काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ९१
अनन्त, आयु को बढ़ाने वाले, आयु के आधार तथा तृप्त करने वाले और अमृतरूप आयुर्वेद का अश्विनीकुमारों को उपदेश दिया। अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को, इन्द्र ने कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि तथा भृगु नामक चार ऋषियों को, तथा उन्होंने हित के लिये एवं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा शक्ति की रक्षा के लिये अपने पुत्रों तथा शिष्यों को उपदेश किया। इस प्रकार यह आयुर्वेद उत्पन्न हुआ है। इसका अध्ययन कैसे करना चाहिये ? इसका उत्तर-गुरु की अनुमति से। किसको इसका अध्ययन करना चाहिये ? इसका उत्तर-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों को इसका अध्ययन करना चाहिये। ब्राह्मणों द्वारा इसका अध्ययन, विषय के ज्ञान, पुण्य तथा अपने और लोक कल्याण के लिये करना चाहिये। क्षत्रियों द्वारा लोकसंरक्षण के लिये। वैश्यों द्वारा वृत्ति (आजीविका) के लिये तथा शूद्रों द्वारा सेवा के लिये अथवा सब वर्णों द्वारा धर्म के लिये इसका अध्ययन करना चाहिये। सुख (स्वास्थ्य) एवं जीवन का दान सब धर्मों से श्रेष्ठ माना गया है इसलिये यह आयुर्वेद पुण्य है। (सुख स्वास्थ्य) तथा जीवनदान से सन्तुष्ट हुए लोग कृतज्ञ हो जाते हैं तथा स्तुति करते हैं इस प्रकार इसके धर्म, अर्थ तथा काम की निर्वृत्ति होती^२ है। इसका आद्य (श्रेष्ठ अथवा प्रारम्भिक) तन्त्र कौनसा है ? इसका उत्तर देते हैं—जिस प्रकार सब देवताओं में अग्नि को श्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार इस महान् आयुर्वेद के आठ तन्त्रों में कौमारभृत्य श्रेष्ठ माना गया है। इस कौमारभृत्य के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हुए अन्य लोग भी चिकित्सा करते हैं। साधारण व्यक्ति (Adult) की अपेक्षा बालक की ओषधि हृद्य (हृदय को अच्छी लगने वाली—रोचक—Tasteful) होनी चाहिये। उसकी ओषधि का प्रमाण (मात्रा) भी भिन्न होता है, उपक्रम (चिकित्सा) भी भिन्न होती है तथा अन्य भी बहुत से अन्तर होते हैं। यह किस वेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार कौनसा वेद है ? इसका उत्तर देते हैं—अथर्ववेद। अथर्ववेद में विशेषरूप से रक्षा, बलि, होम, शान्ति ...... आदि द्वारा चिकित्सा-विधान का उल्लेख किया गया है। उसी प्रकार आयुर्वेद में भी रक्षा, बलि, होम, शान्ति आदि का उल्लेख है। इसलिये यह आयुर्वेद अथर्ववेद के आश्रित है अर्थात् आयुर्वेद का आधार अथर्ववेद है^३। कुछ आचार्य कहते हैं कि आयुर्वेद में पद्य, गद्य, कथा, गेय, विद्या आदि होने से आयुर्वेद के आधार सब (चारों) वेद हैं। परन्तु यह ठीक नहीं हैं। वेद आयुर्वेद के ही आश्रित हैं। उदाहरणार्थ—जिस प्रकार दक्षिण हाथ में चारों उंगलियों में अंगूठा अधिपति होता है तथा उन उंगलियों के समान नहीं होता अर्थात् उंगलियों से उसकी विशेषता रहती है उसी प्रकार यह आयुर्वेद भी ऋक्, यजु, साम तथा अथर्ववेदों से भिन्न पांचवां वेद कहलाता
१. चरक में शूद्रों को पृथक् नामपूर्वक आयुर्वेद के अध्ययन का विधान नहीं दिया गया है। सूत्रस्थान अ. ३० में कहा है—स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यवैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्मणैः, आरक्षार्थं राजन्यैः, वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः । २. सम्पूर्ण प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसे स्थान २ पर पुण्य शब्द द्वारा ही कहा गया है क्योंकि इसके द्वारा प्राणिय का इहलोक तथा परलोक दोनों में हित होता है। चरक सू.अ. १ में कहा है—तस्यायुषो पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ।। आयुर्वेद का उद्देश्य आयु अथवा स्वास्थ्य प्रदान करना है। संसार में इससे बढ़कर पुण्यजनक कार्य और कोई नहीं हो सकता है। सुश्रुत में कहा है सनातन त्वाद्वेदानांमक्षरत्वात्तथैव च । तथा दृष्टफलत्वाच्च हितत्वादपि देहिनाम् ।। वाक्समूहार्थविस्तारात् पूजितत्वाच्च देहिभिः । चिकित्सितात्पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः । इसी प्रकार—यदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्य वृत्तिकरं चेति । अन्यत्र भी कहा है—लक्षत्रियविद्शूद्रान् रोगार्तान् परिपाल्य च । यत्पुण्यं महदाप्नोति न' तत्सर्वैर्महामखैः ।। तस्माद्रोगापवर्गार्थं रोगात्तं समुपाचरेत् । इत्यादि । अर्थात् यथाविधि आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन कर उसके अनुसार चिकित्सा कार्य के द्वारा असीम व्यक्तियों को स्वाथ्य प्रदान करने से व्यक्ति अनन्त पुण्य का भागी होता है। इसलिये आयुर्वेद पुण्यकारक ही माना गया है। ३. सुश्रुत सू. अ. १ में भी कहा है—इह खल्वायुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्व दस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयंभूः । इसीप्रकार चरक में भी आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना है परन्तु कई आचार्य इसे ऋग्वद का उपवेद भी मानते हैं।
९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]
है। उसका कारण यह है कि जिस प्रकार वेदों में ब्रह्मज्ञ ऋषियों द्वारा त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) युक्त पुरुष निश्रेयस (मोक्ष) का विचार किया गया है उसी प्रकार इस वेद (आयुर्वेद) में भी निदान, रोगोत्पत्ति, लक्षण, अरिष्ट तथा चिकित्सा द्वारा हितकारी, सुखकारक तथा त्रिवर्ग के सारभूत पुरुष-निश्रेयस का ही विचार किया गया है। और जिस प्रकार विविध ज्ञान-विज्ञान से युक्त, भाष्य वचन आदि के पण्डित, अष्टाङ्ग बुद्धि से युक्त, लङ्घन (लांघना), प्लवन (तैरना), स्थान, आसन, गमन (जाना) तथा आगमन (आना) आदि क्रियाओं में समर्थ होते हुए भी मनुष्य देश (स्थान) का ज्ञान न होने पर सदा उस स्थान के जानने वाले तथा वहां के निवासी (Native) के ही पास पहुंचते हैं उसी प्रकार शिक्षा, कल्प, सूत्र, निरुक्त, वृत्त, छन्द, यज्ञसंस्तर तथा ज्ञानराशि के विशेषज्ञ भी वेदना (कष्ट-रोग) होने पर आयुर्वेद की ही शरण में आते हैं। इस लिये कहते हैं कि ऋग्, यजु, साम तथा अथर्ववेद से भिन्न यह आयुर्वेद पञ्चमवेद कहलाता है। क्योंकि रोगी मनुष्य का आरोग्य (स्वास्थ्य) तथा स्वस्थ मनुष्य की शेष (सम्पूर्ण) क्रियाए धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में निवृत्त हो जाती है अर्थात् स्वस्थ एवं रोगी प्रत्येक व्यक्ति के लिये धर्मार्थकाममोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थ ही चरम ध्येय होता है। आयुर्वेद नित्य है या अनित्य ? इसका उत्तर देते हैं—आर्ष वचनों के प्रमाणों से, अविनाशी होने से, साध्या-सिद्धि-वादी के अभिमत की अनित्यत्व रूप सिद्धि (‘साध्यसिद्धि’ यह पाठ भेद होने पर ‘फलनिष्पत्ति’ यह अर्थ होगा जो कि अधिक उपयुक्त है) तथा देश और काल की समानता से यह आयुर्वेद नित्य है। इस आयुर्वेद का आश्रय (आधार) क्या है ? इसका उत्तर वात, पित्त तथा कफ इसके आश्रय हैं। वे वात, पित्त तथा कफ दो २ देवताओं का आश्रय करके रहते हैं। वात—मारुत (वायु) तथा आकाश देवता के, पित्त—अग्नि तथा आदित्य देवता के तथा कफ—सोम और वरुण देवता के आश्रित होता है। ये सब इनके देवता हैं। कुछ लोग इस उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं कि आयुर्वेद के आधार धर्म कथा काम हैं। कुछ कहते हैं—सत्त्व, रज तथा तम इसके आधार हैं तथा कुछ कहते हैं—साध्य, याप्य तथा असाध्य इसके आधार हैं। इन प्रकृतिस्थ वात, पित्त तथा कफ के स्व (अपने) लक्षण क्या होते हैं ? इसका उत्तर देते हैं—इनमें से श्लेष्मा स्निग्ध ...... (होती है)।
वक्तव्य—यह अध्याय मध्य में ही खण्डित हो गया है। यहां पर “तत्र श्लेष्मा स्निग्धः’ इत्यादि वाक्यांश को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसके आगे प्रकृतिस्थ श्लेष्मा, पित्त तथा वात के लक्षण दिये गये होंगे। तथा अध्याय के प्रारम्भ में किये गये प्रश्नों को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रश्न के उत्तर के बाद—(i) “त्रिषूणां च वेदनानामतीतवर्तमानानागतानां कतमां भिषक् चिकित्सति’’ तथा (ii) “किं चास्यायुर्वेद (स्य) साधनम्’’ इत्यादि प्रश्नों के उत्तर दिये गये होंगे। इस ग्रन्थ के खण्डित होने से पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन प्रश्नों के उत्तर अन्य चरक, सुश्रुत आदि आर्षग्रंथों के आधार पर यथाशक्ति देने का प्रयत्न करेंगे। सर्वप्रथम हम प्रकृतिस्थ वात, पित्त, कफ के लक्षण कहते हैं। प्रकृतिस्थ कफ के लक्षण—चरक वि. अ. ८ में कहा है—श्लेष्मा हि स्निग्धश्लक्ष्णमृदुमधुरसारसान्द्रमन्दस्तिमितगुरुशीतपिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः मृदुत्वाद् दृष्टिसुखसुकुमारावदातगात्राः, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वगात्राः, मन्दत्वान्मन्दचेष्टाहारविहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भाल्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वात्साराधिष्ठितावस्थितगतयः शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासन्तापस्वेददोषाः, पिच्छिलत्वात्सुश्लिष्टसारसन्धिवन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च, त एवं गुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो विद्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति। कफ स्निग्ध, श्लक्ष्ण, मृदु, मधुर, सार (प्रसादरूप), सान्द्र मन्द, स्तिमित, गुरु, शीतल, पिच्छिल तथा स्वच्छ होता है। श्लेष्माधिक पुरुष उपर्युक्त गुणों के कारण बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त एवं दीर्घायु होते हैं। प्रकृतिस्थ पित्त के लक्षण—पित्त मुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च, तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णासहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूतपिप्लुव्यङ्गतिलपीडकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालित्यदोषाः, प्रायोमृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपराक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः,
