम्य प्रदक्षिणं, गुरोर्बाहुं संस्पृस्य ब्रूयात्—असावहं पुत्र इति, पादौ संस्पृश्य ब्रूयात्—असावहं शिष्य इति ।।३।।

सबसे प्रारम्भ में आचार्य को चाहिये कि वह समीप आये हुए, विद्या के इच्छुक तथा आगे कहे गये शिष्य के गुणों से युक्त शिष्य का उत्तरायण काल में प्रशस्त दिन तथा अश्विनी, रोहिणी, उत्तरा या अन्य किसी नक्षत्र में विधिपूर्वक उपनयन$^१$ करे। फिर पूर्व या उत्तर की ओर पुण्यकारक स्थान में गोबर तथा पानी से गोचर्म$^२$ के प्रमाण की एक चौकी या फर्श को लीपकर तथा यथोक्त लक्षणोल्लेखन (लक्षण के अनुसार भूमि खोदना आदि), अग्निप्रणयन (अग्नि का लाना), परिसमूहन (इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को एकत्र करना), पर्युक्षण (जल छिड़कना), ब्रह्मप्रणीत—आस्तरण (यज्ञ के लिए ब्रह्मा के निमित्त बनाया हुआ आसन बिछाना), आज्योत्पवन (घृत को पवित्र करना अथवा पिघलाना), आघाराज्याहुति$^३$, आज्य$^४$ भागाहुति तथा अन्य आहुतियां आदि तैयार करके घृतयुक्त पलाश (ढाक) की समिधाओं से निम्न देवताओं तथा ऋषियों के नाम से आहुति देवे—अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये$^५$ स्विष्टकृते स्वाहा। फिर दक्षिणा सहित हविष्य ओदन के द्वारा ब्राह्मणों तथा बलि के द्वारा देवताओं को तृप्त करके तथा गुरु को घड़ा भरके धन आदि की दक्षिणा देकर 'दधिक्राव्ण' इत्यादि मन्त्र बोलकर पूर्व दिशा में मुख करके दधि का सेवन करके, जल का स्पर्श करके तथा अग्नि को दक्षिण में रखकर परिक्रमा करके गुरु का हस्तस्पर्श करके वह कहे—यह मैं आपका पुत्र हूँ तथा गुरु के पैरों को स्पर्श करके कहे यह मैं आपका शिष्य हूँ। चरक वि. अ. ८ में शिष्योपनयन-विधि निम्न प्रकार से दी है—एवं विधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत—अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्यहस्तश्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्यमुपलेपनमुदकुम्भांश्च गन्धहस्तोमाल्यदाम-प्रदीपहिरण्यहेमरजतमणिमुक्ताविद्रुमक्षौमपरिधिकुशलाजसर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसो ग्रथिताग्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्ठानादायोपनिष्ठस्वेति, अथ सोऽपि तथा कुर्यात् । तमुपस्थितमाज्ञाय समे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतुष्किष्कुमात्रं चतुरस्रंस्थण्डिलं गोमयोदकेनोपलिप्ते कुशास्तीर्णे सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्तचन्दनोदक-कुम्भक्षौमहेमहिरण्यरजतमणिमुक्ताविद्रमालंकृतं मेध्यभक्ष्यगन्धशुक्लपुष्पलाजसर्षपाक्षतोपशोभितं


१. उपनयन का अर्थ अध्ययन के लिये शिष्य को आचार्य के समीप लाने से है—अध्ययनार्थमाचार्यसमीपं नीयतेऽनेनेत्युपनयनम् ॥
२. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बे-चौड़े स्थान को कहते हैं। कहा भी है—
सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् ।
दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ (अनुवादक)
३. मुख्य होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती हैं उनमें से यज्ञ कुण्ड के उत्तर भाग में जो एक आहुति और यज्ञकुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी आहुति दी जाती है उसे 'आघाराज्याहुति' कहते हैं। जैसे 'ओं अग्नये स्वाहा । इदमग्नये—इदन्न मम' के द्वारा उत्तर भाग में तथा ओं सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय—इदन्नमम' के द्वारा दक्षिण भाग में आहुति दी जाती है। (अनुवादक)
४. जो कुण्ड के मध्य में आहुति दी जाती हैं उन्हें 'आज्यभागाहुति' कहते हैं। वे—'ओं प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये—इदन्न मम'। तथा ओं इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय—इदन्न मम ॥ इत्यादि दो आहुतियां हैं।
५. स्विष्टकृत होमाहुति एक ही होती हैं जो कि निम्न मन्त्र से घृत अथवा भात की दी जाती है—ओं यदस्य कर्मणोऽयरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वे स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्त हुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते—इदन्न मम ॥

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८५

कृत्वा, तत्र पाला-शीभिरिङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनविधिमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहुयादग्निमाशीः प्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति । शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान्स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् । इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—उपनयनीयस्तु ब्राह्मणः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त्तनक्षत्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थण्डिलमुपलिप्य गोमयेन दर्भैः सस्तीर्य रत्नपुष्पैर्लाजभक्तैरन्नैश्च पूजयित्वा देवता विप्रान् भिषजश्च तत्रोल्लिख्याभ्युक्ष्य दक्षिणाणं ब्रह्माणं स्थापयित्वाऽग्निमुपसमाधाय खदिरपलाशदेवदारुबिल्वानां समिद्भिश्चतुर्णां वा क्षीरिवृक्षाणां न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थमधूकानां दधिमधुघृताक्ताभिर्दार्वीहोमिकेन विधिना सप्रणवाभिर्महाव्याहृतिभिः स्रवेणाज्याहुतीर्जुहुयात् । प्रतिदैवतमृषींश्च स्वाहाकारं जुहुयात् । शिष्यमपि कारयेत् ॥३॥

अथ शिष्यगुणाः-क्षान्तिर्दाक्ष्यं दाक्षिण्यमानुकूल्यंशौचं कुले जन्म धर्मसत्याहिंसासामकल्याणज्ञान-विज्ञानस्थितिविनिवेशः पाटवं यथोक्तकारित्वं ब्रह्मचर्यमनुत्सेको लोभेर्ष्याविवर्जनमिति; अतोऽन्यथा दोषैः सवर्ज्यः ।।४।।

शिष्य के गुण—क्षमा, निपुणता, चतुराई, अनुकूलता, (आचार्य के अनुकूल होना), पवित्रता, उत्तमकुल में जन्म (कुलीनता), धर्म, सत्य, अहिंसा, साम (शान्ति), कल्याण, ज्ञान तथा विज्ञान की स्थिति प्रवेश, पटुता, यथोक्तकारित्व (आचार्य की आज्ञा के अनुसार कार्य करना), ब्रह्मचर्य, उत्सेक (गर्व-अहंकार) का अभाव और लोभ तथा ईर्ष्या का त्याग—ये शिष्य के गुण हैं । इसके विपरीत दोषों से युक्त शिष्य का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित शिष्य का ग्रहण नहीं करना चाहिये । चरक वि. अ. ८ में शिष्य के निम्न गुण दिये हैं—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादितः परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासावंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिण्मिनं धृतिमन्तममहंकृतं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसम्पन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमव्यसनिनमर्थतत्त्वभावकमकोपनं शीलशौंचाचारानुरागदाक्ष्यप्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थविज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितैषिणामाचार्यसर्वानुशिष्टप्रतिपत्तिकरमनुरक्तमेवगुणसमुदितमध्याप्यमेव हुः । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २ में कहा है—ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामन्यतममन्वयवयः शीलशौर्यशौचाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृति-मतिप्रतिपत्तियुक्तं तनुजिह्वौष्ठदन्ताग्रमृजुवक्त्राक्षनासं प्रसन्नचित्तवाक्चेष्टं क्लेशसहं च भिषक् शिष्यमुपनयेत् । अतो विपरीतगुणं नोपनयेत् ॥४॥

अथ गुरुः-धर्मज्ञानविज्ञानापोहापोहप्रतिपत्तिकुशलगुणसंपन्नः सौम्यदर्शनः शुचिः शिष्यहितदर्शी चोपदेष्टा च भिषकशास्त्रव्याख्यानकुशलस्तीर्थगतज्ञानविज्ञानः कल्योऽनन्यकर्माऽव्यावृत्तः शिष्यगुणा^१न्वितश्च । अतोऽन्यथा दौषैर्वर्ज्यः ।।५।।

गुरु या आचार्य के गुण—धर्म, ज्ञान विज्ञान, ऊहापोह (तर्क वितर्क) तथा प्रतिपत्ति (प्रागल्भ्य, प्रागुत्पन्नमतित्व अथवा युक्ति) में कुशल, गुणसम्पन्न (गुणी), जिसका दर्शन या आकृति सौम्य हो, पवित्र, शिष्यों के हितों का ध्यान रखनेवाला, उपदेशक, चिकित्सा शास्त्र के व्याख्यान में कुशल, ज्ञान तथा विज्ञान जिसे कण्ठस्थ हों, कल्प (मंगलकारी), जो और कोई कार्य न करता हो (अर्थात् शिष्यों को अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कोई आजीविकार्थ कार्य न करता हो), जिसने अध्यापन कार्य छोड़ा हुआ न हो (जिसे अध्यापन कार्य में रुचि हो) तथा जो पूर्वोक्त शिष्य में होने वाले गुणों से भी युक्त हो) इनके विपरीत दोषों से युक्त गुरु (आचार्य) का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित आचार्य अध्यापन कार्य के योग्य नहीं होता है । चरक वि. अ. ८ में आचार्य को निम्न गुणों से युक्त बताया है—ततोऽनन्तरमाचार्य


१. पूर्वोक्तैः शिष्यगुणैरपि यथासंभविभिर्युक्त इत्यर्थः ।

८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]


परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतपरिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति, एवंगुणों ह्याचार्यः सुक्षेत्रमार्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः सम्पादयति ॥५॥

अथ शिष्यानुशासनं—भोः सौम्येनानुकूलेन धार्मिकेण जितेन्द्रियेणाहूताध्यायिना च भवितव्यं, सर्वनिवेदिना समानदुःखेन देशकालज्ञेन धृतिमत्ता च भवितव्यं, लोभक्रोधमोहेर्ष्याप्रहासवैरमद्यमांसस्त्रीभ्यो निवर्त्तयि(र्त्ति)तव्यं, गुरुशुश्रूषाऽवशेषेणाध्येतव्यं, न चाननुज्ञातेन न चानभ्यर्च्य वा गुरुमसमाप्तविद्येन वा प्र^१चरितव्यम् ।।६।।

शिष्य के प्रति उपदेश—वत्स ! तुझे सौम्य, अनुकूल (आचार्य के अनुकूल), धार्मिक, जितेन्द्रिय, अध्ययन के लिये जिसे बुलाया जाय, सब कुछ मुझे कह देनेवाला (अर्थात् मुझसे कुछ न छिपाने वाला), समान दुःख वाले (अर्थात् मेरे दुख को अपना दुख समझने वाला), देश तथा काल का ज्ञान रखने वाला और धृतिमान् होना चाहिये। लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, प्रहास (दूसरे की हंसी मजाक उड़ाना), वैर, मद्य, मांस तथा स्त्री से दूर रहना चाहिये। गुरु की सेवा करते हुए अध्ययन करना चाहिये। गुरु से आज्ञा लिये बिना, उनकी अभ्यर्थना किये बिना तथा विद्या को पूर्ण रूप से समाप्त किये विना चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। चरक वि. अ. ८ में शिष्य के प्रति उपदेश का अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है—अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्—ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्मत्सरेणाशस्त्राधारिणा च भवितव्यम्, न च ते मद्द्वचनात्किंचिदकार्यं स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुला-दधर्म्यादनर्थसम्पयुक्ताद्वाऽप्यर्थात्, मदर्पणेन मत्प्रधानेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्भवितव्यं पुत्रवद्दासवदर्थिवच्चोपचर-ताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहितेनानन्यमनसा विनीतेनावैक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपान्वाहरणे यथाशक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमिच्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्मशासितव्यमहरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च सर्वात्मना चातुराणामारोग्ये प्रयतितव्यं जीवितहेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसोऽपि च परस्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छेदन भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च श्लक्ष्णशुक्लधर्म्यधन्यस यशस्यमर्हितमितवचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमत्ता ज्ञानोत्थानोपकरणसम्पत्सु नित्यं यत्नवता, न च कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वेषामत्यर्थं वकृतदुष्टदुःखशीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां मुमूर्षूणां च तथैवासन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्ष्ाणां वा, न च कदाचित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्तृऽथवाऽध्यक्षेण, आतुरंकुलं चानुप्राविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण सुसवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमत्ता स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्वमाचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियाणि न क्वचित् प्रणिधातव्यान्यत्रातुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्वन्येषु वा भावेषु न चातुरकुलप्रवृत्तयोबहिर्निश्शारयितव्याः, हसितं चायुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमानमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, ज्ञानवताऽपि च नात्यर्थमात्मनो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादत्यर्थमुद्विजन्त्यनके। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २ में कहा है—ततोऽग्निं त्रिः परिणीयाग्निसाक्षिकं शिष्यं ब्रूयात्—कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारेर्ष्यापारुष्यपैशून्यानृतालास्यायशस्यानि हित्वा, नीचनखरोम्णा शुचिना कषायवाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्याभिवादनतत्परेणाऽवश्यं भवितव्यं, मदनुमतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययनपरेण भूत्वा, मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम्, अतोऽन्यथा ते वर्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकाश्यं प्राप्नोति ॥६॥


१. चिकित्सार्थं व्यवहर्तव्यमित्यर्थः ।

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८७

अथाध्ययनविधिः—गुरुः शुचिरुद्धतहस्तः शुचौ देशे तद्वच्छिष्यायावहितायाथशब्दमोङ्कारं वा पूर्वं प्रयुज्य महाव्याहृतीरनूच्य सावित्रीं च त्रिभ्यस्याऽधीष्व भो इत्युक्ते(क्त्वा) रूपमेकं निगदेत्, तं चानुपठेत्, तच्छिष्यो रूपहतं संस्थाहतं च कुर्यात्^१, ग्रहणशक्त्यवेक्षः खण्डनसंदर्शनापूर्वग्रहणानि सोढुं यथोक्तश्रवणं तस्याभ्यासो धन्यः, धारणाध्यापनेनार्थतत्त्वाधिगमनं तु मोक्षाय । नानध्यायेष्वधीयीत, न गुरुव्यलीकेषु, न पर्वसु, न सन्ध्यायां, न विद्युदुल्कानभ्रवर्षाऽसूर्यदर्शनिषु (?), न महोत्सवे न भुक्तवान्, नाद्भुतदर्शने, न गोब्राह्मणगुरुपरात्मपीडायां, न पक्षिणीषु, नाप्यष्टकासु, नात्युच्चनाचप्लतक्लीबस्वरैः, नामुखाद् गुरोः, नालक्षितं, न संदिग्धं, न च क्षत्पिपासाव्याधिवैमनस्यादियुक्तोऽभ्यसेत् ।। ७ ।।

अध्ययन विधि—सबसे पूर्व गुरु पवित्र एवं उद्धत-हस्त होकर पवित्र स्थान पर सावधान हुए शिष्य के प्रति 'अथ' शब्द या ओङ्कार शब्दपूर्वक महाव्याहृतियों (ओं भूः स्वाहा, ओं भुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा, ओं भूर्भुवः स्वः स्वाहा इति) का उच्चारण करके तथा सावित्री (गायत्री मन्त्र) का तीन बार अभ्यास करके, 'वत्स पढ़ो' यह कहकर पहले किसी एक रूप (विषय) का उपदेश करे तथा उसको एकबार पुनः पढ़ाये (अर्थात् उसकी पुनः आवृत्ति कराये)। फिर उस उपदेश को शिष्य शब्द के स्वरूप तथा विषय की आवृत्ति द्वारा दृढ़ करे अर्थात् शिष्य उस उपदेश को अच्छी प्रकार याद करे। ग्रहणशक्ति के अनुसार खण्डन तथा संदर्शनपूर्वक ग्रहण किये हुए को सहना तथा यथोक्त श्रवण किये हुए का अभ्यास करना प्रशस्त होता है। उसके बाद उसे धारण करने तथा अध्यापन के द्वारा विषय के तत्त्व को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनध्याय (अवकाश) के दिनों में, यदि गुरु-आचार्य को पीडा-रोग हो, पर्व (त्यौहारों) में, दोनों सन्ध्याकालों में तथा बिजली गिरने, उल्कापात, अनभ्र-वर्षा, तथा सूर्य के दर्शन न होने पर, महोत्सव में, खाने के बाद, अद्भुत वस्तु के दर्शन के बाद, गौ-ब्राह्मण-गुरु-अन्य व्यक्ति या स्वयं (अपने आप) को पीडा (कष्ट) होने पर तथा पक्षिणी (अमावस्या तथा पूर्णमासी) और अष्टका (अष्टमी) आदि की उपस्थिति में नहीं पढ़ना चाहिये। तथा पढ़ते समय न अत्यन्त ऊँचे, न नीचे, न लुप्त तथा न क्लीब (नपुंसक) स्वर से पढ़ना चाहिये। गुरुमुख से बिना पढ़े, अलक्षित (जो बताया नहीं गया है) तथा संदिग्ध स्थल को भी नहीं पढ़ना चाहिये (अर्थात् उसका अभ्यास नहीं करना चाहिये) तथा भूख, प्यास, रोग तथा उदासीनता के समय भी नहीं पढ़ना चाहिये। चरक वि. अ. ८ में कहा है—तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमपस्पृश्योदकं देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो। मनःपुरःसराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरिक्रामन्पुनः पुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारपरदोषप्रमाणार्थम्, एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः। इसी प्रकार चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—न विद्युत्स्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं न तान्तं न विस्वरं नानवस्थितपदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिक्लिबं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरैरध्ययनमभ्यसेत् ॥७॥

