काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] | विमानस्थानम् | ९३ |
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क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः, द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिवन्धमांसाः, प्रभूतसृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च, विस्रत्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरः-शरीरगन्धाः, कट्वम्लत्वादल्पशुक्रव्यवायापत्याः, त एवं गुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञानविज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति। पित्त-उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, आमगन्धि, अम्ल और कटु होता है। पित्ताधिक पुरुष इन गुणों के कारण मध्य बलवाले, मध्यम आयु वाले तथा ज्ञान-विज्ञान एवं उपकरण में भी मध्यम होते हैं। प्रकृतिस्थ वात के लक्षण—वातस्तु रूक्षलघुचलबहुशीघ्रशीतपरुषविशदः, तस्य रौक्ष्यादातालरूक्षापचितल्पशरीराः, प्रततरूक्षाक्षामभिन्नमन्दसक्तजर्जरस्वराः, जागरूक़ाश्च, लघुत्वाच्च, लघुचपलगतिचेष्टाहाराः, चलत्वादनवस्थितसन्धयस्थिभ्रूहन्वोष्ठजिह्वाशिरःस्कन्धपाणिपादाः, बहुत्वान्द्रहुप्रलाप कण्डरासिराप्रतानाः, शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भक्षोभविकाराः, शीघ्रत्रासरागविरागाः, श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः, पारुष्यात्परुषकेशश्मश्रुरोमनखदशनवदनपाणिपादाङ्गाः, वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः सततसन्धि-शब्दगामिनश्च भवन्ति, त एवं गुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्पबलाश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधन्याश्च भवन्ति। वात रूक्ष, लघु, चल, बहुत शीघ्र, शीतल, परुष तथा विशद होता है। वातल पुरुष इन गुणों के कारण अल्पबल, अल्पायु, अल्प सन्तान वाले, अल्प साधन वाले तथा निर्धन होते हैं। अब हम अतीत, वर्तमान तथा भावी वेदनाओं (रोगों) में से चिकित्सक किस वेदना की चिकित्सा करता है ? इसका उत्तर देते हैं—चरक शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में अग्निवेश पुनर्वसु आत्रेय से प्रश्न करते हैं—अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां का चिकित्सति। अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम् ॥ भविष्यन्त्या असम्प्राप्तिरतीताया अनागमः। साम्प्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तेः संशयो ह्यतः॥
वैद्य रोगी के भूत, वर्तमान अथवा भविष्यत् (भावी) तीन प्रकार के रोगों में से किस रोग की चिकित्सा करता है। वास्तव में वह इनमें से किसी भी रोग की चिकित्सा नहीं करता है। भविष्यत् की तो चिकित्सा वह कर ही नहीं सकता क्योंकि वह तो अभी उपस्थित ही नहीं हुई है। अतीत रोग पुनः लौटकर वापिस नहीं आ सकता तथा वर्तमान रोग भी “प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम्” के अनुसार स्थिर नहीं रह सकता अर्थात् सब भावों का स्वभाव नित्य गमन करने वाला है। काल भी नित्य गति करने वाला है। इस प्रकार रोगी के रोग की अवस्था तथा संवत्सरात्मक काल दोनों के नित्यग होने से वर्तमान रोग की भी चिकित्सा नहीं हो सकती अतः हमें यह सन्देह होता है कि इस अवस्था में वैद्य रोगी के किस रोग की चिकित्सा करता है ? भगवान् आत्रेय इस प्रश्न का उत्तर देते हैं—चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति। यया युक्त्या वदत्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ वैद्य रोगी के तीनों कालों के रोगों की चिकित्सा करता है। इसमें निम्न युक्ति है—पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः। पुनः स कालो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता। एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम्। कालाश्रयमतीतानामार्तीनां पुनरागतः ॥ तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत्प्रयुज्यते। अतीतानां प्रशमनं वेदनानां तदुच्यते ॥ आपस्ताः पुनरागुर्मा याभिः शस्यं पुरा हतम्। यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽश्रये ॥ अतीत वेदनाओं की चिकित्सा में युक्ति-अर्थात् फिर वही सिर का दर्द आगया, फिर वही ज्वर आ गया, फिर वही खांसी आ गई, फिर वही कै (वमन) आगई। इस प्रकार लोक में कहा जाता है। इन प्रसिद्ध वचनों से अतीत वेदनाओं का पुनः वापिस आना माना जाता है। इन अतीत वेदनाओं के पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर जो औषध प्रयुक्त होती है वह अतीत वेदनाओं को शान्त करने वाली कहाती है। खेती को नष्ट करने वाली अतीत वर्षा का ध्यान कर के जिस प्रकार बांध बांधा जाता है उसी प्रकार अतीत पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर शरीर वा मन में चिकित्सा की जाती है। यह अतीत प्रशमन चिकित्सा (Preventive treatment) कहलाती है।
अनागत (भावी) वेदना की चिकित्सा में युक्ति—पूर्वरूपं विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम्। या क्रिया क्रियते सा च वेदनां हन्त्यनागताम् ॥ उत्पन्न होने वाली व्याधियों के पूर्वरूप को देखकर जो चिकित्सा की जाती है वह भावी रोग को नष्ट करती है। वर्तमान रोग की चिकित्सा का सिद्धान्त—पारम्पर्यानूबन्धस्तु दुःखानां विनिवर्तते। सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समतां न च। हेतुभिः सदृशा नित्यं जायन्ते देहधातवः ॥ सुख या आरोग्य