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क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः, द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिवन्धमांसाः, प्रभूतसृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च, विस्रत्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरः-शरीरगन्धाः, कट्वम्लत्वादल्पशुक्रव्यवायापत्याः, त एवं गुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञानविज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति। पित्त-उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, आमगन्धि, अम्ल और कटु होता है। पित्ताधिक पुरुष इन गुणों के कारण मध्य बलवाले, मध्यम आयु वाले तथा ज्ञान-विज्ञान एवं उपकरण में भी मध्यम होते हैं। प्रकृतिस्थ वात के लक्षण—वातस्तु रूक्षलघुचलबहुशीघ्रशीतपरुषविशदः, तस्य रौक्ष्यादातालरूक्षापचितल्पशरीराः, प्रततरूक्षाक्षामभिन्नमन्दसक्तजर्जरस्वराः, जागरूक़ाश्च, लघुत्वाच्च, लघुचपलगतिचेष्टाहाराः, चलत्वादनवस्थितसन्धयस्थिभ्रूहन्वोष्ठजिह्वाशिरःस्कन्धपाणिपादाः, बहुत्वान्द्रहुप्रलाप कण्डरासिराप्रतानाः, शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भक्षोभविकाराः, शीघ्रत्रासरागविरागाः, श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः, पारुष्यात्परुषकेशश्मश्रुरोमनखदशनवदनपाणिपादाङ्गाः, वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः सततसन्धि-शब्दगामिनश्च भवन्ति, त एवं गुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्पबलाश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधन्याश्च भवन्ति। वात रूक्ष, लघु, चल, बहुत शीघ्र, शीतल, परुष तथा विशद होता है। वातल पुरुष इन गुणों के कारण अल्पबल, अल्पायु, अल्प सन्तान वाले, अल्प साधन वाले तथा निर्धन होते हैं। अब हम अतीत, वर्तमान तथा भावी वेदनाओं (रोगों) में से चिकित्सक किस वेदना की चिकित्सा करता है ? इसका उत्तर देते हैं—चरक शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में अग्निवेश पुनर्वसु आत्रेय से प्रश्न करते हैं—अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां का चिकित्सति। अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम् ॥ भविष्यन्त्या असम्प्राप्तिरतीताया अनागमः। साम्प्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तेः संशयो ह्यतः॥
वैद्य रोगी के भूत, वर्तमान अथवा भविष्यत् (भावी) तीन प्रकार के रोगों में से किस रोग की चिकित्सा करता है। वास्तव में वह इनमें से किसी भी रोग की चिकित्सा नहीं करता है। भविष्यत् की तो चिकित्सा वह कर ही नहीं सकता क्योंकि वह तो अभी उपस्थित ही नहीं हुई है। अतीत रोग पुनः लौटकर वापिस नहीं आ सकता तथा वर्तमान रोग भी “प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम्” के अनुसार स्थिर नहीं रह सकता अर्थात् सब भावों का स्वभाव नित्य गमन करने वाला है। काल भी नित्य गति करने वाला है। इस प्रकार रोगी के रोग की अवस्था तथा संवत्सरात्मक काल दोनों के नित्यग होने से वर्तमान रोग की भी चिकित्सा नहीं हो सकती अतः हमें यह सन्देह होता है कि इस अवस्था में वैद्य रोगी के किस रोग की चिकित्सा करता है ? भगवान् आत्रेय इस प्रश्न का उत्तर देते हैं—चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति। यया युक्त्या वदत्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ वैद्य रोगी के तीनों कालों के रोगों की चिकित्सा करता है। इसमें निम्न युक्ति है—पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः। पुनः स कालो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता। एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम्। कालाश्रयमतीतानामार्तीनां पुनरागतः ॥ तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत्प्रयुज्यते। अतीतानां प्रशमनं वेदनानां तदुच्यते ॥ आपस्ताः पुनरागुर्मा याभिः शस्यं पुरा हतम्। यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽश्रये ॥ अतीत वेदनाओं की चिकित्सा में युक्ति-अर्थात् फिर वही सिर का दर्द आगया, फिर वही ज्वर आ गया, फिर वही खांसी आ गई, फिर वही कै (वमन) आगई। इस प्रकार लोक में कहा जाता है। इन प्रसिद्ध वचनों से अतीत वेदनाओं का पुनः वापिस आना माना जाता है। इन अतीत वेदनाओं के पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर जो औषध प्रयुक्त होती है वह अतीत वेदनाओं को शान्त करने वाली कहाती है। खेती को नष्ट करने वाली अतीत वर्षा का ध्यान कर के जिस प्रकार बांध बांधा जाता है उसी प्रकार अतीत पीडाकाल को लक्ष्य में रखकर शरीर वा मन में चिकित्सा की जाती है। यह अतीत प्रशमन चिकित्सा (Preventive treatment) कहलाती है।
अनागत (भावी) वेदना की चिकित्सा में युक्ति—पूर्वरूपं विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम्। या क्रिया क्रियते सा च वेदनां हन्त्यनागताम् ॥ उत्पन्न होने वाली व्याधियों के पूर्वरूप को देखकर जो चिकित्सा की जाती है वह भावी रोग को नष्ट करती है। वर्तमान रोग की चिकित्सा का सिद्धान्त—पारम्पर्यानूबन्धस्तु दुःखानां विनिवर्तते। सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समतां न च। हेतुभिः सदृशा नित्यं जायन्ते देहधातवः ॥ सुख या आरोग्य
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के हेतु के सेवन से दुखों या रोगों का प्रवाहरूप से अनुबन्ध निवृत्त हो जाता है, तथा सुख व आरोग्य की प्रवृत्ति होती है। अर्थात् विषमहेतुओं के सेवन से उत्पन्न हुई दुःखों या रोगों की परम्परा सुख हेतु का सेवन करने से दुखों के अभाव में सब भावों के क्षणभङ्गुर होने से स्वयमेव नष्ट हो जाती है। इस प्रकार सुखकारक या आरोग्यहेतुओं के सेवन करने से शरीर में समधातुओं की ही परम्परा चल पड़ती है तथा शरीर स्वस्थ हो जाता है। समधातुएँ स्वयमेव विषम नहीं हो सकती हैं तथा विषम धातुएं अपने आप सम नहीं हो सकती हैं। देह की धातुएँ सदा हेतुओं के सदृश ही उत्पन्न होती हैं अर्थात् यदि हेतु विषम हैं तो देहधातुएं विषम हो जायेंगी और यदि हेतु (स्वस्थवृत्त आदि) सम हैं तो धातुएँ सम उत्पन्न होंगी। स्वस्थवृत्त आदि समहेतुओं के होने से समता का ही अनुबन्ध रहता है इसलिये शरीर स्वस्थ रहता है।
इन उपर्युक्त युक्तियों के अनुसार चिकित्सक त्रिकालवेदना की ही चिकित्सा करता है। इसलिये भगवान् आत्रेय अन्त में कहते हैं—युक्तिमेतां पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदनां भिषक्। हन्तीति ............ अब हम आयुर्वेद के साधन क्या हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। साधन कारण को कहते हैं। चरक में धातुसाम्यरूपी कार्य अथवा साध्य को निष्पन्न करने के लिये कारणभूत ६ पदार्थों का वर्णन किया गया है। वे कारण भूत ६ पदार्थ ही साधन माने जाते हैं। वे साधन-सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, कर्म तथा समवाय हैं। इन छओं के द्वारा धातुसाम्यरूपी कार्य (स्वास्थ्य) सम्पादन होता है। चरक सू.अ. १ में उपर्युक्त छओं साधनों (कारणों) का विस्तृत विवेचन करने के बाद भगवान् आत्रेय उपसंहार करते हुए कहते हैं—इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते। धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्।। आयुर्वेद शास्त्र का प्रयोजन धातुसाम्य अथवा आरोग्य है तथा उस धातुसाम्यरूपी प्रयोजन अथवा कार्य को सिद्ध करने के लिये उपर्युक्त सामान्य आदि ६ कारण साधनरूप में माने जाते हैं। इस प्रकार ये आयुर्वेद शास्त्र के साधन बताये गये हैं।
चतुर्थं शारीरस्थानम्
................................ तस्मात् पञ्चैव खलु ऋतवोऽपि, तदनुपपत्तेर्नास्ति षट्त्वमिति; अत्रोच्यते—रसार्थमेषां षट्त्वं रसविमाने प्रोक्तम् ।
................................