अधीत्यानुज्ञातः प्रचरेच्छुक्लवासाः संह(य)तकेशोऽनुद्ध्वान्तो युगमात्रावलोकी पूर्वाभिभाषी सुमुखः । न चातुरुकुलमनाहूतः प्रविशेत्, प्रविशंश्च निमित्तानि लक्षयेत् । न च सर्वतोऽवलोकयेदन्यत्रातुरात् । न चातुरुकुलेषु स्त्रीभिः प्रेष्याभिरपि सहोपहासं गच्छेत्, न चासामपूजापुरस्कृतं नाम गृह्णीयात्, मान्यस्थानेनैव तु ब्रूयात्, न च ताभिः संव्यवहारमतिप्रणयं वा कुर्यात्, न च भर्तुरविदितं स्त्रीभ्यः किञ्चिदादद्यात्, न चाविदितः प्रति(वि)शेत्, न च रहसि स्त्रिया सह ब्रूयादासीत वा, न चैनां विवृतां प्रेक्षेत विहसेद्वा,


^१. गुरुरैकैकविषयस्वरूपमुपदिशेत्, पुनरप्युपदेशं सुबोधायावर्तयेत्, शिष्यस्तमुपदेशं शब्दस्वरूपावृत्त्या च दृढी कुर्यादिति भावः ॥

८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

प्रणयन्तीं चोपेक्षेत, न च प्रकाशयेत् । न चातुरकुलगुह्यं बहिःप्रकाशयेत्, नातुरकुलदोषान् प्रथयेत् । दृष्टारिष्टमपि चातुरं न तत्त्वं ब्रूयात्, नित्यमाश्वासयेत् । न मृत्युपरिगतशरीरमसाध्यरोगमनुपकरणं चोपगच्छेत्, नौषधमक्रमेणोपदिशेत्, न पराधीनं कुर्यात् । न स्वयं कृ¹तकमौषधं प्रयुञ्जीत, शरीरौषधव्याधिवयसां चावस्थान्तरज्ञः स्यात् । नित्यसंभृतधूपाम्नौषधः स्यात् । न चान्यभिषग्भिर्विरोधं गच्छेत् । संयुक्तश्च तैरौषधं प्रकल्पयेत् । प्रगल्भो निःशङ्क उपस्थितपदे विस्पष्टं विचित्रं मृदूपनयवद्ग्राहकमविरुद्धं धर्म्यं सदा ब्रूयात् । प्रजानां हि स्वस्तिकामो भिषगिह चामुत्र च नन्दत इति ।।८।।

शिक्षा ग्रहण करने के बाद आचार्य से अनुमति लेकर, शुभ्र वस्त्रों को धारण करके, बालों को ठीक करके, भ्रमरहित, युग (चार हाथ) मात्र दूरी तक देखने वाला (अर्थात् नीचे मुंह किये हुए), पहले बोलने वाला (अर्थात् परस्पर मिलने पर दूसरे के बोलने से पहले सत्कारयुक्त वचनों को बोलने वाला), तथा उत्तम एवं सुन्दर बात बोलने वाला होकर चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करे । रोगी के घर में बिना बुलाये प्रवेश न करे । तथा प्रवेश करते हुए निमित्तों को देखे । रोगी के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का अवलोकन न करे । रोगी के घर में स्त्रियों के साथ उपहास न करे । उनके द्वारा दी हुई पूजा (भेंट) को स्वीकार न करे । उचित ढंग से ही उनसे बातचीत करे । उनके साथ अत्यन्त व्यवहार तथा प्रीति न करे । पति के ज्ञान के बिना स्त्री से कोई वस्तु न ले । बिना ज्ञान के घर में प्रवेश न करे अर्थात् आगमन की सूचना दिये बिना रोगी के घर में प्रवेश न करे । स्त्रियों के साथ एकान्त में बातचीत न करे तथा उनके पास न बैठे । वस्त्रों से रहित अर्थात् नग्न अवस्था में उन्हें न देखे, न हंसे । यदि वह प्रीति करे तो उसकी उपेक्षा करे तथा उसके प्रति अपने भावों को प्रकट न करे । आतुरकुल की गुप्त (Private) बातों को बाहर प्रकाशित न करे । आतुरकुल के दोषों को न बढ़ाये । रोगी में अरिष्टलक्षणों का ज्ञान हो जाने पर भी रोगी से इस तत्त्व (वास्तविकता) का उल्लेख² न करें । उसे सदा आश्वासन देता रहे । मरणासन्न, असाध्य तथा उपकरण (धन आदि अथवा चिकित्सा के उपकरण) से रहित रोगी के पास न जाये तथा औषधक्रम (व्यवस्था) का उपदेश न करे । दूसरे के आधीन न रहे । स्वयं कृत्रिम ओषधि का प्रयोग न करे । शरीर, औषध, रोग तथा उम्र आदि की भिन्न २ अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करे । धूप, अञ्जन आदि ओषधियां पास में सदा तैयार रहनी चाहिये । दूसरे चिकित्सकों के साथ विरोध न करे अपितु उनके साथ मिलकर औषध व्यवस्था करे । अवसर उपस्थित होने पर सदा प्रगल्भ एवं निःशङ्क (सन्देह रहित) होकर अत्यन्त स्पष्ट, विचित्र, मृदु, उपनयवत् (नीतियुक्त), ग्रहण करने वाली, अविरुद्ध (जो परस्पर विरुद्ध न हो) तथा धर्मयुक्त वचन बोले । लोगों के कल्याण की कामना करने वाला वैद्य इहलोक तथा परलोक में सुखी होता है । चरक सू. अ. ८ में अत्यन्त विस्तार के साथ इन सब कर्तव्य कर्मों का निर्देश किया गया है ॥८॥

अथान्यो भिषगभि³षदेत्तस्मै क्षमेत, साम्ना चानुनयेत् । पुनः पुनः कुत्सयन्तं तु विगृह्यादितो ग्रन्थेनाऽवकिरेत्, न चास्य वाक्यावकाशं दद्यात् । ब्रुवतोऽपि प्रोक्तं च ब्रूयात्-नैतदेवमिति । परिहसेत्, अपशब्दांश्चास्य विगृह्णीयात्, अर्थे कृच्छ्रे चैनमवतारयेत्, न चैनमवशः परुषयेत्, स्तोत्रगभीरैर्वैनं धर्षयेदिति ।।९।। (इति ताडपत्रपुस्तके ७५ तमं पत्रम् )


१. कृतकं=कृत्रिमम् ।
२. आजकल कुछ लोग इस सिद्धान्त को मानने लगे हैं कि रोगी को रोग की वास्तविक्ता का ज्ञान अवश्य करा देना चाहिये जिससे वह अच्छीप्रकार परहेज तथा संयम से रह सके अन्यथा रोग की गम्भीरता का ज्ञान न होने पर वह उसकी उपेक्षा कर सकता है ।
३. अभ्यागच्छेदित्यर्थः ।

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८९

इसके बाद यदि कोई दूसरा वैद्य उसके साथ संभाषण करे तो उसे सहन करे तथा शान्ति द्वारा उसे समझाये। परन्तु यदि वह बार २ कुत्सित वचन बोले तो उसके साथ विगृह्य संभाषा का प्रयोग करे। तथा ग्रन्थों से भिन्न २ वाक्य उसके सामने बोले। और उसे बोलने का अवकाश (अवसर-मौका) ही न दे। यदि वह बोलता भी हो तो उसे कहे—यह ठीक नहीं है। उसकी हंसी करे, तथा उसके अशुद्ध शब्दों को पकड़ ले। तथा उसे कठिन विषय में ले जाये। अपने वश अथवा सीमा से बाहर होकर बहुत कठोर वचन न कहे। तथा स्तुति-गर्भ वाक्यों के द्वारा ही उसे नीचा दिखाये। चरक वि. अ. ८ में विवाद के विषय में लिखा है—तद्विधेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथितव्यं, अतिहृष्टं मुहुर्मुहुरुपहसता परं रूपयता च परिषदमाकारैर्बुवता चास्य वाक्यावकाशो न देयः, कष्टशब्दं ब्रुवता वक्तव्यो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना ते प्रतिज्ञा'। इति पुनश्चाहूयमानः प्रतिवक्तव्यः—परिसंवत्सरो भवापि शिक्षस्व तावत् पर्याप्तमेतावते, सकृदपि हि परिक्षेपकं निहतं निहतमाहुरिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचिदप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्यमित्याहुरेके, न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥९॥

भो भिषक् ! आयुः किं, किमायुर्वेदस्यायुर्वेदत्वं, किं चायुरित्युच्यते, कत्यङ्गश्चायुर्वेदः, कथं चाध्येयः, किमर्थं चाध्येय, किञ्चास्याद्यं तन्त्रं, कश्चैषां धुर्यः, कतमं च वेदं श्रयति, किं नित्योऽनित्यः, किमाश्रयश्चायुर्वेदः, कानि चैषां सु (स्व) लक्षणानि तत्रकृतीनां, तिसृणां च वेदनानामतीतवर्त्तमानानागतानां कतमां भिषक् चिकित्सति, किं चास्यायुर्वेद(स्य)साधनं, किं पुण्योऽपुण्यः ? इति पृष्टो वा प्रतिब्रूयात्—भोः तत्रायुर्जीवितमित्युच्यते ।। 'विद' ज्ञाने धातुः, 'विद्लृ' लाभे च, आयुरनेन ज्ञानेन विद्यते ज्ञायते, विन्दते लभ्यते न रिष्यतीत्यायुर्वेदः कत्यङ्गश्चायुर्वेद इति अष्टाङ्गः; तस्य कौमारभृत्यं कायचिकित्सा शल्याहर्तृकं शालाक्यं विषतन्त्रं भूततन्त्रमगदतन्त्रं रसायनतन्त्रमिति ।। अत्राह—अङ्गान्येतानि, शरीरमस्य कतमत्, यदाश्रयन्त्यङ्गानि, अङ्गानि हि शरीराश्रयाणि भवन्ति; अत्राह तस्य शरीरं धर्मः, धर्माश्रयं ह्यस्मिन् कर्म सिध्यतीति ।। कथं चोत्पन्न इति; आह—अथर्ववेदोपनिषत्सु प्रागुत्पन्नः; स्वयंभूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत् सर्ववित्, ततो विश्वानि भूतानि ततस्तं पुण्यमायुर्वेदमनन्तमायुषो वर्धनमाधारमाप्यायनममृतमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवशिष्ठात्रिभृगुभ्यः; ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुहिताथं धर्मार्थकाममोक्षशक्तिपरिपालनार्थं चेति, एवमुत्पन्नः ।। कथं चाध्येय इति, गुरोरनुमतेनेति ।। केन चाध्येय इति, ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रैरायुर्वेदोऽध्येयः ।। तत्रार्थपरिज्ञानार्थं पुण्यार्थं चात्मनः प्रजानुग्रहार्थं ब्राह्मणैः, प्रजासंरक्षणार्थं क्षत्रियैः, वृत्त्यर्थं वैश्यैः, शुश्रूषार्थमितरैः धर्मार्थं च सर्वैः । सुखजीवितदानं हि सर्वधर्मेभ्याधिकं ब्रुवते; ततश्च पुण्य एवमायुर्वेदः । सुखजीवितदानतुष्टाश्च देहिनः कृतज्ञाय संविभजन्ति पुरःस्तुवन्ति च; तदस्य धर्मार्थकामनिर्वर्तकं भवतीति किमर्थं चाध्येय इत्यत्रोक्तम् ।। किंचास्याद्यं तन्त्रमिति ?

कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते ।
आयुर्वेदस्य महतो देवानाभिव हव्यपः ।।

अनेन हि संवर्धितमितरे चिकित्सन्ति । बालस्य हृद्यमौषधमन्यत्, प्रमाणमन्य (दन्य) उपक्रमोऽन्ये च विशेषाः ।। कं च वेदं श्रयति ? अथर्ववेदमित्याह; तत्र हि रक्षाबलिहोमशान्ति ........ प्रतिकर्मविधानमुद्दिष्टं विशेषेण, तद्वदायूर्वेदे, तस्मादथर्ववेदं श्रयति । सर्वान् वेदानित्येके, पद्यगद्यकथ्येगेयविद्याश्रयादिति; न चैतदेवम्, आयुर्वेदमेवाश्रयन्ते वेदाः । तद्यथा—दक्षिणे पाणौ चतसृणामङ्गुलीनामङ्गुष्ठ आधिपत्यं कुरुते, न च नाम ताभिः सह समतां गच्छति, एकस्मिंश्च पाणौ भवति, एवमेवायमृग्वेदयजुर्वेदसामवेदाथर्ववेदेभ्यः


१. आयुर्वेदो धर्म्योऽधर्म्यो वेत्यर्थः ।

१०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]

पञ्चमो भवत्यायुर्वेद इति । किं कारण ? यथा हि वेदेषु सतत ब्रह्मज्ञैस्त्रिवर्गसंयुक्त पुरुषनिश्रेयसं चिन्त्यते, एवमेवास्मिन्नपि वेदे निदानोत्पत्तिलिङ्गारिष्टचिकित्सितैः सततमेव हितसुखकरं त्रिवर्गसारभूतं पुरुषनि श्रेयसं चिन्त्यते; तद्यथा च विविधविज्ञानज्ञानोपपन्ना भाष्यवचनविदोऽष्टाङ्ग्या बुद्धयोपपन्ना लङ्घनप्लवनस्थानासनगमनागमनसमर्था अपि च नाम मनुष्या अदेशज्ञानवन्तो नित्यमेव देशज्ञं दैशिकमन्वयुरेवमेव खलु वेदनासु शिक्षाकल्पसूत्रनि ऋग्वृत्तच्छन्दोयज्ञसंस्तरज्ञानसमुच्चयविशेषज्ञा आयुर्वेदमेवानुधावन्ति, तस्माद्ब्रूमः— ऋग्वेद्यजुर्वेदसामवेदार्थर्ववेदेभ्यः पञ्चमोऽयमायुर्वेदः । यतश्च व्याधितस्यारोग्यमरोगस्य च शेषाः क्रिया धर्मार्थकाममोक्षेषु निर्वर्तन्ते । किं नित्योऽनित्य इति, (नित्य इति ब्रूमः) कुतः ? आर्षवचनप्रामाण्यादविनाशित्वात् सा^१ध्यासिद्धेर्देशकालसामान्यादिति ।। किमाश्रय इति, वातपित्तकफाश्रयः । ते च द्वे द्वे देवते श्रिताः; मारुतमाकाश च वातः श्रियः; अग्निमादित्यं च पित्तं, सोमं वरुणं च कफः; तास्तेषां देवताः । धर्मार्थकामानित्येके, सत्त्वरजस्तमांसीत्येके, साध्ययाप्यासाध्यत्वमित्येके ।। कानि चैषां स्वलक्षणानि तत्प्रकृतीनामित्यत्रोच्यते । तत्र श्लेष्मा स्निग्ध ..........................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ७६ तमं पत्रम्^२ ।)

(विमानस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)


विवाद प्रारंभ हो जाने पर दूसरे वैद्य से निम्न प्रश्न करे—हे वैद्य ! आयु क्या है ? आयुर्वेद का आयुर्वेदत्व क्या है ? आयु किसे कहते हैं ? आयुर्वेद के कितने अङ्ग हैं ? इसका किस प्रकार तथा किस प्रयोजन के लिये अध्ययन करना चाहिये ? इसका सबसे श्रेष्ठ तन्त्र (ग्रन्थ) कौनसा है ? इनमें धुरी (अग्रणी) कौन है ? यह आयुर्वेद किस वेद पर आश्रित है ? यह नित्य है या अनित्य ? आयुर्वेद का क्या आश्रय है ? उनकी प्रकृतियों के अपने लक्षण क्या हैं ? अतीत, वर्तमान तथा अनागत (भावी) वेदनाओं में से वैद्य किसकी चिकित्सा करता है ? इस आयुर्वेद का साधन क्या है ? यह पुण्यकारक है अथवा अपुण्यकारक ? इत्यादि । यदि ये ही प्रश्न उससे पूछे जायं तो वह उत्तर देवे—हे वैद्य ! जीवन को आयु कहते हैं । आयुर्वेद आयु शब्द से 'विद ज्ञाने' अथवा 'विन्दॢ लाभे च' धातु से बना है। इसका अर्थ है कि जिस ज्ञान के द्वारा आयु का ज्ञान प्राप्त हो अथवा आयु की प्राप्ति हो—उसका नाश न हो उसे आयुर्वेद कहते हैं । आयुर्वेद के कितने अङ्ग हैं इस प्रश्न का उत्तर—उसके आठ अङ्ग हैं । उदाहरणार्थ—कौमारभृत्य, कायचिकित्सा, शल्यहरण (शल्यचिकित्सा), शालाक्य, विषतन्त्र, भूततन्त्र, अ^३गदतन्त्र तथा रसायनतन्त्र । यहां यह प्रश्न है कि ये अङ्ग हैं तो इसका शरीर कौनसा है जिसका ये अङ्ग आश्रय लेते हैं क्योंकि अङ्ग शरीर का आश्रय लेकर स्थित होते हैं । उत्तर—धर्म उसका शरीर है । धर्म के आश्रित होकर इसकी क्रियाएं सिद्ध होती हैं । आयुर्वेद कैसे उत्पन्न हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं—यह पहले अथर्ववेदोपनिषत् में उत्पन्न हुआ । सब कुछ जानने वाले स्वयंभू ब्रह्मा ने लोगों को उत्पन्न करने की इच्छा से उनकी रक्षा के लिये पहले आयुर्वेद की रचना की । उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियों की रचना की । तदनन्तर ब्रह्मा ने उस पुण्यकारक,


१. 'साध्यसिद्धेः' इति पाठो युक्तः, फलनिष्पत्तेरिति तदर्थः । साध्यासिद्धेरिति तु वाद्यभिमतस्यानित्यत्वरूपसाध्यस्यासिद्धिरित्यर्थेन संगमनीयम् ।
२. असाग्रे पत्रद्वयग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके ।
३. इन आठ अङ्गों में वाजीकरण का उल्लेख नहीं किया गया है । तथा विष विज्ञान के लिये विषतन्त्र तथा अगदतन्त्र दो शब्दों का प्रयोग किया गया है । ऐसा संभवतः प्रकाशन के समय भ्रमवश हो गया है । इसलिये यहां अगदतन्त्र या विषतन्त्र दोनों में से किसी एक के स्थान पर वाजीकरण शब्द का पाठ होना चाहिये ।

