भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 448
१०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]

पञ्चमो भवत्यायुर्वेद इति । किं कारण ? यथा हि वेदेषु सतत ब्रह्मज्ञैस्त्रिवर्गसंयुक्त पुरुषनिश्रेयसं चिन्त्यते, एवमेवास्मिन्नपि वेदे निदानोत्पत्तिलिङ्गारिष्टचिकित्सितैः सततमेव हितसुखकरं त्रिवर्गसारभूतं पुरुषनि श्रेयसं चिन्त्यते; तद्यथा च विविधविज्ञानज्ञानोपपन्ना भाष्यवचनविदोऽष्टाङ्ग्या बुद्धयोपपन्ना लङ्घनप्लवनस्थानासनगमनागमनसमर्था अपि च नाम मनुष्या अदेशज्ञानवन्तो नित्यमेव देशज्ञं दैशिकमन्वयुरेवमेव खलु वेदनासु शिक्षाकल्पसूत्रनि ऋग्वृत्तच्छन्दोयज्ञसंस्तरज्ञानसमुच्चयविशेषज्ञा आयुर्वेदमेवानुधावन्ति, तस्माद्ब्रूमः— ऋग्वेद्यजुर्वेदसामवेदार्थर्ववेदेभ्यः पञ्चमोऽयमायुर्वेदः । यतश्च व्याधितस्यारोग्यमरोगस्य च शेषाः क्रिया धर्मार्थकाममोक्षेषु निर्वर्तन्ते । किं नित्योऽनित्य इति, (नित्य इति ब्रूमः) कुतः ? आर्षवचनप्रामाण्यादविनाशित्वात् सा^१ध्यासिद्धेर्देशकालसामान्यादिति ।। किमाश्रय इति, वातपित्तकफाश्रयः । ते च द्वे द्वे देवते श्रिताः; मारुतमाकाश च वातः श्रियः; अग्निमादित्यं च पित्तं, सोमं वरुणं च कफः; तास्तेषां देवताः । धर्मार्थकामानित्येके, सत्त्वरजस्तमांसीत्येके, साध्ययाप्यासाध्यत्वमित्येके ।। कानि चैषां स्वलक्षणानि तत्प्रकृतीनामित्यत्रोच्यते । तत्र श्लेष्मा स्निग्ध ..........................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ७६ तमं पत्रम्^२ ।)

(विमानस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)


विवाद प्रारंभ हो जाने पर दूसरे वैद्य से निम्न प्रश्न करे—हे वैद्य ! आयु क्या है ? आयुर्वेद का आयुर्वेदत्व क्या है ? आयु किसे कहते हैं ? आयुर्वेद के कितने अङ्ग हैं ? इसका किस प्रकार तथा किस प्रयोजन के लिये अध्ययन करना चाहिये ? इसका सबसे श्रेष्ठ तन्त्र (ग्रन्थ) कौनसा है ? इनमें धुरी (अग्रणी) कौन है ? यह आयुर्वेद किस वेद पर आश्रित है ? यह नित्य है या अनित्य ? आयुर्वेद का क्या आश्रय है ? उनकी प्रकृतियों के अपने लक्षण क्या हैं ? अतीत, वर्तमान तथा अनागत (भावी) वेदनाओं में से वैद्य किसकी चिकित्सा करता है ? इस आयुर्वेद का साधन क्या है ? यह पुण्यकारक है अथवा अपुण्यकारक ? इत्यादि । यदि ये ही प्रश्न उससे पूछे जायं तो वह उत्तर देवे—हे वैद्य ! जीवन को आयु कहते हैं । आयुर्वेद आयु शब्द से 'विद ज्ञाने' अथवा 'विन्दॢ लाभे च' धातु से बना है। इसका अर्थ है कि जिस ज्ञान के द्वारा आयु का ज्ञान प्राप्त हो अथवा आयु की प्राप्ति हो—उसका नाश न हो उसे आयुर्वेद कहते हैं । आयुर्वेद के कितने अङ्ग हैं इस प्रश्न का उत्तर—उसके आठ अङ्ग हैं । उदाहरणार्थ—कौमारभृत्य, कायचिकित्सा, शल्यहरण (शल्यचिकित्सा), शालाक्य, विषतन्त्र, भूततन्त्र, अ^३गदतन्त्र तथा रसायनतन्त्र । यहां यह प्रश्न है कि ये अङ्ग हैं तो इसका शरीर कौनसा है जिसका ये अङ्ग आश्रय लेते हैं क्योंकि अङ्ग शरीर का आश्रय लेकर स्थित होते हैं । उत्तर—धर्म उसका शरीर है । धर्म के आश्रित होकर इसकी क्रियाएं सिद्ध होती हैं । आयुर्वेद कैसे उत्पन्न हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं—यह पहले अथर्ववेदोपनिषत् में उत्पन्न हुआ । सब कुछ जानने वाले स्वयंभू ब्रह्मा ने लोगों को उत्पन्न करने की इच्छा से उनकी रक्षा के लिये पहले आयुर्वेद की रचना की । उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियों की रचना की । तदनन्तर ब्रह्मा ने उस पुण्यकारक,


१. 'साध्यसिद्धेः' इति पाठो युक्तः, फलनिष्पत्तेरिति तदर्थः । साध्यासिद्धेरिति तु वाद्यभिमतस्यानित्यत्वरूपसाध्यस्यासिद्धिरित्यर्थेन संगमनीयम् ।
२. असाग्रे पत्रद्वयग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके ।
३. इन आठ अङ्गों में वाजीकरण का उल्लेख नहीं किया गया है । तथा विष विज्ञान के लिये विषतन्त्र तथा अगदतन्त्र दो शब्दों का प्रयोग किया गया है । ऐसा संभवतः प्रकाशन के समय भ्रमवश हो गया है । इसलिये यहां अगदतन्त्र या विषतन्त्र दोनों में से किसी एक के स्थान पर वाजीकरण शब्द का पाठ होना चाहिये ।