काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ९१
अनन्त, आयु को बढ़ाने वाले, आयु के आधार तथा तृप्त करने वाले और अमृतरूप आयुर्वेद का अश्विनीकुमारों को उपदेश दिया। अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को, इन्द्र ने कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु नामक चार ऋषियों को, तथा उन्होंने हित के लिये एवं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा शक्ति की रक्षा के लिये अपने पुत्रों तथा शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार यह आयुर्वेद उत्पन्न हुआ है। इसका अध्ययन कैसे करना चाहिये ? इसका उत्तर-गुरु की अनुमति से। किसको इसका अध्ययन करना चाहिये ? इसका उत्तर-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों को इसका अध्ययन करना चाहिये। ब्राह्मणों द्वारा इसका अध्ययन, विषय के ज्ञान, पुण्य तथा अपने और लोक कल्याण के लिये करना चाहिये। क्षत्रियों द्वारा लोकसंरक्षण के लिये। वैश्यों द्वारा वृत्ति (आजीविका) के लिये तथा शूद्रों द्वारा सेवा के लिये अथवा सब वर्णों द्वारा धर्म के लिये इसका अध्ययन करना चाहिये। सुख (स्वास्थ्य) एवं जीवन का दान सब धर्मों से श्रेष्ठ माना गया है इसलिये यह आयुर्वेद पुण्य है। (सुख स्वास्थ्य) तथा जीवनदान से सन्तुष्ट हुए लोग कृतज्ञ हो जाते हैं तथा स्तुति करते हैं इस प्रकार इसके धर्म, अर्थ तथा काम की निर्वृत्ति होती^२ है। इसका आद्य (श्रेष्ठ अथवा प्रारम्भिक) तन्त्र कौनसा है ? इसका उत्तर देते हैं—जिस प्रकार सब देवताओं में अग्नि को श्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार इस महान् आयुर्वेद के आठ तन्त्रों में कौमारभृत्य श्रेष्ठ माना गया है। इस कौमारभृत्य के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हुए अन्य लोग भी चिकित्सा करते हैं। साधारण व्यक्ति (Adult) की अपेक्षा बालक की ओषधि हृद्य (हृदय को अच्छी लगने वाली—रोचक—Tasteful) होनी चाहिये। उसकी ओषधि का प्रमाण (मात्रा) भी भिन्न होता है, उपक्रम (चिकित्सा) भी भिन्न होती है तथा अन्य भी बहुत से अन्तर होते हैं। यह किस वेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार कौनसा वेद है ? इसका उत्तर देते हैं—अथर्ववेद। अथर्ववेद में विशेषरूप से रक्षा, बलि, होम, शान्ति ...... आदि द्वारा चिकित्सा-विधान का उल्लेख किया गया है। उसी प्रकार आयुर्वेद में भी रक्षा, बलि, होम, शान्ति आदि का उल्लेख है। इसलिये यह आयुर्वेद अथर्ववेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार अथर्ववेद है^३। कुछ आचार्य कहते हैं कि आयुर्वेद में पद्य, गद्य, कथा, गेय, विद्या आदि होने से आयुर्वेद के आधार सब (चारों) वेद हैं। परन्तु यह ठीक नहीं हैं। वेद आयुर्वेद के ही आश्रित हैं। उदाहरणार्थ—जिस प्रकार दक्षिण हाथ में चारों उंगलियों में अंगूठा अधिपति होता है तथा उन उंगलियों के समान नहीं होता अर्थात् उंगलियों से उसकी विशेषता रहती है उसी प्रकार यह आयुर्वेद भी ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेदों से भिन्न पांचवां वेद कहलाता
१. चरक में शूद्रों को पृथक् नामपूर्वक आयुर्वेद के अध्ययन का विधान नहीं दिया गया है। सूत्रस्थान अ. ३० में कहा है—स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यवैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्मणैः, आरक्षार्थं राजन्यैः, वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः । २. सम्पूर्ण प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसे स्थान २ पर पुण्य शब्द द्वारा ही कहा गया है क्योंकि इसके द्वारा प्राणिय का इहलोक तथा परलोक दोनों में हित होता है। चरक सू.अ. १ में कहा है—तस्यायुषो पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ।। आयुर्वेद का उद्देश्य आयु अथवा स्वास्थ्य प्रदान करना है। संसार में इससे बढ़कर पुण्यजनक कार्य और कोई नहीं हो सकता है। सुश्रुत में कहा है सनातन त्वाद्वेदानांमक्षरत्वात्तथैव च । तथा दृष्टफलत्वाच्च हितत्वादपि देहिनाम् ।। वाक्समूहार्थविस्तारात् पूजितत्वाच्च देहिभिः । चिकित्सितात्पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः । इसी प्रकार—यदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्य वृत्तिकरं चेति । अन्यत्र भी कहा है—लक्षत्रियविद्शूद्रान् रोगार्तान् परिपाल्य च । यत्पुण्यं महदाप्नोति न' तत्सर्वैर्महामखैः ।। तस्माद्रोगापवर्गार्थं रोगात्तं समुपाचरेत् । इत्यादि । अर्थात् यथाविधि आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन कर उसके अनुसार चिकित्सा कार्य के द्वारा असीम व्यक्तियों को स्वाथ्य प्रदान करने से व्यक्ति अनन्त पुण्य का भागी होता है। इसलिये आयुर्वेद पुण्यकारक ही माना गया है। ३. सुश्रुत सू. अ. १ में भी कहा है—इह खल्वायुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्व दस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयंभूः । इसीप्रकार चरक में भी आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना है परन्तु कई आचार्य इसे ऋग्वद का उपवेद भी मानते हैं।