इसलिये ऋतुयें भी पांच ही होती हैं। उसकी उपपत्ति न होने से छठी ऋतु नहीं होती। रस के प्रयोजन के लिये ऋतुएँ ६ होती हैं जिसका कि रसविमान (खण्डित भाग) में वर्णन किया गया है ।।
स कः$^१$ कलासमूहं कालं द्विविधमकल्पयत्—शुभं चाशुभं च, तौ तुल्यप्र(परि)माणौ भूतवर्तमानअनागत-विभागात् । तत्र शुभ उत्सर्पिणी$^२$, अशुभोऽवसर्पिणी; ते पुनरुभे त्रिविधे युगभेदेन—आदियुगं देवयुगं कृतयुगमित्युत्सर्पिणी, त्रेताद्वापरकलियुगान्यवसर्पिणी; तयोरानन्त्यात् परिमाणं नोच्यते । तत्रादियुगदेवयुगेऽचिन्त्यप्र(परि)माणोद्भवो कर्मभोजनपानगतिवीर्यायुषि अनिर्देश्ये । कृतयुगे तु नारायणं नाम देहिनां संहननं शरीरमुत्पद्यते; तस्मात्तदाहुः—तस्य घनं निष्कपालं शिरः, अस्थीनि च सत्त्वास्पदान्याकृतयो वज्रगरीयस्यः, हृदि चास्य महासिरा दशैव, त्वगस्य शिरश्चाभेद्यमच्छेद्यं, सर्वतोऽस्य शुक्रं, योजनं चास्योत्सेधः, सप्तरात्रं चास्य गर्भवासः, सद्योजातस्य चास्य सर्वकर्माणि शक्यानि भवन्ति, न चैनं क्षुत्पिपासाश्रमग्लानिशोकभयेर्ष्याऽधर्मचिन्ताधिव्याधिजरा बाधन्ते, न च स्तन्यवृत्तिर्भवति, धर्मतपोज्ञान-विज्ञानस्थितियुक्तिश्राति भवति । तस्य पलितोपमार्थ(?)मायुरुत्कृष्टमाहुरिति ।। अथ त्रेतायामर्धनारायणं नाम देहिनां संहननं शरीरमुत्पद्यते । तस्यैकास्थिप्रायं शरीरमाकुञ्चनप्रसारणवर्ज्यं, गर्भवासोऽस्याष्टमासिकः, स्तन्यजीविका च, द्वे शिरस्कपाले, पार्श्वयोरेकैकः सन्धिः उरसि च, त्र्यस्थि पृष्ठं, कोष्ठस्य सिरा विंशतिः, शुक्रं च, पलितोपम(?)चतुर्भागमायुरुत्कृष्टं पूर्वाच्चार्धगुणावसर्पणमिति ।। अथ द्वापरे कैशिकसंहननं शरीरमुत्पद्यते केशमात्राणुसुषिरास्थि, अतिक्षिप्तसन्धि, महाहस्तिबलः(लं), सिरानुवेष्टितगात्रः(त्रं), गात्रसन्धिषु चास्य शुक्रं, पलितोपमा(?)ष्टभागमायुरुत्कृष्टं पूर्वाच्चार्धगुणावसर्पणमिति ।। अथ कलियुगे प्रज्ञप्तिपिशितं संहननं शरीरमुत्पद्यते । तस्य षष्टिश्च त्रीणि चास्थिशतानि भृशसुषिराणि मज्जपूर्णानि नलवदासन्नबधानि$^३$, चत्वारि मांसपेशीशतानि, सप्त सिराशतानि हृदयमूलानि, नव स्नायुशतानि मस्तुलुङ्गमूलानि, द्वे धमनीशते तालुमूले, सप्तोत्तरं मर्मशतं, त्रीणि महामर्माणि, दश प्राणायतनानि, पञ्च हृदयानि, त्रीणि सन्धि-शतान्येकाशीता(त्यधिका)नि, चतुर्दश कण्डराः, कूर्चा द्विचत्वारिंशत्, षट त्वचः, सप्त धातवः स्रोतांसि द्विविधानि, जातस्य पृथग्दन्तजन्म, दशमासं गर्भवासः संवत्सरादूर्ध्वं प्रतिष्ठतति, वाचं च विसृजति; तस्य वर्षशतमायुरुत्कृष्टं, सुखदुःखधिव्याधिजरामृत्युपरिगतः, .... सर्वगात्रः, क्षुत्पिपासागौरवश्रमशैथिल्य-चित्तेर्ष्यारोषानृतलौल्यपरिक्लेशमोहवियोगप्रायः, संसारगोचरः, आबाधबहुल इति द्वे द्वे युगे सत्त्वरजस्तमोन्वये विद्धि । इति पुरुषस्य सृष्टिकारणमुक्तम् ।।
१. कः ब्रह्मा ।
२. जो स्वयं वृद्धि को प्राप्त होता है अथवा क्रमशः आयु आदि भावों को बढ़ाता है उसे उत्सर्पिणी अथवा उन्नतिकाल कहते हैं। जो स्वयं क्षीण होता है अथवा क्रमः आयु आदि भावों को क्षीण करता है उसे अवसर्पिणी या अवनतिकाल कहते हैं।
३. नलबद्धङ्गुराणीत्यर्थः ।
२९ का.सं.
| ९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अध्याय: ? ] |
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ब्रह्मा ने कलाओं के समूहरूप काल को शुभ और अशुभ दो प्रकार का बनाया । ये शुभ और अशुभ काल भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् के भेद से समान परिमाण वाले होते हैं। इनमें शुभ काल को उत्सर्पिणी तथा अशुभ काल को अवसर्पिणी कहते हैं। ये दोनों पुन: युगभेद से तीन प्रकार के हैं। उत्सर्पिणी के आदियुग, देवयुग तथा कृतयुग ये तीन भेद हैं। इसी प्रकार अवसर्पिणी के त्रेता, द्वापर एवं कलियुग-ये तीन भेद हैं, युगों के अनन्त होने से इनका परिमाण नहीं कहा गया है। आदियुग तथा देवयुग का परिमाण अचिन्त्य होने से इनके कर्म, भोजन, पान, गति वीर्य तथा आयु का निर्देश संभव नहीं है। कृतयुग में मनुष्यों का नारायण नाम का शारीरिक संहनन उत्पन्न होता है। इसलिये उसके लक्षण कहते हैं—उसका सिर घन (ठोस) तथा कपाल रहित होता है, अस्थियां सत्व से युक्त होती हैं, आकृतियां वज्र के समान श्रेष्ठ (स्पष्ट) होती हैं, हृदय में इसके दश महाशिराएं होती हैं, इसकी त्वचा तथा सिर अभेद्य तथा अच्छेद्य होते हैं, इसके सारे शरीर में शुक्र होता है। इसकी विशालता एक योजन होती है। सात रात्रि (सात मास) यह गर्भ में निवास करता है। उत्पन्न होते ही यह सब कर्म कर सकता है। इसे भूख, प्यास, श्रम (थकावट), ग्लानि, शोक, भय, ईर्ष्या, अधर्म, चिन्ता, आधि (मानसिक रोग) तथा व्याधि (शारीरिक रोग) तथा वृद्धावस्था नहीं सताती है, यह स्तन्यवृत्ति नहीं होता अर्थात् आरंभ से ही दूध नहीं पीता। इसमें धर्म, तप, ज्ञान, विज्ञान, स्थिति तथा युक्ति का आधिक्य होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपमार्थ होती है। इसके बाद त्रेता में मनुष्यों का अर्धनारायण नाम का शारीरिक संहनन होता है। उसका शरीर प्राय: एक अस्थिवाला तथा आकुञ्चन (Contraction) एवं प्रसारण (Dilatation) से रहित होता है। आठ मास यह गर्भ में रहता है। स्तन्य (दूध) पर यह जीवित रहता है। इसके सिर में दो कपाल होते हैं। पार्श्वों तथा छाती में एक २ सन्धि होती है। पीठ तीन अस्थि वाली होती है। (दो Sacrum तथा एक Coccyx), कोष्ठ में बीस शिराएं होती हैं। शुक्र भी होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का चौथाई भाग होता है। पहले (कृतयुग) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद द्वापर में कैशिक संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसकी अस्थियां केश के समान अणु तथा सुषिर होती हैं। सन्धियां अतिक्षिप्त होती हैं। हाथी के समान बड़ा बल होता है, सारा शरीर शिराओं से व्याप्त होता है शरीर की सन्धियों में शुक्र (बल) होता है अर्थात् शरीर की सन्धियां अत्यन्त दृढ़ होती हैं। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का आठवां हिस्सा होती है तथा पहले (त्रेता) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद कलियुग में प्रज्ञप्ति पिशित संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसके शरीर में अत्यन्त सुषिर, मज्जा से युक्त तथा नल की तरह भङ्गुर तीन सौ साठ अस्थियां होती हैं, ४०० मांसपेशियां होती हैं, ७०० शिराएं होती हैं, जिनका मूल हृदय होता है, मस्तिष्क मूल वाले ९०० स्नायु, तालूमूलवाली २०० धमनियां, १०७ मर्म, ३ महामर्म, प्राणों के १० आयतन, ५ हृदय, ३८१ सन्धियां, १४ कण्डराएं, ४२ कूर्च, ६ त्वचा तथा ७ धातुएं होती हैं। स्रोत दो प्रकार के होते हैं। उत्पन्न होने के बाद उसके दांतों का जन्म होता है। वह दस मास तक गर्भ में रहता है। एक वर्ष के बाद वह खड़ा होने लगता है तथा बोलने लगता है। इसकी उत्कृष्ट आयु १०० वर्ष होती है। वह सुख-दु:ख, आधि-व्याधि, वृद्धावस्था तथा मृत्यु से युक्त होता है अर्थात् वह इन सब से घिरा रहता है। ......... इसका शरीर पूर्ण होता है। इसे प्राय: भूख, प्यास, गौरव (भारीपन), श्रम (थकावट) शिथिलता, चित्त, ईर्ष्या, रोष (क्रोध), असत्य, लोलुपता, दु:ख, मोह तथा वियोग होते हैं। उसे संसार के सब कर्म करने पड़ते हैं तथा वह कष्टों से युक्त होता है। ये दो २ युग सत्व, रज एवं तम से युक्त जानें। इस प्रकार यह पुरुष की उत्पत्ति का कारण कहा है।
वक्तव्य— १. कलासमूहं कालम्—छोटी २ कलाओं के समूह को ही काल कहते हैं इसीलिये 'कला' शब्द के द्वारा ही 'काल' शब्द बनता है। सुश्रुत सू. अ. ६ में कहा है—'स सूक्ष्मामपि कलां न लीयते इति काल:'। इसकी व्याख्या में डल्लण ने कहा है—'स: काल: सूक्ष्मामपि स्तोकामपि कलां भागं न लीयते गतिमत्वात् श्लिष्टो न भवति'। इसलिये कई विद्वान् कहते हैं—कलाशब्दस्य ककाराकारौ लीधातोश्च लकारमादाय कालशब्दनिष्पत्ति: ॥ २. इस अध्याय में बताया
अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९७
अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९७
गया है कि प्रत्येक युग में पुरुष की आयु एवं अन्य गुणों का क्रमशः ह्रास होता जाता है । चरक संहिता में भी प्रत्येक युग में क्रमशः आयु के ह्रास होने का निर्देश मिलता है । चरक वि. अ. ३ में कहा है—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणपादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ।। संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ।। प्रत्येक युग में क्रमशः धर्म का एक पाद (चतुर्थांश) कम हो जाता है। पञ्चमहाभूतों के गुणों का भी एक २ पाद नष्ट होता जाता है । भिन्न २ कालों में संवत्सर के १०० वें भाग के पूर्ण हो जाने पर मनुष्यों की आयु में एक संवत्सर की कमी हो जाती है। जैसे उदाहरण के लिये सतयुग का काल ४८०० दिव्य वर्ष माना जाता है। ४८०० के १०० वें भाग अर्थात् ४८ दिव्य वर्षों के व्यतीत हो जाने पर मनुष्य की आयु में एक वर्ष की कमी आजायेगी । इस प्रकार ४८०० दिव्य वर्षों के व्यतीत होने पर त्रेतायुग के प्रारंभ में १०० वर्ष की आयु कम हो जायेगी अर्थात् सतयुग के प्रारंभ में यदि मनुष्य की आयु ४०० वर्ष थी तो त्रेता के प्रारंभ में वह ३०० वर्ष रह जायगी। द्वापर के प्रारंभ में मनुष्य की आयु २०० वर्ष तथा अन्त में कलियुग के प्रारंभ में तो मनुष्य की आयु १०० वर्ष ही रह जाती है। इसी क्रम से यह आगे भी धीरे २ कम होती जायेगी तथा अन्त में कलियुग के १२०० दिव्य वर्ष बीतने पर संसार नष्ट हो जायगा—प्रलय हो जायगा । ३. उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी—इन शब्दों पर तथा नारायण, अर्धनारायण, कैशिक, तथा प्रज्ञप्तिपिशित आदि शारीरिक संहननों के विषय में उपोद्घात में विशेष विचार किया गया है । इन्हें वहीं देखना चाहिये ।।
समुदयकारणं तु ब्रूमः—अव्यक्तान् महान्, महतोऽहङ्कारः; अहङ्कारात् खादीनि, ता अष्टौ भूतप्रकृतयः । चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि, तान्येव बुद्धीन्द्रियाणि; हस्तौ पादौ जिह्वा गुद उपस्थ इति पञ्च कर्मेन्द्रियाणि; शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चेन्द्रियार्थाः; अतीन्द्रियं तु मनः; इत्येते षोडश विकाराः महदादि सर्वं क्षेत्रमव्यक्तमाचक्षते, क्षेत्रज्ञं तु शाश्वतमचिन्त्यमात्मानम् । अस्य लिङ्गानिचेतनाहङ्कारप्राणापानोन्मेषनिमेषसुखदुःखेच्छाद्वेषस्मृतिधृतिबुद्धयः; तदभावे मृताख्या । शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयं पुरुषमाचक्षते, आत्मानमेके । ज्ञानस्याभावो भावश्च मनसो१ लक्षणं, तस्यैकत्वमणुत्वं च द्वौ गुणौ, प्रयत्नज्ञानायौगपद्यादेकं, पृथक् (न) । समनस्कमिन्द्रिय मर्थग्रहणसमर्थं भवति । खं वायुस्तेज आपः पृथिवीति पञ्च महाभूतानि शरीरहेतुरुच्यते । शब्दादयस्तेषां गुणाः । गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि महाभूतानि दिगात्मा मनः कालश्च द्रव्याणि । द्रव्याश्रया गुणाः । खस्याप्रतिषेधो लिङ्गं, वायोश्चलनं, तेजस औष्ण्यम्, अपां द्रवत्वं, पृथिव्याः स्थैर्यम् । मनःषष्ठानामिन्द्रियाणां त्रीणि त्रीणि विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तीनि । मनश्चक्षुः श्रोत्रमिति विप्रकृष्टवृत्तीनि, घ्राणं रसनं त्वगिति सन्निकृष्टवृत्तीनि । तत् सर्वं स्पर्शनलक्षणमाहुः; तद्यथा-पुरुषः सर्वतोगवाक्षं प्रासादमभिरूढस्तांस्तानर्थान् गवाक्षैरालोचयत्येवमयमात्मा शरीरस्थ इन्द्रियैरनुपहतैर्मनःप. ।। .................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ७९ तमं पत्रम्२ ।)
अब हम समुदयकारण (सृष्टि उत्पत्ति के क्रम) को कहते हैं—अव्यक्त (मूलप्रकृति) से महत्तत्व (बुद्धितत्व) उत्पन्न होता है, महत्तत्व से अहंकार (अहं भावना), अहंकार से आकाश आदि पांच सूक्ष्मभूत (पंचतन्मात्राएं) उत्पन्न होते हैं । ये आठ भूतप्रकृतियां हैं । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण (नासिका), रसना तथा त्वचा—ये पांच इन्द्रियां जिन्हें बुद्धीन्द्रियां (ज्ञानेन्द्रियां)
१. अत्र मनसोऽनेकत्ववादमाक्षिप्य एकत्ववादश्वरके इव व्यवस्थापितः । अस्मिन्नेवार्थे समनस्कमित्युत्तरवाक्यं साधकत्वेन संगच्छते । अतोऽत्र ‘न पृथक्’ इति सनकारपाठश्चैत् साधु ।
२. अस्याग्रे ८० तमं पत्रं त्रुटितं ताडपत्रपुस्तके ।
९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [अध्यायः ?]