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ९१

अनन्त, आयु को बढ़ाने वाले, आयु के आधार तथा तृप्त करने वाले और अमृतरूप आयुर्वेद का अश्विनीकुमारों को उपदेश दिया। अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को, इन्द्र ने कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु नामक चार ऋषियों को, तथा उन्होंने हित के लिये एवं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा शक्ति की रक्षा के लिये अपने पुत्रों तथा शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार यह आयुर्वेद उत्पन्न हुआ है। इसका अध्ययन कैसे करना चाहिये ? इसका उत्तर-गुरु की अनुमति से। किसको इसका अध्ययन करना चाहिये ? इसका उत्तर-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों को इसका अध्ययन करना चाहिये। ब्राह्मणों द्वारा इसका अध्ययन, विषय के ज्ञान, पुण्य तथा अपने और लोक कल्याण के लिये करना चाहिये। क्षत्रियों द्वारा लोकसंरक्षण के लिये। वैश्यों द्वारा वृत्ति (आजीविका) के लिये तथा शूद्रों द्वारा सेवा के लिये अथवा सब वर्णों द्वारा धर्म के लिये इसका अध्ययन करना चाहिये। सुख (स्वास्थ्य) एवं जीवन का दान सब धर्मों से श्रेष्ठ माना गया है इसलिये यह आयुर्वेद पुण्य है। (सुख स्वास्थ्य) तथा जीवनदान से सन्तुष्ट हुए लोग कृतज्ञ हो जाते हैं तथा स्तुति करते हैं इस प्रकार इसके धर्म, अर्थ तथा काम की निर्वृत्ति होती^२ है। इसका आद्य (श्रेष्ठ अथवा प्रारम्भिक) तन्त्र कौनसा है ? इसका उत्तर देते हैं—जिस प्रकार सब देवताओं में अग्नि को श्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार इस महान् आयुर्वेद के आठ तन्त्रों में कौमारभृत्य श्रेष्ठ माना गया है। इस कौमारभृत्य के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हुए अन्य लोग भी चिकित्सा करते हैं। साधारण व्यक्ति (Adult) की अपेक्षा बालक की ओषधि हृद्य (हृदय को अच्छी लगने वाली—रोचक—Tasteful) होनी चाहिये। उसकी ओषधि का प्रमाण (मात्रा) भी भिन्न होता है, उपक्रम (चिकित्सा) भी भिन्न होती है तथा अन्य भी बहुत से अन्तर होते हैं। यह किस वेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार कौनसा वेद है ? इसका उत्तर देते हैं—अथर्ववेद। अथर्ववेद में विशेषरूप से रक्षा, बलि, होम, शान्ति ...... आदि द्वारा चिकित्सा-विधान का उल्लेख किया गया है। उसी प्रकार आयुर्वेद में भी रक्षा, बलि, होम, शान्ति आदि का उल्लेख है। इसलिये यह आयुर्वेद अथर्ववेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार अथर्ववेद है^३। कुछ आचार्य कहते हैं कि आयुर्वेद में पद्य, गद्य, कथा, गेय, विद्या आदि होने से आयुर्वेद के आधार सब (चारों) वेद हैं। परन्तु यह ठीक नहीं हैं। वेद आयुर्वेद के ही आश्रित हैं। उदाहरणार्थ—जिस प्रकार दक्षिण हाथ में चारों उंगलियों में अंगूठा अधिपति होता है तथा उन उंगलियों के समान नहीं होता अर्थात् उंगलियों से उसकी विशेषता रहती है उसी प्रकार यह आयुर्वेद भी ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेदों से भिन्न पांचवां वेद कहलाता


१. चरक में शूद्रों को पृथक् नामपूर्वक आयुर्वेद के अध्ययन का विधान नहीं दिया गया है। सूत्रस्थान अ. ३० में कहा है—स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यवैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्मणैः, आरक्षार्थं राजन्यैः, वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः । २. सम्पूर्ण प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसे स्थान २ पर पुण्य शब्द द्वारा ही कहा गया है क्योंकि इसके द्वारा प्राणिय का इहलोक तथा परलोक दोनों में हित होता है। चरक सू.अ. १ में कहा है—तस्यायुषो पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ।। आयुर्वेद का उद्देश्य आयु अथवा स्वास्थ्य प्रदान करना है। संसार में इससे बढ़कर पुण्यजनक कार्य और कोई नहीं हो सकता है। सुश्रुत में कहा है सनातन त्वाद्वेदानांमक्षरत्वात्तथैव च । तथा दृष्टफलत्वाच्च हितत्वादपि देहिनाम् ।। वाक्समूहार्थविस्तारात् पूजितत्वाच्च देहिभिः । चिकित्सितात्पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः । इसी प्रकार—यदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्य वृत्तिकरं चेति । अन्यत्र भी कहा है—लक्षत्रियविद्शूद्रान् रोगार्तान् परिपाल्य च । यत्पुण्यं महदाप्नोति न' तत्सर्वैर्महामखैः ।। तस्माद्रोगापवर्गार्थं रोगात्तं समुपाचरेत् । इत्यादि । अर्थात् यथाविधि आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन कर उसके अनुसार चिकित्सा कार्य के द्वारा असीम व्यक्तियों को स्वाथ्य प्रदान करने से व्यक्ति अनन्त पुण्य का भागी होता है। इसलिये आयुर्वेद पुण्यकारक ही माना गया है। ३. सुश्रुत सू. अ. १ में भी कहा है—इह खल्वायुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्व दस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयंभूः । इसीप्रकार चरक में भी आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना है परन्तु कई आचार्य इसे ऋग्वद का उपवेद भी मानते हैं।

९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

है। उसका कारण यह है कि जिस प्रकार वेदों में ब्रह्मज्ञ ऋषियों द्वारा त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) युक्त पुरुष निश्रेयस (मोक्ष) का विचार किया गया है उसी प्रकार इस वेद (आयुर्वेद) में भी निदान, रोगोत्पत्ति, लक्षण, अरिष्ट तथा चिकित्सा द्वारा हितकारी, सुखकारक तथा त्रिवर्ग के सारभूत पुरुष-निश्रेयस का ही विचार किया गया है। और जिस प्रकार विविध ज्ञान-विज्ञान से युक्त, भाष्य वचन आदि के पण्डित, अष्टाङ्ग बुद्धि से युक्त, लङ्घन (लांघना), प्लवन (तैरना), स्थान, आसन, गमन (जाना) तथा आगमन (आना) आदि क्रियाओं में समर्थ होते हुए भी मनुष्य देश (स्थान) का ज्ञान न होने पर सदा उस स्थान के जानने वाले तथा वहां के निवासी (Native) के ही पास पहुंचते हैं उसी प्रकार शिक्षा, कल्प, सूत्र, निरुक्त, वृत्त, छन्द, यज्ञसंस्तर तथा ज्ञानराशि के विशेषज्ञ भी वेदना (कष्ट-रोग) होने पर आयुर्वेद की ही शरण में आते हैं। इस लिये कहते हैं कि ऋग्, यजु, साम तथा अथर्ववेद से भिन्न यह आयुर्वेद पञ्चमवेद कहलाता है। क्योंकि रोगी मनुष्य का आरोग्य (स्वास्थ्य) तथा स्वस्थ मनुष्य की शेष (सम्पूर्ण) क्रियाए धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में निवृत्त हो जाती है अर्थात् स्वस्थ एवं रोगी प्रत्येक व्यक्ति के लिये धर्मार्थकाममोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थ ही चरम ध्येय होता है। आयुर्वेद नित्य है या अनित्य ? इसका उत्तर देते हैं—आर्ष वचनों के प्रमाणों से, अविनाशी होने से, साध्या-सिद्धि-वादी के अभिमत की अनित्यत्व रूप सिद्धि (‘साध्यसिद्धि’ यह पाठ भेद होने पर ‘फलनिष्पत्ति’ यह अर्थ होगा जो कि अधिक उपयुक्त है) तथा देश और काल की समानता से यह आयुर्वेद नित्य है। इस आयुर्वेद का आश्रय (आधार) क्या है ? इसका उत्तर वात, पित्त तथा कफ इसके आश्रय हैं। वे वात, पित्त तथा कफ दो २ देवताओं का आश्रय करके रहते हैं। वात—मारुत (वायु) तथा आकाश देवता के, पित्त—अग्नि तथा आदित्य देवता के तथा कफ—सोम और वरुण देवता के आश्रित होता है। ये सब इनके देवता हैं। कुछ लोग इस उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं कि आयुर्वेद के आधार धर्म कथा काम हैं। कुछ कहते हैं—सत्त्व, रज तथा तम इसके आधार हैं तथा कुछ कहते हैं—साध्य, याप्य तथा असाध्य इसके आधार हैं। इन प्रकृतिस्थ वात, पित्त तथा कफ के स्व (अपने) लक्षण क्या होते हैं ? इसका उत्तर देते हैं—इनमें से श्लेष्मा स्निग्ध ...... (होती है)।

वक्तव्य—यह अध्याय मध्य में ही खण्डित हो गया है। यहां पर “तत्र श्लेष्मा स्निग्धः’ इत्यादि वाक्यांश को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसके आगे प्रकृतिस्थ श्लेष्मा, पित्त तथा वात के लक्षण दिये गये होंगे। तथा अध्याय के प्रारम्भ में किये गये प्रश्नों को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रश्न के उत्तर के बाद—(i) “त्रिषूणां च वेदनानामतीतवर्तमानानागतानां कतमां भिषक् चिकित्सति’’ तथा (ii) “किं चास्यायुर्वेद (स्य) साधनम्’’ इत्यादि प्रश्नों के उत्तर दिये गये होंगे। इस ग्रन्थ के खण्डित होने से पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन प्रश्नों के उत्तर अन्य चरक, सुश्रुत आदि आर्षग्रंथों के आधार पर यथाशक्ति देने का प्रयत्न करेंगे। सर्वप्रथम हम प्रकृतिस्थ वात, पित्त, कफ के लक्षण कहते हैं। प्रकृतिस्थ कफ के लक्षण—चरक वि. अ. ८ में कहा है—श्लेष्मा हि स्निग्धश्लक्ष्णमृदुमधुरसारसान्द्रमन्दस्तिमितगुरुशीतपिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः मृदुत्वाद् दृष्टिसुखसुकुमारावदातगात्राः, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वगात्राः, मन्दत्वान्मन्दचेष्टाहारविहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भाल्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वात्साराधिष्ठितावस्थितगतयः शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासन्तापस्वेददोषाः, पिच्छिलत्वात्सुश्लिष्टसारसन्धिवन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च, त एवं गुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो विद्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति। कफ स्निग्ध, श्लक्ष्ण, मृदु, मधुर, सार (प्रसादरूप), सान्द्र मन्द, स्तिमित, गुरु, शीतल, पिच्छिल तथा स्वच्छ होता है। श्लेष्माधिक पुरुष उपर्युक्त गुणों के कारण बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त एवं दीर्घायु होते हैं। प्रकृतिस्थ पित्त के लक्षण—पित्त मुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च, तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णासहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूतपिप्लुव्यङ्गतिलपीडकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालित्यदोषाः, प्रायोमृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपराक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः,

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]विमानस्थानम्९३

क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः, द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिवन्धमांसाः, प्रभूतसृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च, विस्रत्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरः-शरीरगन्धाः, कट्वम्लत्वादल्पशुक्रव्यवायापत्याः, त एवं गुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञानविज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति। पित्त-उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, आमगन्धि, अम्ल और कटु होता है। पित्ताधिक पुरुष इन गुणों के कारण मध्य बलवाले, मध्यम आयु वाले तथा ज्ञान-विज्ञान एवं उपकरण में भी मध्यम होते हैं। प्रकृतिस्थ वात के लक्षण—वातस्तु रूक्षलघुचलबहुशीघ्रशीतपरुषविशदः, तस्य रौक्ष्यादातालरूक्षापचितल्पशरीराः, प्रततरूक्षाक्षामभिन्नमन्दसक्तजर्जरस्वराः, जागरूक़ाश्च, लघुत्वाच्च, लघुचपलगतिचेष्टाहाराः, चलत्वादनवस्थितसन्धयस्थिभ्रूहन्वोष्ठजिह्वाशिरःस्कन्धपाणिपादाः, बहुत्वान्द्रहुप्रलाप कण्डरासिराप्रतानाः, शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भक्षोभविकाराः, शीघ्रत्रासरागविरागाः, श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः, पारुष्यात्परुषकेशश्मश्रुरोमनखदशनवदनपाणिपादाङ्गाः, वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः सततसन्धि-शब्दगामिनश्च भवन्ति, त एवं गुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्पबलाश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधन्याश्च भवन्ति। वात रूक्ष, लघु, चल, बहुत शीघ्र, शीतल, परुष तथा विशद होता है। वातल पुरुष इन गुणों के कारण अल्पबल, अल्पायु, अल्प सन्तान वाले, अल्प साधन वाले तथा निर्धन होते हैं। अब हम अतीत, वर्तमान तथा भावी वेदनाओं (रोगों) में से चिकित्सक किस वेदना की चिकित्सा करता है ? इसका उत्तर देते हैं—चरक शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में अग्निवेश पुनर्वसु आत्रेय से प्रश्न करते हैं—अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां का चिकित्सति। अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम् ॥ भविष्यन्त्या असम्प्राप्तिरतीताया अनागमः। साम्प्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तेः संशयो ह्यतः॥

वैद्य रोगी के भूत, वर्तमान अथवा भविष्यत् (भावी) तीन प्रकार के रोगों में से किस रोग की चिकित्सा करता है। वास्तव में वह इनमें से किसी भी रोग की चिकित्सा नहीं करता है। भविष्यत् की तो चिकित्सा वह कर ही नहीं सकता क्योंकि वह तो अभी उपस्थित ही नहीं हुई है। अतीत रोग पुनः लौटकर वापिस नहीं आ सकता तथा वर्तमान रोग भी “प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम्” के अनुसार स्थिर नहीं रह सकता अर्थात् सब भावों का स्वभाव नित्य गमन करने वाला है। काल भी नित्य गति करने वाला है। इस प्रकार रोगी के रोग की अवस्था तथा संवत्सरात्मक काल दोनों के नित्यग होने से वर्तमान रोग की भी चिकित्सा नहीं हो सकती अतः हमें यह सन्देह होता है कि इस अवस्था में वैद्य रोगी के किस रोग की चिकित्सा करता है ? भगवान् आत्रेय इस प्रश्न का उत्तर देते हैं—चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति। यया युक्त्या वदत्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ वैद्य रोगी के तीनों कालों के रोगों की चिकित्सा करता है। इसमें निम्न युक्ति है—पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः। पुनः स कालो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता। एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम्। कालाश्रयमतीतानामार्तीनां पुनरागतः ॥ तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत्प्रयुज्यते। अतीतानां प्रशमनं वेदनानां तदुच्यते ॥ आपस्ताः पुनरागुर्मा याभिः शस्यं पुरा हतम्। यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽश्रये ॥ अतीत वेदनाओं की चिकित्सा में युक्ति-अर्थात् फिर वही सिर का दर्द आगया, फिर वही ज्वर आ गया, फिर वही खांसी आ गई, फिर वही कै (वमन) आगई। इस प्रकार लोक में कहा जाता है। इन प्रसिद्ध वचनों से अतीत वेदनाओं का पुनः वापिस आना माना जाता है। इन अतीत वेदनाओं के पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर जो औषध प्रयुक्त होती है वह अतीत वेदनाओं को शान्त करने वाली कहाती है। खेती को नष्ट करने वाली अतीत वर्षा का ध्यान कर के जिस प्रकार बांध बांधा जाता है उसी प्रकार अतीत पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर शरीर वा मन में चिकित्सा की जाती है। यह अतीत प्रशमन चिकित्सा (Preventive treatment) कहलाती है।

अनागत (भावी) वेदना की चिकित्सा में युक्ति—पूर्वरूपं विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम्। या क्रिया क्रियते सा च वेदनां हन्त्यनागताम् ॥ उत्पन्न होने वाली व्याधियों के पूर्वरूप को देखकर जो चिकित्सा की जाती है वह भावी रोग को नष्ट करती है। वर्तमान रोग की चिकित्सा का सिद्धान्त—पारम्पर्यानूबन्धस्तु दुःखानां विनिवर्तते। सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समतां न च। हेतुभिः सदृशा नित्यं जायन्ते देहधातवः ॥ सुख या आरोग्य

९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

के हेतु के सेवन से दुखों या रोगों का प्रवाहरूप से अनुबन्ध निवृत्त हो जाता है, तथा सुख व आरोग्य की प्रवृत्ति होती है। अर्थात् विषमहेतुओं के सेवन से उत्पन्न हुई दुःखों या रोगों की परम्परा सुख हेतु का सेवन करने से दुखों के अभाव में सब भावों के क्षणभङ्गुर होने से स्वयमेव नष्ट हो जाती है। इस प्रकार सुखकारक या आरोग्यहेतुओं के सेवन करने से शरीर में समधातुओं की ही परम्परा चल पड़ती है तथा शरीर स्वस्थ हो जाता है। समधातुएँ स्वयमेव विषम नहीं हो सकती हैं तथा विषम धातुएं अपने आप सम नहीं हो सकती हैं। देह की धातुएँ सदा हेतुओं के सदृश ही उत्पन्न होती हैं अर्थात् यदि हेतु विषम हैं तो देहधातुएं विषम हो जायेंगी और यदि हेतु (स्वस्थवृत्त आदि) सम हैं तो धातुएँ सम उत्पन्न होंगी। स्वस्थवृत्त आदि समहेतुओं के होने से समता का ही अनुबन्ध रहता है इसलिये शरीर स्वस्थ रहता है।

इन उपर्युक्त युक्तियों के अनुसार चिकित्सक त्रिकालवेदना की ही चिकित्सा करता है। इसलिये भगवान् आत्रेय अन्त में कहते हैं—युक्तिमेतां पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदनां भिषक्। हन्तीति ............ अब हम आयुर्वेद के साधन क्या हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। साधन कारण को कहते हैं। चरक में धातुसाम्यरूपी कार्य अथवा साध्य को निष्पन्न करने के लिये कारणभूत ६ पदार्थों का वर्णन किया गया है। वे कारण भूत ६ पदार्थ ही साधन माने जाते हैं। वे साधन-सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, कर्म तथा समवाय हैं। इन छओं के द्वारा धातुसाम्यरूपी कार्य (स्वास्थ्य) सम्पादन होता है। चरक सू.अ. १ में उपर्युक्त छओं साधनों (कारणों) का विस्तृत विवेचन करने के बाद भगवान् आत्रेय उपसंहार करते हुए कहते हैं—इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते। धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्।। आयुर्वेद शास्त्र का प्रयोजन धातुसाम्य अथवा आरोग्य है तथा उस धातुसाम्यरूपी प्रयोजन अथवा कार्य को सिद्ध करने के लिये उपर्युक्त सामान्य आदि ६ कारण साधनरूप में माने जाते हैं। इस प्रकार ये आयुर्वेद शास्त्र के साधन बताये गये हैं।

चतुर्थं शारीरस्थानम्

................................ तस्मात् पञ्चैव खलु ऋतवोऽपि, तदनुपपत्तेर्नास्ति षट्त्वमिति; अत्रोच्यते—रसार्थमेषां षट्त्वं रसविमाने प्रोक्तम् ।

................................

इसलिये ऋतुयें भी पांच ही होती हैं। उसकी उपपत्ति न होने से छठी ऋतु नहीं होती। रस के प्रयोजन के लिये ऋतुएँ ६ होती हैं जिसका कि रसविमान (खण्डित भाग) में वर्णन किया गया है ।।

स कः$^१$ कलासमूहं कालं द्विविधमकल्पयत्—शुभं चाशुभं च, तौ तुल्यप्र(परि)माणौ भूतवर्तमानअनागत-विभागात् । तत्र शुभ उत्सर्पिणी$^२$, अशुभोऽवसर्पिणी; ते पुनरुभे त्रिविधे युगभेदेन—आदियुगं देवयुगं कृतयुगमित्युत्सर्पिणी, त्रेताद्वापरकलियुगान्यवसर्पिणी; तयोरानन्त्यात् परिमाणं नोच्यते । तत्रादियुगदेवयुगेऽचिन्त्यप्र(परि)माणोद्भवो कर्मभोजनपानगतिवीर्यायुषि अनिर्देश्ये । कृतयुगे तु नारायणं नाम देहिनां संहननं शरीरमुत्पद्यते; तस्मात्तदाहुः—तस्य घनं निष्कपालं शिरः, अस्थीनि च सत्त्वास्पदान्याकृतयो वज्रगरीयस्यः, हृदि चास्य महासिरा दशैव, त्वगस्य शिरश्चाभेद्यमच्छेद्यं, सर्वतोऽस्य शुक्रं, योजनं चास्योत्सेधः, सप्तरात्रं चास्य गर्भवासः, सद्योजातस्य चास्य सर्वकर्माणि शक्यानि भवन्ति, न चैनं क्षुत्पिपासाश्रमग्लानिशोकभयेर्ष्याऽधर्मचिन्ताधिव्याधिजरा बाधन्ते, न च स्तन्यवृत्तिर्भवति, धर्मतपोज्ञान-विज्ञानस्थितियुक्तिश्राति भवति । तस्य पलितोपमार्थ(?)मायुरुत्कृष्टमाहुरिति ।। अथ त्रेतायामर्धनारायणं नाम देहिनां संहननं शरीरमुत्पद्यते । तस्यैकास्थिप्रायं शरीरमाकुञ्चनप्रसारणवर्ज्यं, गर्भवासोऽस्याष्टमासिकः, स्तन्यजीविका च, द्वे शिरस्कपाले, पार्श्वयोरेकैकः सन्धिः उरसि च, त्र्यस्थि पृष्ठं, कोष्ठस्य सिरा विंशतिः, शुक्रं च, पलितोपम(?)चतुर्भागमायुरुत्कृष्टं पूर्वाच्चार्धगुणावसर्पणमिति ।। अथ द्वापरे कैशिकसंहननं शरीरमुत्पद्यते केशमात्राणुसुषिरास्थि, अतिक्षिप्तसन्धि, महाहस्तिबलः(लं), सिरानुवेष्टितगात्रः(त्रं), गात्रसन्धिषु चास्य शुक्रं, पलितोपमा(?)ष्टभागमायुरुत्कृष्टं पूर्वाच्चार्धगुणावसर्पणमिति ।। अथ कलियुगे प्रज्ञप्तिपिशितं संहननं शरीरमुत्पद्यते । तस्य षष्टिश्च त्रीणि चास्थिशतानि भृशसुषिराणि मज्जपूर्णानि नलवदासन्नबधानि$^३$, चत्वारि मांसपेशीशतानि, सप्त सिराशतानि हृदयमूलानि, नव स्नायुशतानि मस्तुलुङ्गमूलानि, द्वे धमनीशते तालुमूले, सप्तोत्तरं मर्मशतं, त्रीणि महामर्माणि, दश प्राणायतनानि, पञ्च हृदयानि, त्रीणि सन्धि-शतान्येकाशीता(त्यधिका)नि, चतुर्दश कण्डराः, कूर्चा द्विचत्वारिंशत्, षट त्वचः, सप्त धातवः स्रोतांसि द्विविधानि, जातस्य पृथग्दन्तजन्म, दशमासं गर्भवासः संवत्सरादूर्ध्वं प्रतिष्ठतति, वाचं च विसृजति; तस्य वर्षशतमायुरुत्कृष्टं, सुखदुःखधिव्याधिजरामृत्युपरिगतः, .... सर्वगात्रः, क्षुत्पिपासागौरवश्रमशैथिल्य-चित्तेर्ष्यारोषानृतलौल्यपरिक्लेशमोहवियोगप्रायः, संसारगोचरः, आबाधबहुल इति द्वे द्वे युगे सत्त्वरजस्तमोन्वये विद्धि । इति पुरुषस्य सृष्टिकारणमुक्तम् ।।


१. कः ब्रह्मा ।
२. जो स्वयं वृद्धि को प्राप्त होता है अथवा क्रमशः आयु आदि भावों को बढ़ाता है उसे उत्सर्पिणी अथवा उन्नतिकाल कहते हैं। जो स्वयं क्षीण होता है अथवा क्रमः आयु आदि भावों को क्षीण करता है उसे अवसर्पिणी या अवनतिकाल कहते हैं।
३. नलबद्धङ्गुराणीत्यर्थः ।


२९ का.सं.

९६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्अध्याय: ? ]

ब्रह्मा ने कलाओं के समूहरूप काल को शुभ और अशुभ दो प्रकार का बनाया । ये शुभ और अशुभ काल भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् के भेद से समान परिमाण वाले होते हैं। इनमें शुभ काल को उत्सर्पिणी तथा अशुभ काल को अवसर्पिणी कहते हैं। ये दोनों पुन: युगभेद से तीन प्रकार के हैं। उत्सर्पिणी के आदियुग, देवयुग तथा कृतयुग ये तीन भेद हैं। इसी प्रकार अवसर्पिणी के त्रेता, द्वापर एवं कलियुग-ये तीन भेद हैं, युगों के अनन्त होने से इनका परिमाण नहीं कहा गया है। आदियुग तथा देवयुग का परिमाण अचिन्त्य होने से इनके कर्म, भोजन, पान, गति वीर्य तथा आयु का निर्देश संभव नहीं है। कृतयुग में मनुष्यों का नारायण नाम का शारीरिक संहनन उत्पन्न होता है। इसलिये उसके लक्षण कहते हैं—उसका सिर घन (ठोस) तथा कपाल रहित होता है, अस्थियां सत्व से युक्त होती हैं, आकृतियां वज्र के समान श्रेष्ठ (स्पष्ट) होती हैं, हृदय में इसके दश महाशिराएं होती हैं, इसकी त्वचा तथा सिर अभेद्य तथा अच्छेद्य होते हैं, इसके सारे शरीर में शुक्र होता है। इसकी विशालता एक योजन होती है। सात रात्रि (सात मास) यह गर्भ में निवास करता है। उत्पन्न होते ही यह सब कर्म कर सकता है। इसे भूख, प्यास, श्रम (थकावट), ग्लानि, शोक, भय, ईर्ष्या, अधर्म, चिन्ता, आधि (मानसिक रोग) तथा व्याधि (शारीरिक रोग) तथा वृद्धावस्था नहीं सताती है, यह स्तन्यवृत्ति नहीं होता अर्थात् आरंभ से ही दूध नहीं पीता। इसमें धर्म, तप, ज्ञान, विज्ञान, स्थिति तथा युक्ति का आधिक्य होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपमार्थ होती है। इसके बाद त्रेता में मनुष्यों का अर्धनारायण नाम का शारीरिक संहनन होता है। उसका शरीर प्राय: एक अस्थिवाला तथा आकुञ्चन (Contraction) एवं प्रसारण (Dilatation) से रहित होता है। आठ मास यह गर्भ में रहता है। स्तन्य (दूध) पर यह जीवित रहता है। इसके सिर में दो कपाल होते हैं। पार्श्वों तथा छाती में एक २ सन्धि होती है। पीठ तीन अस्थि वाली होती है। (दो Sacrum तथा एक Coccyx), कोष्ठ में बीस शिराएं होती हैं। शुक्र भी होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का चौथाई भाग होता है। पहले (कृतयुग) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद द्वापर में कैशिक संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसकी अस्थियां केश के समान अणु तथा सुषिर होती हैं। सन्धियां अतिक्षिप्त होती हैं। हाथी के समान बड़ा बल होता है, सारा शरीर शिराओं से व्याप्त होता है शरीर की सन्धियों में शुक्र (बल) होता है अर्थात् शरीर की सन्धियां अत्यन्त दृढ़ होती हैं। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का आठवां हिस्सा होती है तथा पहले (त्रेता) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद कलियुग में प्रज्ञप्ति पिशित संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसके शरीर में अत्यन्त सुषिर, मज्जा से युक्त तथा नल की तरह भङ्गुर तीन सौ साठ अस्थियां होती हैं, ४०० मांसपेशियां होती हैं, ७०० शिराएं होती हैं, जिनका मूल हृदय होता है, मस्तिष्क मूल वाले ९०० स्नायु, तालूमूलवाली २०० धमनियां, १०७ मर्म, ३ महामर्म, प्राणों के १० आयतन, ५ हृदय, ३८१ सन्धियां, १४ कण्डराएं, ४२ कूर्च, ६ त्वचा तथा ७ धातुएं होती हैं। स्रोत दो प्रकार के होते हैं। उत्पन्न होने के बाद उसके दांतों का जन्म होता है। वह दस मास तक गर्भ में रहता है। एक वर्ष के बाद वह खड़ा होने लगता है तथा बोलने लगता है। इसकी उत्कृष्ट आयु १०० वर्ष होती है। वह सुख-दु:ख, आधि-व्याधि, वृद्धावस्था तथा मृत्यु से युक्त होता है अर्थात् वह इन सब से घिरा रहता है। ......... इसका शरीर पूर्ण होता है। इसे प्राय: भूख, प्यास, गौरव (भारीपन), श्रम (थकावट) शिथिलता, चित्त, ईर्ष्या, रोष (क्रोध), असत्य, लोलुपता, दु:ख, मोह तथा वियोग होते हैं। उसे संसार के सब कर्म करने पड़ते हैं तथा वह कष्टों से युक्त होता है। ये दो २ युग सत्व, रज एवं तम से युक्त जानें। इस प्रकार यह पुरुष की उत्पत्ति का कारण कहा है।

वक्तव्य— १. कलासमूहं कालम्—छोटी २ कलाओं के समूह को ही काल कहते हैं इसीलिये 'कला' शब्द के द्वारा ही 'काल' शब्द बनता है। सुश्रुत सू. अ. ६ में कहा है—'स सूक्ष्मामपि कलां न लीयते इति काल:'। इसकी व्याख्या में डल्लण ने कहा है—'स: काल: सूक्ष्मामपि स्तोकामपि कलां भागं न लीयते गतिमत्वात् श्लिष्टो न भवति'। इसलिये कई विद्वान् कहते हैं—कलाशब्दस्य ककाराकारौ लीधातोश्च लकारमादाय कालशब्दनिष्पत्ति: ॥ २. इस अध्याय में बताया

अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९७

अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९७

गया है कि प्रत्येक युग में पुरुष की आयु एवं अन्य गुणों का क्रमशः ह्रास होता जाता है । चरक संहिता में भी प्रत्येक युग में क्रमशः आयु के ह्रास होने का निर्देश मिलता है । चरक वि. अ. ३ में कहा है—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणपादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ।। संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ।। प्रत्येक युग में क्रमशः धर्म का एक पाद (चतुर्थांश) कम हो जाता है। पञ्चमहाभूतों के गुणों का भी एक २ पाद नष्ट होता जाता है । भिन्न २ कालों में संवत्सर के १०० वें भाग के पूर्ण हो जाने पर मनुष्यों की आयु में एक संवत्सर की कमी हो जाती है। जैसे उदाहरण के लिये सतयुग का काल ४८०० दिव्य वर्ष माना जाता है। ४८०० के १०० वें भाग अर्थात् ४८ दिव्य वर्षों के व्यतीत हो जाने पर मनुष्य की आयु में एक वर्ष की कमी आजायेगी । इस प्रकार ४८०० दिव्य वर्षों के व्यतीत होने पर त्रेतायुग के प्रारंभ में १०० वर्ष की आयु कम हो जायेगी अर्थात् सतयुग के प्रारंभ में यदि मनुष्य की आयु ४०० वर्ष थी तो त्रेता के प्रारंभ में वह ३०० वर्ष रह जायगी। द्वापर के प्रारंभ में मनुष्य की आयु २०० वर्ष तथा अन्त में कलियुग के प्रारंभ में तो मनुष्य की आयु १०० वर्ष ही रह जाती है। इसी क्रम से यह आगे भी धीरे २ कम होती जायेगी तथा अन्त में कलियुग के १२०० दिव्य वर्ष बीतने पर संसार नष्ट हो जायगा—प्रलय हो जायगा । ३. उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी—इन शब्दों पर तथा नारायण, अर्धनारायण, कैशिक, तथा प्रज्ञप्तिपिशित आदि शारीरिक संहननों के विषय में उपोद्घात में विशेष विचार किया गया है । इन्हें वहीं देखना चाहिये ।।

समुदयकारणं तु ब्रूमः—अव्यक्तान् महान्, महतोऽहङ्कारः; अहङ्कारात् खादीनि, ता अष्टौ भूतप्रकृतयः । चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि, तान्येव बुद्धीन्द्रियाणि; हस्तौ पादौ जिह्वा गुद उपस्थ इति पञ्च कर्मेन्द्रियाणि; शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चेन्द्रियार्थाः; अतीन्द्रियं तु मनः; इत्येते षोडश विकाराः महदादि सर्वं क्षेत्रमव्यक्तमाचक्षते, क्षेत्रज्ञं तु शाश्वतमचिन्त्यमात्मानम् । अस्य लिङ्गानिचेतनाहङ्कारप्राणापानोन्मेषनिमेषसुखदुःखेच्छाद्वेषस्मृतिधृतिबुद्धयः; तदभावे मृताख्या । शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयं पुरुषमाचक्षते, आत्मानमेके । ज्ञानस्याभावो भावश्च मनसो१ लक्षणं, तस्यैकत्वमणुत्वं च द्वौ गुणौ, प्रयत्नज्ञानायौगपद्यादेकं, पृथक् (न) । समनस्कमिन्द्रिय मर्थग्रहणसमर्थं भवति । खं वायुस्तेज आपः पृथिवीति पञ्च महाभूतानि शरीरहेतुरुच्यते । शब्दादयस्तेषां गुणाः । गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि महाभूतानि दिगात्मा मनः कालश्च द्रव्याणि । द्रव्याश्रया गुणाः । खस्याप्रतिषेधो लिङ्गं, वायोश्चलनं, तेजस औष्ण्यम्, अपां द्रवत्वं, पृथिव्याः स्थैर्यम् । मनःषष्ठानामिन्द्रियाणां त्रीणि त्रीणि विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तीनि । मनश्चक्षुः श्रोत्रमिति विप्रकृष्टवृत्तीनि, घ्राणं रसनं त्वगिति सन्निकृष्टवृत्तीनि । तत् सर्वं स्पर्शनलक्षणमाहुः; तद्यथा-पुरुषः सर्वतोगवाक्षं प्रासादमभिरूढस्तांस्तानर्थान् गवाक्षैरालोचयत्येवमयमात्मा शरीरस्थ इन्द्रियैरनुपहतैर्मनःप. ।। .................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ७९ तमं पत्रम्२ ।)

अब हम समुदयकारण (सृष्टि उत्पत्ति के क्रम) को कहते हैं—अव्यक्त (मूलप्रकृति) से महत्तत्व (बुद्धितत्व) उत्पन्न होता है, महत्तत्व से अहंकार (अहं भावना), अहंकार से आकाश आदि पांच सूक्ष्मभूत (पंचतन्मात्राएं) उत्पन्न होते हैं । ये आठ भूतप्रकृतियां हैं । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण (नासिका), रसना तथा त्वचा—ये पांच इन्द्रियां जिन्हें बुद्धीन्द्रियां (ज्ञानेन्द्रियां)


१. अत्र मनसोऽनेकत्ववादमाक्षिप्य एकत्ववादश्वरके इव व्यवस्थापितः । अस्मिन्नेवार्थे समनस्कमित्युत्तरवाक्यं साधकत्वेन संगच्छते । अतोऽत्र ‘न पृथक्’ इति सनकारपाठश्चैत् साधु ।
२. अस्याग्रे ८० तमं पत्रं त्रुटितं ताडपत्रपुस्तके ।