भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

के हेतु के सेवन से दुखों या रोगों का प्रवाहरूप से अनुबन्ध निवृत्त हो जाता है, तथा सुख व आरोग्य की प्रवृत्ति होती है। अर्थात् विषमहेतुओं के सेवन से उत्पन्न हुई दुःखों या रोगों की परम्परा सुख हेतु का सेवन करने से दुखों के अभाव में सब भावों के क्षणभङ्गुर होने से स्वयमेव नष्ट हो जाती है। इस प्रकार सुखकारक या आरोग्यहेतुओं के सेवन करने से शरीर में समधातुओं की ही परम्परा चल पड़ती है तथा शरीर स्वस्थ हो जाता है। समधातुएँ स्वयमेव विषम नहीं हो सकती हैं तथा विषम धातुएं अपने आप सम नहीं हो सकती हैं। देह की धातुएँ सदा हेतुओं के सदृश ही उत्पन्न होती हैं अर्थात् यदि हेतु विषम हैं तो देहधातुएं विषम हो जायेंगी और यदि हेतु (स्वस्थवृत्त आदि) सम हैं तो धातुएँ सम उत्पन्न होंगी। स्वस्थवृत्त आदि समहेतुओं के होने से समता का ही अनुबन्ध रहता है इसलिये शरीर स्वस्थ रहता है।

इन उपर्युक्त युक्तियों के अनुसार चिकित्सक त्रिकालवेदना की ही चिकित्सा करता है। इसलिये भगवान् आत्रेय अन्त में कहते हैं—युक्तिमेतां पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदनां भिषक्। हन्तीति ............ अब हम आयुर्वेद के साधन क्या हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। साधन कारण को कहते हैं। चरक में धातुसाम्यरूपी कार्य अथवा साध्य को निष्पन्न करने के लिये कारणभूत ६ पदार्थों का वर्णन किया गया है। वे कारण भूत ६ पदार्थ ही साधन माने जाते हैं। वे साधन-सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, कर्म तथा समवाय हैं। इन छओं के द्वारा धातुसाम्यरूपी कार्य (स्वास्थ्य) सम्पादन होता है। चरक सू.अ. १ में उपर्युक्त छओं साधनों (कारणों) का विस्तृत विवेचन करने के बाद भगवान् आत्रेय उपसंहार करते हुए कहते हैं—इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते। धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्।। आयुर्वेद शास्त्र का प्रयोजन धातुसाम्य अथवा आरोग्य है तथा उस धातुसाम्यरूपी प्रयोजन अथवा कार्य को सिद्ध करने के लिये उपर्युक्त सामान्य आदि ६ कारण साधनरूप में माने जाते हैं। इस प्रकार ये आयुर्वेद शास्त्र के साधन बताये गये हैं।