भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 450

९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

है। उसका कारण यह है कि जिस प्रकार वेदों में ब्रह्मज्ञ ऋषियों द्वारा त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) युक्त पुरुष निश्रेयस (मोक्ष) का विचार किया गया है उसी प्रकार इस वेद (आयुर्वेद) में भी निदान, रोगोत्पत्ति, लक्षण, अरिष्ट तथा चिकित्सा द्वारा हितकारी, सुखकारक तथा त्रिवर्ग के सारभूत पुरुष-निश्रेयस का ही विचार किया गया है। और जिस प्रकार विविध ज्ञान-विज्ञान से युक्त, भाष्य वचन आदि के पण्डित, अष्टाङ्ग बुद्धि से युक्त, लङ्घन (लांघना), प्लवन (तैरना), स्थान, आसन, गमन (जाना) तथा आगमन (आना) आदि क्रियाओं में समर्थ होते हुए भी मनुष्य देश (स्थान) का ज्ञान न होने पर सदा उस स्थान के जानने वाले तथा वहां के निवासी (Native) के ही पास पहुंचते हैं उसी प्रकार शिक्षा, कल्प, सूत्र, निरुक्त, वृत्त, छन्द, यज्ञसंस्तर तथा ज्ञानराशि के विशेषज्ञ भी वेदना (कष्ट-रोग) होने पर आयुर्वेद की ही शरण में आते हैं। इस लिये कहते हैं कि ऋग्, यजु, साम तथा अथर्ववेद से भिन्न यह आयुर्वेद पञ्चमवेद कहलाता है। क्योंकि रोगी मनुष्य का आरोग्य (स्वास्थ्य) तथा स्वस्थ मनुष्य की शेष (सम्पूर्ण) क्रियाए धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में निवृत्त हो जाती है अर्थात् स्वस्थ एवं रोगी प्रत्येक व्यक्ति के लिये धर्मार्थकाममोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थ ही चरम ध्येय होता है। आयुर्वेद नित्य है या अनित्य ? इसका उत्तर देते हैं—आर्ष वचनों के प्रमाणों से, अविनाशी होने से, साध्या-सिद्धि-वादी के अभिमत की अनित्यत्व रूप सिद्धि (‘साध्यसिद्धि’ यह पाठ भेद होने पर ‘फलनिष्पत्ति’ यह अर्थ होगा जो कि अधिक उपयुक्त है) तथा देश और काल की समानता से यह आयुर्वेद नित्य है। इस आयुर्वेद का आश्रय (आधार) क्या है ? इसका उत्तर वात, पित्त तथा कफ इसके आश्रय हैं। वे वात, पित्त तथा कफ दो २ देवताओं का आश्रय करके रहते हैं। वात—मारुत (वायु) तथा आकाश देवता के, पित्त—अग्नि तथा आदित्य देवता के तथा कफ—सोम और वरुण देवता के आश्रित होता है। ये सब इनके देवता हैं। कुछ लोग इस उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं कि आयुर्वेद के आधार धर्म कथा काम हैं। कुछ कहते हैं—सत्त्व, रज तथा तम इसके आधार हैं तथा कुछ कहते हैं—साध्य, याप्य तथा असाध्य इसके आधार हैं। इन प्रकृतिस्थ वात, पित्त तथा कफ के स्व (अपने) लक्षण क्या होते हैं ? इसका उत्तर देते हैं—इनमें से श्लेष्मा स्निग्ध ...... (होती है)।

वक्तव्य—यह अध्याय मध्य में ही खण्डित हो गया है। यहां पर “तत्र श्लेष्मा स्निग्धः’ इत्यादि वाक्यांश को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसके आगे प्रकृतिस्थ श्लेष्मा, पित्त तथा वात के लक्षण दिये गये होंगे। तथा अध्याय के प्रारम्भ में किये गये प्रश्नों को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रश्न के उत्तर के बाद—(i) “त्रिषूणां च वेदनानामतीतवर्तमानानागतानां कतमां भिषक् चिकित्सति’’ तथा (ii) “किं चास्यायुर्वेद (स्य) साधनम्’’ इत्यादि प्रश्नों के उत्तर दिये गये होंगे। इस ग्रन्थ के खण्डित होने से पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन प्रश्नों के उत्तर अन्य चरक, सुश्रुत आदि आर्षग्रंथों के आधार पर यथाशक्ति देने का प्रयत्न करेंगे। सर्वप्रथम हम प्रकृतिस्थ वात, पित्त, कफ के लक्षण कहते हैं। प्रकृतिस्थ कफ के लक्षण—चरक वि. अ. ८ में कहा है—श्लेष्मा हि स्निग्धश्लक्ष्णमृदुमधुरसारसान्द्रमन्दस्तिमितगुरुशीतपिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः मृदुत्वाद् दृष्टिसुखसुकुमारावदातगात्राः, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वगात्राः, मन्दत्वान्मन्दचेष्टाहारविहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भाल्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वात्साराधिष्ठितावस्थितगतयः शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासन्तापस्वेददोषाः, पिच्छिलत्वात्सुश्लिष्टसारसन्धिवन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च, त एवं गुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो विद्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति। कफ स्निग्ध, श्लक्ष्ण, मृदु, मधुर, सार (प्रसादरूप), सान्द्र मन्द, स्तिमित, गुरु, शीतल, पिच्छिल तथा स्वच्छ होता है। श्लेष्माधिक पुरुष उपर्युक्त गुणों के कारण बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त एवं दीर्घायु होते हैं। प्रकृतिस्थ पित्त के लक्षण—पित्त मुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च, तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णासहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूतपिप्लुव्यङ्गतिलपीडकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालित्यदोषाः, प्रायोमृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपराक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः,