काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १०३ |
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सूक्ष्मप्रव्यक्तकरणस्तृतीये तु मनोऽधिकः । चतुर्थे स्थिरतां याति गर्भः कुक्षौ निरामयः ।।
चतुर्थ मास में गर्भ गर्भाशय में स्थिर हो जाता है तथा उपद्रवों से रहित होता है। इस मास में गर्भिणी का शरीर भी अधिक भारी हो जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—चतुर्थे मासि स्थिरतामापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्वमधिकमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भिणी को अपनी देह विशेष भारी मालूम पड़ने लगती है क्योंकि इस समय गर्भ की विशेष वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्तो भवति। गर्भहृदयप्रव्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिव्यक्तो भवति, कस्मात् तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति।
गुरुगात्रत्वमधिकं गर्भिण्यास्तत्र जायते । मांसशोणितवृद्धिस्तु पञ्चमे मासि जीवकं ! ।।
हे जीवक ! पांचवें मास में गर्भ के मांस और रक्त में विशेष वृद्धि होने लगती है। इसलिये इस समय गर्भिणी अत्यन्त कृश (दुर्बल) हो जाती है। अर्थात् इस मास में मांस और रक्त की अधिक वृद्धि के कारण गर्भ का स्पन्दन अधिक बढ़ जाने से अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—पञ्चमे मासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयः भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण परन्तु सुश्रुत में इससे विपरीत इस मास में मन का अधिक व्यक्त होना बताया है। वहां कहा है—पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति ॥
गर्भिणी पञ्चमे मासि तस्मात् कार्श्येन युज्यते । बलवर्णौजसां वृद्धिः षष्ठे मातुः श्रमोऽधिकः ।।
छठे मास में गर्भ में बल, वर्ण तथा ओज की वृद्धि होती है इसलिये माता (गर्भिणी) को अधिक श्रम (थकावट) हो जाती है। चरक शा.अ. ४ में कहा है—षष्ठेमासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भ के बल, वर्ण एवं ओज की अधिक वृद्धि होने से गर्भिणी दुर्बल हो जाती है तथा वर्ण भी पीला पड़ जाता है। सुश्रुत में इस मास में बुद्धि का आविर्भाव बताया है। शा.अ. ३ में कहा है—"षष्ठे बुद्धिः" ॥
सर्वधात्वङ्गसम्पूर्णो वातपित्तकफान्वितः । सप्तमे मासि तस्माच्च नित्यक्लान्ताऽत्र गर्भिणी ।।
सातवें मास में गर्भ सब धातुओं तथा अङ्गो से पूर्ण हो जाता है तथा वात पित्त और कफ से भी युक्त होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी सदा क्लान्ति (थकावट) अनुभव करती है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—सप्तमे मासि गर्भः सर्वभावैराप्यायते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वकारैः क्लान्ततमा भवति। परन्तु इस मास में सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः ॥
अष्टमे गर्भिणीगर्भावादादाते परस्परम् । ओजो र$^१$सवहायुक्तैः पूर्णत्वाच्छलयत्यपि ।।
तस्मात्तत्र मुहुर्ग्लानि मुहुर्हृष्टा च गर्भिणी । अत्ययं चाप्नुते तस्मान्न मासो गण्यतेऽष्टमः ।।
आठवें मास में गर्भ के पूर्ण होने से गर्भिणी तथा गर्भ, रसवाहा नाड़ियों के योग से ओज का परस्पर आदान प्रदान करते हैं तथा ओज के इधर उधर संचरण करने से गर्भ के विषय में सदा धोखा होता रहता है। अर्थात् ओज के बार २ विनिमय से मन में सदा सन्देह उत्पन्न होता रहता है कि गर्भ जीवित है या मृत हो चुका हैं। इसलिये इस मास में गर्भिणी कभी प्रसन्न होती है तथा कभी ग्लानियुक्त हो जाती है तथा उसे अन्य उपद्रव भी होते रहते हैं। इसलिये इस आठवें मास को प्रसव के लिये उचित काल नहीं माना है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अष्टमे मासि गर्भश्च मातृत्तो
१. रसवहानाडीयोगादित्यर्थः । गङ्गाधर प्रकाशितचरकपाठसंवादाद्यौचित्याच्च पूर्णत्वादिति पाठः साधुरेव । गर्भस्य पूर्णत्वमोजोग्रहणे हेतुः संभवति, ओजस इतस्ततःसंक्रमणेन गर्भश्छलयत्यपीत्यर्थः ।