कहते हैं, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा (Anus) तथा उपस्थ (जननेन्द्रिय-Penis) ये पांच कर्मेन्द्रियां, शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध आदि पांच इन्द्रियों के पांच विषय तथा अतीन्द्रिय (जो इन्द्रियों का विषय न हो) मन—ये १६ विकार हैं। महदादि सम्पूर्ण अव्यक्तों को क्षेत्र कहते हैं तथा शाश्वत एवं अचिन्त्य आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। इस (आत्मा) के निम्न लक्षण हैं-चेतना, अहंकार, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, सुख, दुःख इच्छा, द्वेष, स्मृति, धृति, बुद्धि आदि। इन लक्षणों के अभाव में व्यक्ति मृत होता है। (शरीर, इन्द्रिय, आत्मा, तथा सत्व (मन) के समुदाय को पुरुष कहते हैं। कुछ लोग आत्मा को पुरुष मानते हैं। ज्ञान का युगपत् अभाव तथा भाव मन का लक्षण है। उस (मन) के एकत्व तथा अणुत्व दो गुण माने जाते हैं। प्रयत्न तथा ज्ञान के युगपत् (साथ २) न होने से मन एक है, अनेक नहीं। मन के सहित ही इन्द्रियां अर्थ (विषय) के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। अर्थात् यदि किसी विषय में मन लगा हुआ नहीं है तो इन्द्रियां उस विषय के ग्रहण करने में कदापि समर्थ नहीं हो सकती। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पञ्चमहाभूत शरीर की उत्पत्ति के कारण कहे जाते हैं। शब्द आदि (शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध) पांच महाभूतों के गुण हैं। शब्द स्पर्श आदि गुणों की क्रमशः वृद्धि द्वारा विद्यमान पञ्चमहाभूत, दिशाएँ, आत्मा, मन तथा काल (ये नौ) द्रव्य कहलाते हैं। गुण द्रव्य पर आश्रित रहते हैं। आकाश का लिङ्ग (गुण)—अप्रतिषेध (अप्रतिघात किसी प्रकार की रुकावट का न होना), वायु का लक्षण गति, अग्नि का उष्णता, जल का द्रवत्व (Liquid) तथा पृथिवी का गुण स्थिरता होता है। मन सहित इन्द्रियों (६ इन्द्रियों) में से तीन विप्रकृष्ट (दूर) तथा तीन सन्निकृष्ट (समीप) कार्य के लिये हैं। इनमें मन, चक्षु तथा श्रोत्र विप्रकृष्ट तथा घ्राण, रसना और त्वचा सन्निकृष्ट कार्य वाली हैं। इन सबको स्पर्शन लक्षण कहते हैं। उदाहरण के लिये जिस प्रकार कोई मनुष्य चारों ओर से गवाक्षों (झरोखों) वाले महल में बैठा हुआ झरोखों के द्वारा भिन्न २ विषयों का ग्रहण करता है (देखता है) उसी प्रकार यह आत्मा शरीर में स्थित हुआ स्वस्थ इन्द्रियों के द्वारा मन के ....... (योग से भिन्न २ विषयों को ग्रहण करता है) अर्थात् जिस प्रकार मकान में बैठा हुआ मनुष्य केवल द्रष्टा होता है उसी प्रकार आत्मा भी वस्तुतः केवल द्रष्टा है। वह आंख के द्वारा रूप को देखता है, कान के द्वारा शब्द को सुनता है, नासिका के द्वारा सूंघता है, इत्यादि। मन अचेतन होता हुआ भी क्रिया वाला है तथा आत्मा चेतनायुक्त है। जब मन आत्मा के साथ संयुक्त होता है तभी क्रिया होती है अत एव आत्मा व्यपदेश से ही कर्ता कहलाता है। आत्मा के ज्ञान की प्रवृत्ति मन एवं ज्ञानेन्द्रिय आदि साधनों के योग से ही होती है। यदि आत्मा का मन के साथ योग न हो अथवा इन्द्रिय आदि करण निर्मल न हों तो विषय का ज्ञान नहीं हो सकता। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा भी है—आत्मा ज्ञः करणैर्योगान्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते। करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न प्रवर्तते॥
वक्तव्य—(i) इसमें सृष्टि उत्पत्ति का क्रम बताया गया है। अन्यत्र भी सृष्टि उत्पत्ति का यही क्रम मिलता है। सुश्रुत शा. अ. १ में कहा है—
सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्यजगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्। तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव। तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लिङ्ग एवाहंकार उत्पद्यते। स च त्रिविधो वैकारिकस्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकादहंदारात् तैजससहाय्याञ्च तल्लक्षणान्येवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते। तद्यथा—श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति। तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयात्मकं मनः, भूतादेरपि तैजससहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषाः शब्द स्पर्शरूप रसगन्धाः; तेभ्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोर्व्यः, एवमेषा तत्वचतुर्विंशतिर्व्याख्याता। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही विश्व की सृष्टि होती है। सांख्यकारिका में इसका बड़ा सुन्दर एवं उत्प्रेक्षात्मक वर्णन किया गया है—पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः
अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९९
अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९९
सर्गः ।। प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकात्पञ्चभ्यः पंचभूतानि। प्रकृति और पुरुष का संयोग ही सृष्टि का उत्पादक है क्योंकि प्रकृति जड़ है तथा पुरुष स्वभावतः निष्क्रिय है अतः ये पृथक् २ सृष्टि को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं है इसलिये दोनों का संयोग आवश्यक है। प्रकृति और पुरुष का यह संयोग अन्धे एवं लंगड़े के परस्पर संयोग के समान होता है। अन्धे में चलने की शक्ति है परन्तु उसे मार्ग नहीं दिखाई देता। इससे विपरीत लंगड़ा मार्ग देख सकता है परन्तु उसमें चलने का सामर्थ्य बिलकुल नहीं है। परन्तु पारस्परिक संयोग से अर्थात् लंगड़े व्यक्ति को यदि अन्धे के कन्धे पर बिठा दिया जाय तो कार्य सम्यक् प्रकार से सम्पन्न हो जाता है। उसी प्रकार प्रकृति एवं पुरुष का संयोग परस्पर सृष्टि उत्पत्तिरूप कार्य को करने में सफल होता है। पुरुष प्रकृति के संयोग का इच्छुक इसलिये बना रहता है कि वह उससे विवेक ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष की सिद्धि करता है। और प्रकृति पुरुष से इसलिये मिलना चाहती है क्योंकि पुरुष (भोक्ता) के अभाव में प्रकृति (भोग्या) की स्वरूप सिद्धि नहीं हो सकती। इस प्रकार दोनों का परस्पर संयोग कार्य में साधक होता है।
सांख्य सम्मत सृष्टिविकासक्रम निम्न प्रकार है—
पुरुष+प्रकृति
(अव्यक्त)
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महत्तत्व (बुद्धितत्व)
|
अहंकार
वैकारिक तैजस भूतादि
(सात्विक) (राजस) (तामस)
| / \ |
| सहायता से सहायता से |
| / \ |
v v v v
एकादश इन्द्रियां पांच तन्मात्राएं
(५ ज्ञानेन्द्रियां+५ कर्मेन्द्रियां+१ मन) |
पञ्चमहाभूत
(ii) क्षेत्रज्ञ—क्षेत्र का वास्तविक शब्दार्थ खेत है। दर्शन शास्त्र में चतुर्विंशति तत्व समुदाय (८ प्रकृति+१६ विकार) अर्थात् शरीर को क्षेत्र कहते हैं तथा क्षेत्र के ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में कहा है—इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद् यो वेत्तितं प्राहु क्षेत्रज्ञमिति तद्विदः ॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ इसी प्रकार चरक शा. अ. १ में कहा है—तदेव भावादग्राह्यं नित्यत्वान्न कुतश्चन। भावाज्ज्ञेयं, तदव्यक्तमचिन्त्य व्यक्तमन्यथा ॥ अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः। तस्माद्यदन्यत्तद्व्यक्तं वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः। अतोऽन्यत् पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहंकारस्तथाष्टमः। भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा विकाराश्चैव षोडशः ॥ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति संज्ञिताः ॥ इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम्। अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ अव्यक्त को छोड़कर शेष मूलप्रकृति और विकार का नाम क्षेत्र है। तथा इस क्षेत्र
१०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अध्यायः ? ]
के ज्ञाता अव्यक्त आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में अव्यक्त शब्द सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों के साम्यरूप मूलप्रकृति के लिये आया है तथा चरक संहिता में अव्यक्त शब्द आत्मसंयुक्त मूलप्रकृति के लिये हैं। (iii) आत्मा के लिङ्ग चरक शा. अ. १ में निम्न दिये हैं—प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः। इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत्॥ देशान्तरगतिःस्वप्ने पञ्चत्वं ग्रहणं तथा। दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमनस्तथा॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः। बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः॥ वैशेषिक दर्शन में भी कहा है—प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवन-मनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि। (iv) मन का लक्षण—चरक शा. अ. १ में कहा है—लक्षणं मनसो ज्ञानस्य भावो भाव एव च। सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते॥ वैवृत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते॥ जब आत्मा द्वारा विषय के ग्रहण के लिये प्रवृत्त किया गया मन उस २ विषय के ग्रहण के लिये उस २ इन्द्रिय की ओर जाता है तब वह मनोयुक्त इन्द्रिय उस विषय को ग्रहण करता है। उसी समय दूसरी इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में मन प्रवृत्त नहीं होता, अतएव एक ही काल में एक ज्ञान का होना तथा दूसरे का न होना यही मन का लक्षण है। न्यायदर्शन में भी कहा है—युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्। एक काल में मन के द्वारा एक ही विषय का ज्ञान हो सकता है। यदि ऐसा न हो तो आत्मा के विभु एवं सर्वज्ञ होने से सदा सब इन्द्रियों के विषयों का एक साथ ही ज्ञान होता रहेगा। इसी के साथ आत्मा, इन्द्रिय और विषयों का संयोग होने पर भी मन का संबन्ध न हो तो ज्ञान नहीं होता और यदि उनके साथ मन का भी संबन्ध हो तो ज्ञान होता है। इसीलिये वैशेषिक में भी कहा है—‘‘आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावश्चाभावश्च मनसो लिङ्गम्’’। (v) मन के गुण एकत्व तथा अणुत्व है। चरक शा. अ. १ में भी कहा है—अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ। प्रत्येक शरीर में मन एक होता है तथा अणु होता है। यदि मन अनेक तथा महत्परिमाण वाला हो तो युगपत् अनेक ज्ञान होने चाहिये परन्तु ऐसा नहीं होता। इसीलिये चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—“न चानेकत्वं नाण्वेकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते” इत्यादि। इसी प्रकार वैशेषिक दर्शन में कहा है—“प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम्” (vi) गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि—आकाश आदि पांच महाभूतों में से प्रथम (आकाश) में केवल एक गुण (शब्द) होता है। इसके पश्चात् के भूतों में एक २ गुण बढ़ता जाता है। जैसे—वायु में शब्द और स्पर्श। अग्नि में शब्द स्पर्श और रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस। और पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध गुण रहते हैं। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा है—तेषामेकगुणः पूर्वो गुणवृद्धिः परे परे। पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः॥ (vii) द्रव्य तथा उसका लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्। तद् द्रव्यं, ........। जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य, गुण, कर्म का समवायि कारण है उसे द्रव्य कहते हैं। इसी प्रकार वैशेषिक में कहा है—क्रियावद् गुणवत्समवायि कारणं द्रव्यम्। द्रव्यसंग्रह—खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः। ये ९ द्रव्य कहलाते हैं। (viii) गुण का लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः। जो समवायी, निष्क्रिय तथा कारण हो उसे गुण कहते हैं। समवायी अर्थात् जो द्रव्य-गुणरूप समवाय का आधेय है। इससे ज्ञात होता है कि गुण द्रव्य के आश्रित रहते हैं। निश्चेष्ट से अभिप्राय कर्मशून्य का है अर्थात् गुण कर्म नहीं करते तथा गुण करण भी नहीं होते हैं। गुणसंग्रह—चरक सू. अ. १ में कहा है—सार्थाः गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः। गुणाः प्रोक्ताः .......॥ शब्द आदि ५ विषय, गुरु आदि २० गुण, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न तथा पर आदि १० गुण। ये ४१ गुण कहलाते हैं। इनमें शब्दादि ५ गुण वैशेषिक गुण कहलाते हैं क्योंकि ये आकाश आदि पांच महाभूतों के विशेष गुण हैं। गुरु आदि २० गुण सामान्य गुण कहलाते हैं क्योंकि ये पांचो महाभूतों में सामान्यरूप से रहते हैं। बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख तथा प्रयत्न—आत्मगुण कहलाते हैं। परत्व आदि १० गुण भी सामान्य गुण ही हैं इनके अतिरिक्त कोई २ आचार्य ५ इन्द्रियों के शब्द आदि ५ विषयों के साथ छटे मन के विषयचिन्त्य विचार्य आदि का भी समावेश करते हैं इस प्रकार उनके मत में गुणों की संख्या ४२ हो जाती है।
असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०१
असमानगोत्रीयशारीराध्यायः
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वक्तव्य—यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। अध्याय के अन्त में समाप्तिसूचक वाक्य को देखकर ही अध्याय के इस नाम का संकेत मिलता है। अध्याय के नाम तथा प्रकरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसमें गर्भसम्बन्धी विवेचन किया गया होगा। गर्भाशय में गर्भ की मासिक वृद्धि (Intrauterine developement) का विषय इस अध्याय में दिया गया है। तृतीय मास से गर्भ की क्रमिक वृद्धि के विषय से ही यह खण्डित अध्याय प्रारम्भ होता है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इससे पूर्व के खण्डित भाग में गर्भधारण प्रक्रिया एवं गर्भधारण के बाद प्रथम तथा द्वितीय मास में होने वाली गर्भ की वृद्धि का विषय इसमें दिया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये चरक तथा सुश्रुत आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम उस विषय को यहां देने का प्रयत्न करेंगे। सबसे पूर्व अध्याय के नाम से यह स्पष्ट है कि परस्पर विवाह एवं मैथुन भिन्न गोत्र वालों का ही होना चाहिये। इससे सगोत्र विवाह का निषेध किया गया है। यद्यपि समान गोत्र वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर मैथुन से भी गर्भ स्थित हो जाता है परन्तु उसमें नाना प्रकार के रोग होते देखे जाते हैं। इसी लिये मनु महाराज ने भी सगोत्र विवाह को निषिद्ध ठहराया है—असपिण्डा च या मातुर सगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ।। इसीलिये चरक संहिता में भी शारीरस्थान का द्वितीय अध्याय इसी (अतुल्य गोत्रीय शारीर) नाम से दिया गया है। अब हम गर्भधारण प्रक्रिया का वर्णन करेंगे। जब पूर्ण युवा तथा अविकृत शुक्राणु वाला पुरुष पूर्ण युवती तथा मासिकस्राव से शुद्ध हुई स्त्री के साथ मैथुन करता है उस समय हर्ष से प्रेरित हुई शरीर की उत्कृष्ट धातु शुक्र रूप में प्रवृत्त होती है। शुक्र में स्थित शुक्राणु बाहर निकल कर स्त्री के योनिमार्ग द्वारा गर्भाशय में पहुंच कर आर्तव (Ovum) के साथ संयुक्त होता है तथा वहां गर्भ धारण कराता है। यह मैथुन ऋतुकाल में ही होना चाहिये। यह काल स्त्रियों में सामान्यतया आर्तव प्रवृत्ति से ज्ञात होता है। स्त्रियों में आर्तव प्रवृत्ति २८ दिन के बाद होती है। रजोदर्शन से लेकर पहले तीन दिन तक स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिये। इन दिनों में स्त्रियों को स्नान, श्रृंगार तथा अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक श्रम बिलकुल नहीं करना चाहिये। इसके बाद चतुर्थ दिन स्त्री को स्नान इत्यादि कर लेना चाहिये। स्नान करने के बाद वह शुद्ध कहलाती है। इस प्रकार रजोदर्शन के चौथे दिन से लेकर १२ दिन तक स्त्री तथा पुरुष को सन्तानोत्पत्ति के निमित्त मैथुन करना चाहिये। अन्तिम १६ वां दिन भी योनिसंकोच के कारण मैथुन के लिये त्याज्य है। चरक शारीर स्थान के द्वितीय अध्याय में विस्तार पूर्वक यथाविधि गर्भाधान का प्रकरण दिया हुआ है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह प्रकरण वहीं देखना चाहिये। इस गर्भ को पञ्चभूतों का विकार तथा चेतना (आत्मा) का आश्रय माना गया है। अर्थात् जब तक उसमें चेतना या आत्मा का संयोग न हो तब तक गर्भ की स्थापना नहीं होती। इसीलिये चरक में कहा है—‘शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति’। इस गर्भ का धीरे २ गर्भाशय में क्रमिक विकास होता जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—स सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि सम्मूर्च्छितः सर्वधातुकललीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः । पञ्चमहाभूतों के गुणों से युक्त हुआ वह आत्मा गर्भभाव को प्राप्त होकर प्रथम मास में सब धातुओं का उत्पादक होकर रूप में कफ के सदृश होता है। इस समय उसका शरीर अस्पष्ट होता है तथा उसके अवयव सत् भी होते हैं और असत् भी। अर्थात् प्रारम्भ में जब शुक्राणु तथा डिम्ब (Ovum) का संयोग होता है तब यह बीजरूप से गर्भाशय की आभ्यन्तरिक श्लैष्मिक कला में चिपक जाते हैं। इस अवस्था में इसके अङ्ग आदि बीजरूप में विद्यमान होने से सत् कहलाते हैं तथा रूप में अव्यक्त होने से असत् कहलाते हैं। यह बीज समयान्तर से बढ़ता जाता है तथा धीरे २ इसमें एक खोखली जगह हो
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जाती है जिसमें लेसदार द्रव भर जाता है इसीलिये प्रथम मास में इसका रूप कफ के सदृश बताया है। इसी को प्रकट करने के लिये सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘तत्र प्रथमे मासि कललं जायते’। दूसरे मास में गर्भाशय की श्लैष्मिक कला मोटी होने लगती है तथा यह बीजरूप गर्भ को चारों ओर से घेर लेती है। इसके ऊपर दो आवरण बन जाते हैं। इसी समय गर्भ के चारों ओर गर्भोदक (Liguor Amnoc) एकत्र हो जाता है। इसके दबाव से गर्भावरण की दोनों झिल्लियां परस्पर मिल जाती हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—“द्वितीये मासि घनः सम्पद्यते-पिण्डः पेश्यर्बुदं वा, तत्र पिण्डः पुरुषः स्त्री पेशी आर्द्रं नपुंसकम्”। यदि वह घनाकार गर्भ पिण्डरूप हो तो पुरुष, यदि मांस पेशी की आकृति का ही तो स्त्री तथा अर्बुदाकृति हो तो नपुंसक गर्भ होता है।
अब हम मूल ग्रन्थोक्त विषय पर आते हैं क्योंकि इस अध्याय का प्रस्तुत विषय इस प्रकरण के बाद ही प्रारम्भ होता है।
प्राणस्तु बीजधातुं हि विभजत्यस्थिसंख्य(स्थ)या । प्रविष्टमात्रं बीजं हि रक्तेन परिवेष्ट्यते ।।
शुक्रादस्थ्यस्थितो मांसमुभाभ्यां स्नायवः स्मृताः । सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा ।।
जीवात्मा के प्राण बीजधातु (शुक्रधातु) को अस्थि संस्थान के अनुसार विभक्त करता है। शरीर में प्रविष्ट हुआ बीज रक्त के द्वारा परिवेष्टित हो जाता है। अर्थात् जब पुरुष के शुक्राणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट होते हैं तब उस शुक्राणु के चारों ओर स्त्री का आर्तव फैल जाता है। शुक्र से गर्भस्थ बालक के अस्थि एवं मांस बनते हैं तथा इन दोनों से अर्थात् अस्थि और मांस से स्नायुओं का निर्माण होता है। यह गर्भावस्था में गर्भस्थ बालक की प्रथम दो मास की आन्तरिक वृद्धि का वर्णन किया गया है॥
तृतीये मासि युगपन्निर्वर्तन्ते यथाक्रमम् । प्रस्पन्दते चेतयति वेदनाश्चावबुद्ध्यते ।।
तृतीय मास में गर्भ की सब इन्द्रियां तथा सब अवयव यथाक्रम युगपत् (एकसाथ) प्रकट हो जाते हैं। गर्भ स्पन्दन करने लगता है। वह चेतना तथा वेदना का भी अनुभव करने लगता है। इस मास में उसकी इन्द्रियां अत्यन्त सूक्ष्म होती हैं तथा मन में सुख दुःख का ज्ञान होने लगता है। चरक शा. अ. ४ में भी कहा है—तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिण्डका निर्वर्तन्तेऽङ्गप्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति। इस मास में गर्भ के अङ्ग अत्यन्त सूक्ष्म रूप में होते हैं। चरक में इसी मास में गर्भ के हृदय का विकसित होना सूचित किया गया है। वहां कहा है—“तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद् द्वैहृदयमाचक्षते वृद्धाः मातृजं चास्य हृदयं मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं भवति रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः सम्पद्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृदयस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति कर्तुं, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु, तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणोपचरन्ति कुशलाः”। इस मास में गर्भ स्पन्दन करने लगता है तथा उसी समय मन में सुख दुःख आदि का ज्ञान होने लगता है तथा वह पूर्वजन्म के अनुभूत विषयों की इच्छा करने लगता है। इस काल में गर्भिणी को जो भी इच्छा होती है उसे दौहृद (दोहद) कहते हैं क्योंकि यह इच्छा दो हृदयों से उत्पन्न होती है। इस दौहृद को अवश्य पूरा करना चाहिये क्योंकि वास्तव में इस समय गर्भगत शिशु की इच्छा के अनुकूल ही माता की इच्छा हुआ करती है। उसे यदि पूरा नहीं किया जाता है तो गर्भ में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। सुश्रुत ने इस दौहृद को चतुर्थ मास में माना है। वास्तव में गर्भ का स्पन्दन तीसरे मास में प्रारम्भ हो जाता है परन्तु गर्भोदक के कारण उस समय उन स्पन्दनों का कई बार गर्भिणी को ज्ञान नहीं हो पाता है। चतुर्थ या पञ्चम मास में जाकर अधिक स्पष्ट हो जाने पर वह इन स्पन्दनों को अनुभव करती है॥
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सूक्ष्मप्रव्यक्तकरणस्तृतीये तु मनोऽधिकः । चतुर्थे स्थिरतां याति गर्भः कुक्षौ निरामयः ।।
चतुर्थ मास में गर्भ गर्भाशय में स्थिर हो जाता है तथा उपद्रवों से रहित होता है। इस मास में गर्भिणी का शरीर भी अधिक भारी हो जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—चतुर्थे मासि स्थिरतामापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्वमधिकमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भिणी को अपनी देह विशेष भारी मालूम पड़ने लगती है क्योंकि इस समय गर्भ की विशेष वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्तो भवति। गर्भहृदयप्रव्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिव्यक्तो भवति, कस्मात् तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति।
गुरुगात्रत्वमधिकं गर्भिण्यास्तत्र जायते । मांसशोणितवृद्धिस्तु पञ्चमे मासि जीवकं ! ।।
हे जीवक ! पांचवें मास में गर्भ के मांस और रक्त में विशेष वृद्धि होने लगती है। इसलिये इस समय गर्भिणी अत्यन्त कृश (दुर्बल) हो जाती है। अर्थात् इस मास में मांस और रक्त की अधिक वृद्धि के कारण गर्भ का स्पन्दन अधिक बढ़ जाने से अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—पञ्चमे मासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयः भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण परन्तु सुश्रुत में इससे विपरीत इस मास में मन का अधिक व्यक्त होना बताया है। वहां कहा है—पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति ॥
गर्भिणी पञ्चमे मासि तस्मात् कार्श्येन युज्यते । बलवर्णौजसां वृद्धिः षष्ठे मातुः श्रमोऽधिकः ।।
छठे मास में गर्भ में बल, वर्ण तथा ओज की वृद्धि होती है इसलिये माता (गर्भिणी) को अधिक श्रम (थकावट) हो जाती है। चरक शा.अ. ४ में कहा है—षष्ठेमासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भ के बल, वर्ण एवं ओज की अधिक वृद्धि होने से गर्भिणी दुर्बल हो जाती है तथा वर्ण भी पीला पड़ जाता है। सुश्रुत में इस मास में बुद्धि का आविर्भाव बताया है। शा.अ. ३ में कहा है—"षष्ठे बुद्धिः" ॥
सर्वधात्वङ्गसम्पूर्णो वातपित्तकफान्वितः । सप्तमे मासि तस्माच्च नित्यक्लान्ताऽत्र गर्भिणी ।।
सातवें मास में गर्भ सब धातुओं तथा अङ्गो से पूर्ण हो जाता है तथा वात पित्त और कफ से भी युक्त होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी सदा क्लान्ति (थकावट) अनुभव करती है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—सप्तमे मासि गर्भः सर्वभावैराप्यायते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वकारैः क्लान्ततमा भवति। परन्तु इस मास में सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः ॥
अष्टमे गर्भिणीगर्भावादादाते परस्परम् । ओजो र$^१$सवहायुक्तैः पूर्णत्वाच्छलयत्यपि ।।
तस्मात्तत्र मुहुर्ग्लानि मुहुर्हृष्टा च गर्भिणी । अत्ययं चाप्नुते तस्मान्न मासो गण्यतेऽष्टमः ।।
आठवें मास में गर्भ के पूर्ण होने से गर्भिणी तथा गर्भ, रसवाहा नाड़ियों के योग से ओज का परस्पर आदान प्रदान करते हैं तथा ओज के इधर उधर संचरण करने से गर्भ के विषय में सदा धोखा होता रहता है। अर्थात् ओज के बार २ विनिमय से मन में सदा सन्देह उत्पन्न होता रहता है कि गर्भ जीवित है या मृत हो चुका हैं। इसलिये इस मास में गर्भिणी कभी प्रसन्न होती है तथा कभी ग्लानियुक्त हो जाती है तथा उसे अन्य उपद्रव भी होते रहते हैं। इसलिये इस आठवें मास को प्रसव के लिये उचित काल नहीं माना है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अष्टमे मासि गर्भश्च मातृत्तो
१. रसवहानाडीयोगादित्यर्थः । गङ्गाधर प्रकाशितचरकपाठसंवादाद्यौचित्याच्च पूर्णत्वादिति पाठः साधुरेव । गर्भस्य पूर्णत्वमोजोग्रहणे हेतुः संभवति, ओजस इतस्ततःसंक्रमणेन गर्भश्छलयत्यपीत्यर्थः ।
१०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ]
गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिर्मुहुर्मुहुरोजः परस्परत आददाते गर्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदायुक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मात्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्; तं चैवमभिसमीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः । आठवें मास में गर्भ के अपूर्ण होने से (गंगाधर के अनुसार पूर्ण होने से—यही पाठ अधिक उचित प्रतीत होता है) माता से गर्भ तथा गर्भ से माता रसवाहिनियों द्वारा परस्पर ओज का ग्रहण करते हैं। अर्थात् इस समय ओज के अस्थिर होने से गर्भ का जन्म संकटमय समझा जाता है। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—अष्टमेऽस्थिराभवत्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेन्निरोजस्वान्नैर्ऋतभागत्वाच्च, ततो बलिं मांसौदनमस्यै दापयेत् ।। इस मास में उत्पन्न हुआ गर्भ या तो मृत ही होता है अथवा उसके पालन करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है ।।
नवमादिषु मासेषु जन्म चास्य यथाक्रमम् । पूर्वदेहकृतं कर्म गर्भावाससुखासुखम् ।।
जातः स्मरति तावच्च यावन्नोपैति जीविकाम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।
नवम इत्यादि मास में यथाक्रम इसका जन्म होता है । पूर्वजन्म में किये हुए कर्म, तथा गर्भावस्था के सुख और दुःख को उत्पन्न हुआ व्यक्ति तभी तक स्मरण रखता है जब तक कि वह नवीन जीवन को प्राप्त नहीं करता । अर्थात् नवजीवन प्राप्त करते ही मनुष्य पूर्वजन्म की सब बातों को भूलकर अपने जीवन की बिलकुल नवीनता प्रारंभ करता है ।
वक्तव्य—चरक शा. अ. ४ में प्रसवकाल १२ मास तक माना गया है । कहा है—तस्मिन्नेकदिवसमतिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकालमित्याहुराद्वादशान्मासात्, एतावान्कालः, वैकारिकमतः परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य । सुश्रुत शा.अ. ३ में भी कहा है—नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन् जायते, अतोऽन्यथा विकारी भवति । गर्भ के गर्भाशय में रहने का साधारणतया समय २८० दिन माना गया है । इससे हम गर्भ की आनुमानिक तिथि जान सकते हैं । अर्थात् अन्तिम ऋतुकाल की प्रथम तिथि में २८० दिन जोड़कर प्रसव की तिथि निकाली जा सकती है । अथवा अन्तिम ऋतुस्त्राव के प्रथम दिन में ७ दिन जोड़ने से जो तिथि आये वही नवम मास में प्रसव की तिथि होगी । उदाहरण के लिये यदि किसी स्त्री को अन्तिम मासिक स्त्राव १ दिसम्बर को हुआ हो तो इसमें ७ दिन जोड़कर आगे ९ महीने गिनने से ७ सितम्बर आता है जो कि प्रसव की संभावित तिथि होनी चाहिये ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।
गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः
अथातो गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम गर्भाक्रान्ति शारीर का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।
वक्तव्य—इस अध्याय में यह वर्णन किया जायगा कि गर्भाशय में गर्भ कैसे उत्पन्न होता है अथवा गर्भ में जीव किस प्रकार अवक्रमण (प्रवेश) करता है । सुश्रुत शा.अ. ३ की टीका में डल्लन ने लिखा है—अत्र हि शुक्रशोणितं
गर्भक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०५
गर्भशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूर्च्छितं गर्भं इत्युच्यते, तस्मावक्रान्तिरूपगमनमवतरणमिति यावत् गर्भावक्रान्तिः, साऽस्मिन्नस्तीति ॥१-२॥
जीवस्तु खलु भो सर्वगतत्वादीश्वरगुणसमन्वितः पूर्वशरीराच्चावक्रामति परशरीरं चोपक्रामति युगपत्, न कदाचिदपि बीजशोणितवाव्वाकाशादिमनोबुद्धिभिर्वियुक्तपूर्वः, सर्वगतत्वाच्च न कस्यांचिद्योनौ नोपपद्यते स्वकर्मफलानुभवादिति ।।३।।
हे वत्स ! जीव सर्वगत होने से ईश्वर के गुणों से युक्त हुआ युगपत् पूर्व शरीर से अवक्रमण (छुटकारा) तथा पर (दूसरे-अगले) शरीर में उपक्रमण (प्रवेश) करता है। अर्थात् जीव एक शरीर को छोड़ता है तथा उसके साथ ही दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाता है। ये कार्य युगपत् ही होते हैं। बीज (शुक्र), शोणित (आर्तव), वायु, आकाश आदि पञ्चमहाभूत, मन तथा बुद्धि से कभी भी इसका वियोग नहीं होता। अर्थात् गर्भ में इन सबका संयोग होना आवश्यक है। यह जीव सर्वगत होने से जिस किसी योनि में नहीं चलाजाता अपितु अपने २ (पूर्वजन्मकृत) कर्मों के फलों के अनुसार ही भिन्न २ योनियों को प्राप्त करता है ॥३॥
गर्भस्य पुनर्भगवन् ! के शरीरावयवा आकाशाद्विर्वर्तन्ते, के वायोः, के तेजसः, केऽद्भ्यः, के पृथिव्याः, के चास्य मातृजः संभवतः संभवन्ति, के चास्य पितृतः, किमात्मनः, किंच सात्म्यतः, किंच रसतः, किंच सत्त्वतः, कुत्र चैते सर्वभावा अन्वायत्ता भवन्ति कं चार्थमवेक्षन्ते; इति पृष्टो भगवान् कश्यप उवाच-गर्भस्य खलु भो शब्दश्च श्रोत्रं च लाघवं च सौक्ष्म्यं च विवेकश्च मुखं च कण्ठश्च कोष्ठं चाकाशात्मकानि भवन्ति, स्पर्शश्च स्पर्शनं च रौक्ष्यं च प्रेरणं च धातुव्यूहनं च प्राणाश्चापानश्च शरीरचेष्टा च वाय्वात्मकानि भवन्ति, रूपं च चक्षुश्च प्रकाशश्च पित्तं च पक्तिश्चोष्मा च शरीरवृद्धिश्च तैजसानि भवन्ति, रसश्च रसनं च शैत्यं च मार्दवं च द्रवश्च स्नेहश्च क्लेदश्च श्लेष्मा च मेदश्च रक्तं च मांसं च शुक्नं चाप्यानि भवन्ति, गन्धश्च घ्राणं च गौरवं च स्थैर्यं च मूर्तिश्च पार्थिवानि भवन्ति; तस्मात् पुरुषो लोकसंमितः प्रोच्यते। लोहितं च मांसं च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषधारणं चामाशयश्चोत्तरगुदश्च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं चेति मातृजानि, केशाश्च रोमाणि च श्मश्रूणि च नखाश्च दन्ताश्चास्थीनि च सिराश्च स्नायवश्च धमन्यश्च शुक्नं चेति पितृजानि, आयुश्चात्मज्ञानं च मनश्चेन्द्रियाणि च प्राणापानौ च धारणं च प्रेरणं च चाकृतिश्च स्वरवर्णोपचयविशेषाश्च सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ च स्मृतिश्चाहङ्कारश्च प्रयत्नश्चावस्थान्तरगमनं च सत्त्वं च नानायोनिषूपपत्तिश्चेत्यात्मजानि, आरोग्यं चोत्थानं च सन्तोषश्चेन्द्रियप्रसादश्च स्वरवर्णबीजसंपच्च मेधा च प्रहर्षभूयिष्ठता चेति सात्म्यजानि, शरीराभिनिर्वृत्तिश्च शरीराभिवृद्धिश्च प्राणाश्च बन्धश्च वृत्तिश्च पुष्टिश्चोत्साहश्चेति रसजानि। कल्याणरोषमोहात्मकं तु सत्त्वं त्रिविधमुक्तमग्रे, तत्रौप¹पादि(दु)कं सत्त्वं मनश्च लयि(?) नित्यं शुभाशुभमिश्रभावानां ²स्पर्श इत्युच्यते। ते सर्वभावाः स्वकर्मण्यायत्ताः कालं चावेक्षन्ते। वायुर्हि कालसहितः शरीरं विभजति संदधाति चेति ।।४।।
भगवन् ! गर्भ के शरीर के कौन से अवयव आकाश से उत्पन्न होते हैं तथा कौन से वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, माता के बीज, पिता के बीज, सात्म्य, रस तथा सत्व से उत्पन्न होते हैं ? तथा ये सब भाव परस्पर कहां मिलते हैं तथा
१. आत्मनः शरीरान्तरसम्बन्धकारकमित्यर्थः।
२. स्पर्श इति वेदमित्यर्थः।
| १०६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] |
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इनके परस्पर मिलने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया-आकाश तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-वत्स ! गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, सूक्ष्मता, विवेक, मुख, कण्ठ तथा कोष्ठ ये भाव आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायुतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-स्पर्श, त्वचा, रूक्षता, प्रेरणा (गति देना), धातुओं का परिवर्तन, प्राण, अपान तथा शरीर की चेष्टा (गतियां)-ये वायु से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। अग्नितत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रूप, चक्षु, प्रकाश, पित्त, पक्ति (पाचन), ऊष्मा (शरीर की गर्मी) तथा शरीर की वृद्धि-ये तैजस-अग्नि से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। जलतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रस, रसना (जिह्वा) शैत्य (शीतलता), मृदुता, द्रव, स्नेह, क्लेद (गीलापन) श्लेष्मा, मेद, रक्त, मांस तथा शुक्र-ये आप्य (जल से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। पृथिवी तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-गन्ध, घ्राण (नासिका), गुरुता, स्थिरता, तथा मूर्ति (आकृति-ढांचा) ये पार्थिव (पृथिवी से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। चरक शा. अ. ७ में इन महाभूतों से उत्पन्न होने वाले भावों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया है-तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद्गुरुरखरकठिनमङ्गं नखास्थिदन्तमांसचर्मवर्चः केशश्मश्रुनखलोमकण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च, यद्द्रवसरमन्दस्निग्धमृदुपिच्छिलं रसरुधिरवसाकफपित्तमूत्रस्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च, यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे तत्सर्वमाग्नेयं रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेषनिमेषाकुञ्चनप्रसारणगमनप्रेरणधारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्विविक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च, यत्प्रयोक्तृ तत्तत्प्रधानं, बुद्धिर्मनश्चेति। शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनावयवानां निर्दिष्टा। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १ में भी कहा है-आन्तरिक्षास्तु-शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्तता च। वायव्यास्तु-स्पर्शः, स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दनं लघुता च। तैजसास्तु-रूपं रूपेन्द्रिये वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिर्मर्षस्तैक्ष्ण्यं शौर्यं च। आप्यास्तु रसो रसेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्यं स्नेहो रेतश्च। पार्थिवास्तु-गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वभूतसमूहो गुरुता चेति। इसलिये यह पुरुष लोकसंमत (जगत के तुल्य) कहा जाता है। चरक शा.अ. ५ में भी कहा है-"पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवान्पुनर्वसुरात्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके"। षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्दं लभन्ते; तद्यथा-पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समुदिता 'पुरुषः' इति शब्दं लभन्ते। पुरुष इस महान् लोक का ही एक छोटा प्रतिरूप (Miniature) है। जितने भी मूर्तिमान् भाव इस लोक में हैं उतने ही पुरुष में हैं तथा जितने पुरुष में हैं उतने ही लोक में हैं। उदाहरण के लिये पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा अव्यक्त ब्रह्म-ये छः धातुएं मिलकर ही लोक कहाता है तथा इसीको पुरुष भी कहते हैं। चरक में आगे लोक एवं पुरुष की विभूतियों की विस्तृत तुलना की गई है-तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापो, वायुः प्राणो, वियच्छुषिराणि, ब्रह्मान्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिन्तर्रात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्वं, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदि त्यास्तु आदानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादो, वसवः सुखं, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवा सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं, यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, तथा द्वापरस्तथा स्थविर्यं, यथाकलिरवेमातुर्यं, यथायुगान्तथा मरणमिति, एवमनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश! सामान्यं विद्यात्। मातृज अर्थात् माता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव-रक्त, मांस, नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत् (Liver), प्लीहा (Spleen), वृक्क (Kidney-गुर्दे), बस्ति (मूत्राशय-Bladder), पुरीषधारण (पुरीष-मल का जहां धारण होता है-Sigmoid colon), आमाशय (Stomach), उत्तर गुदा (Rectum), अधरगुदा (Anus), क्षुद्रान्त्र (Small Intestines-छोटी आंते), स्थूलान्त्र (Large-intestines colon-बड़ी आंते)-ये मातृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में-त्वचा, वपा (मेद) तथा वपावहन (Adipose tissue) अधिक दिये हैं। कहा है-यानि चास्य मातृतः सम्भवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा-त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च यकृच्च प्लीहा
गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १०७
च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधानं चामाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—मांसशोणितमेदोमज्जहृन्नाभियकृत्प्लीहान्त्रगुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि। पितृज अर्थात् पिता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव—केश, रोम, दाढ़ी, मूंछ, नख, दांत, अस्थियां, शिरा, स्नायु धमनियां तथा शुक्र—ये पितृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी इन्हीं का परिगणन किया गया है—यानि चास्य पितृतः सम्भवतः संभवन्ति तान्तनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—केशश्मश्रुनखलोमदन्तास्थिसिरास्नायुधमन्यः शुक्रमिति पितृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘‘गर्भस्य केशश्मश्रुलोमास्थिनखदन्तसिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि’’। आत्मज (आत्मा से उत्पन्न होने वाले) भाव—आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रियां, प्राण, अपान, धारण (देह का धारण), प्रेरणा (गति), आकृति, स्वर तथा वर्ण का उपचय (वृद्धि), सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, स्मृति, अहंकार, प्रयत्न, अवस्थान्तर गगन (अन्य अवस्थाओं में जाना), सत्व तथा नाना योनियों में उत्पन्न होना—ये आत्मज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्यात्मजानि, यानि चास्यात्मतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा—तासु तासु योनिक्षूत्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणिः प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वरवर्णविशेषाः सुखदुःखेच्छाद्वेषौ चेतनाधृतिर्बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारः प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि। सुश्रुत शा.अ. ३ में कहा है—इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखदुःखादिक चात्मजानि। सात्म्यज अर्थात् सात्म्य के सेवन से उत्पन्न होनेवाले भाव—आरोग्य, उत्थान (उन्नति), सन्तोष, इन्द्रियों की प्रसन्नता, स्वर, वर्ण तथा बीज का उत्तम होना, मेधा (बुद्धि), हर्ष (प्रसन्नता अथवा मैथुन में हर्ष की अधिकता)—ये सात्म्यज भाव हैं। चरक शा.अ. ३ में कहा है—यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसम्पत्प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—वीर्यमारोग्यं बलवर्णौ मेधा च सात्म्यजानि। रसज अर्थात् रस के सेवन से उत्पन्न होने वाले भाव शरीर को उत्पन्न करना, शरीरं की वृद्धि, प्राण, बन्ध (बन्धन) वृत्ति (शरीर का यात्रा), पुष्टि तथा उत्साह—ये रसज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसततः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—शरीरस्याभिनिवृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि। सुश्रुत शा. अ ३ में भी कहा है—शरीरोपचयो बल वर्णः स्थितिर्हानिश्च रसजानि। कल्याण, रोष (क्रोध) तथा मोहात्मक—तीन प्रकार का सत्व पहले (लक्षणाध्याय में) कहा जा चुका है इनमें आत्मा अथवा जीव का शरीरान्तर के साथ संबन्ध कराने वाला सत्व शुभ अशुभ आदि मिश्रित भावों का सूचक (ज्ञान कराने वाला) है। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—अस्ति खल्वपि सत्वमौपपादुकं यज्जीवस्पृक् शरीरेण भिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यन्ते, बलं हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीनः प्राणाञ्जहाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहकं च मन इत्यभिधीयते, तत्रिविधमाख्यायते—शुद्धं राजसं तामसं चेति। येनास्य खलु मनो भूयिष्ठं तेन द्वितीयायामजातौ सम्प्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन सयुज्यते तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैवमनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर इत्युच्यते इति सत्वमुक्तम्। ये सब भाव अपने कर्मों के आश्रित हैं तथा काल की प्रतीक्षा करते हैं। काल सहित वायु शरीर का विभाजन करता है तथा इसे धारण करता है ॥४॥
तत्र श्लोकाः-
शोणिताद्धृदयं तस्य जायते हृदयाद्यकृत् ।। यकृतो जायते प्लीहा प्लीहः फुप्फुसमुच्यते ।।५।।
परस्परनिबन्धानि सर्वाण्येतानि भार्गव ! ।। तेषामधस्ताद्विपुलं स्रोतः कुण्डलसंस्थितम् ।।६।।
जरायुणा परिवीतं स गर्भाशय उच्यते ।। आमपक्वाशयौ तस्मिन्नन्नपानाश्रयौ गुदः ।।७।।
तस्मात् संजायते बस्तिः परिव्यन्दाच्च पूर्यते ।। धमनीमुखसंस्थाने स्रोतसी चाप्यधः स्मृते ।।८।।
| १०८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] |
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विण्मूत्रकृमिपक्वामकफपित्ताशयाः पृथक् ।। सन्त्येते देहिनां कोष्ठे स्त्रिया गर्भाशयोऽष्टमः ।। ९ ।।
शुक्रमज्जास्थि पितृतो मातृत्तो मांसशोणितम् ।। षट्कोशं प्रवदन्त्येके देह० ........ ।। १० ।।
....................... । ........................ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८१ तमं पत्रम्¹ ।)
गर्भ के शोणित (रक्त) से हृदय बनता है, हृदय से यकृत्, यकृत् से प्लीहा, तथा प्लीहा से फुफ्फुस (Lungs) बनते हैं। हे भार्गव (भृगुकुल में उत्पन्न जीवक) ! ये सब अङ्ग परस्पर संबद्ध होते हैं। इनके नीचे जरायु से युक्त तथा कुण्डलिनी चक्र में स्थित एक बड़ा स्रोत होता है जिसे गर्भाशय कहते हैं। (स्त्रीणां तु बस्तिपार्श्वगतो गर्भाशय इति सुश्रुतः)। इसमें आमाशय, पक्वाशय तथा अन्न एवं पान का आश्रय गुदा स्थित होती है। उससे बस्ति (श्रोणि गुहा—Pelvis cavity) बनती है जो स्राव से पूरित होती रहती है। इसके नीचे धमनीमुख संस्थान एवं स्त्रोतस् होते हैं। मनुष्यों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा पित्त के आशय (स्थान) पृथक् २ होते हैं। तथा स्त्रियों के कोष्ठ में इनके अतिरिक्त आठवां गर्भाशय भी होता है। पिता के अंश से गर्भ में शुक्र, मज्जा तथा अस्थियां बनती हैं और माता के अंश से मांस और शोणित बनते हैं। कुछ लोग देह में ६ कोश बताते हैं ........ ।।५-१०।।
**वक्तव्य—**यह अध्याय यहीं (मध्य में ही) समाप्त हो गया है। इसलिये विषय का पूर्ण ज्ञान होना कठिन है। उपलब्ध विषय से ही सन्तोष करना पड़ता है।
शरीरविचयशारीराध्यायः
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(द्वात्रिंशत्त मता दन्तास्तावन्त्यू) खलिकानि च।
पाणिपादाङ्गुल्यास्थीनि षष्टिः स्युर्विंशतिर्नखाः।
पाणिपादशलाकास्तु विंशतिः परिकीर्तिताः।
पाणिपादशलाकानामधिष्ठानचतुष्टयम् ।
द्वे पाष्ण्यो॑रस्थिनी कूर्चाश्चत्वारः पादयोः स्मृताः।
द्वावेव हस्तमणिकौ चत्वार्याहुररत्निषु।
जान्वस्थिनी द्वे संख्याते चत्वार्यस्थीनि जङ्घयोः।
द्वावूरुनलकौ द्वे च ख्याते जानुकपालिके।
द्वावंसावंसफलकावपि द्वावेव चाक्षकौ।
द्वे बाहुनलके द्वे द्वे श्रोणितालूषके तथा।
एकं जत्रु भगास्थ्येकं ग्रीवा पञ्चदशास्थिकी।
भार्गवाऽस्थीनि पृष्ठ्यानि चत्वारिंशच्च पञ्च च।
१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके।
शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०९
चतुर्दशास्थीन्युरसि हन्वस्थ्येकं तु निर्दिशेत् ।
शिरसस्तु कपालानि चत्वार्याहुर्मनीषिणः ।
चतुर्विंशतिः पार्श्वे च तावन्ति स्थालकानि च ।
चतुर्विंशतिरेवाहुः स्थालकार्बुदकानि च ।
द्वौ शङ्खौ परिसंख्यातौ द्वे हनुमूलबन्धने ।
ललाटनासिकागण्डकूटास्थ्येकं विनिदिशेत् ।
इत्यस्थिसंख्या सामान्याद् वृद्धिह्रासौ निमित्तजौ ।
वक्तव्य— यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में शरीर के विशेष ज्ञान का वर्णन किया गया है। 'शरीरविचय' शब्द की व्याख्या करते हुए चरक की टीका में चक्रपाणि ने कहा है—‘‘शरीरस्य विचयनं विचयः, शरीरस्य प्रविभागेन ज्ञानमित्यर्थः’’। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्व ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है। यहां सर्वप्रथम उन्हीं का पृथक २ परिगणन करते हैं। यह परिगणन स्थूल रूप में दिया गया है। यह संख्या पूर्णरूप से ठीक नहीं मिलती है। यह संख्या ३६३ होती है।
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| दांत | ३२ |
| दांत के उलूखल (गड्ढे) | ३२ |
| हाथ तथा पैर की अगुलियों की हड्डियां | ६० |
| नख | २० |
| हाथ तथा पैर की शलाकास्थियां<br>(Metacarpus $ metatarsus bones) | २० |
| उपर्युक्त शलाकास्थियों के अधिष्ठान | ४ |
| पाष्णि देश की अस्थियां | २ |
| पैरों की कूर्चास्थियां | ४ |
| हाथ की मणिबन्ध देश की (मणकास्थि) | २ |
| अरत्नि (प्रबाहु) की अस्थियां | ४ |
| जानु की अस्थियां | २ |
| जङ्घाओं की अस्थियां | ४ |
| उस देश की नलकास्थियां | २ |
| जानु कपालिका (Patella) | २ |
| अंस | २ |
| अंसफलक | २ |
| अक्षकास्थि (Cotterbones) | २ |
| बाहु की नलिकास्थियां | २ |
| श्रोणि की अस्थियां | २ |
| तालु की अस्थियां | २ |
| जत्रुदेश में | १ |
११० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शारीरविचयशारीराध्यायः ? ]
भगास्थि १
ग्रीवा की अस्थियां १५
पीठ की अस्थियां ४५
छाती में उरोस्थियां १४
हन्वस्थि १
शिर की कपालास्थियां ४
पार्श्वास्थियां २४
पार्श्वास्थियों के स्थालक (Facets) २४
अर्बुदाकृति स्थालक २४
शङ्खदेश की अस्थियां २
हनुमूल को बांधने वाली अस्थियां २
ललाटास्थि १
नासिका में १
गण्डास्थि १
कूटास्थि १
कुल— ३६३
**वक्तव्य—**यहां पर पूर्व अस्थियों की संख्या ३६० बताई गई है परन्तु पृथक् २ गिनने पर वे ३६३ हो जाती हैं। चरक शा. अ. ७ में भी ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है परन्तु उन्हें भी पृथक् २ गिनने पर वे ३६८ होती हैं। जयदेव विद्यालंकार ने अपनी चरक की टीका में हाथ पैर की शलाकास्थियों के ४ अधिष्ठान (चत्वार्यधिष्ठानान्येषां) तथा हाथ और पैरों के ४ पृष्ठ (चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि) को नहीं गिना है। इस प्रकार ३६० संख्या पूरी की है। यहां भी यदि हम शलाकास्थियों के अधिष्ठानों को न गिनें तो संख्या कुछ अंश तक पूरी हो सकती है। चरकोक्त अस्थियां निम्न प्रकार से हैं—त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तोलूखलनखैः; तद्यथा—द्वांत्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, विंशतिः पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपाद पृष्ठानि, ष्ठ्यङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्योर्मणिकाः चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, बाह्वोः मांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुंसां मेढ्रास्थि, एकं त्रिकसं श्रितम् एकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायां, द्वे जत्रुणि, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्डयोर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशतिश्चतुर्विंशतिः पञ्जरास्थीनि च पार्श्विकानि, तावन्ति चैषां स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि द्विसप्ततिः द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिरःकपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति। इस प्रकार हमें प्रकृत ग्रन्थ तथा चरक की अस्थि गणना में निम्न अन्तर मिलता है—
| चरक | काश्यपसंहिता | |
|---|---|---|
| पाणिपादपृष्ठानि | ४ | × |
| कूर्चास्थियां | २ | ४ |
| हाथों की मणिकास्थि | ४ | २ |
| गुल्फास्थि | ४ | × |
| कूर्परास्थि | २ | × |
| अंसफलक | × | २ |