काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | असमानगोत्रीयशरीराध्यायः ? ]
जाती है जिसमें लेसदार द्रव भर जाता है इसीलिये प्रथम मास में इसका रूप कफ के सदृश बताया है। इसी को प्रकट करने के लिये सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘तत्र प्रथमे मासि कललं जायते’। दूसरे मास में गर्भाशय की श्लैष्मिक कला मोटी होने लगती है तथा यह बीजरूप गर्भ को चारों ओर से घेर लेती है। इसके ऊपर दो आवरण बन जाते हैं। इसी समय गर्भ के चारों ओर गर्भोदक (Liguor Amnoc) एकत्र हो जाता है। इसके दबाव से गर्भावरण की दोनों झिल्लियां परस्पर मिल जाती हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—“द्वितीये मासि घनः सम्पद्यते-पिण्डः पेश्यर्बुदं वा, तत्र पिण्डः पुरुषः स्त्री पेशी आर्द्रं नपुंसकम्”। यदि वह घनाकार गर्भ पिण्डरूप हो तो पुरुष, यदि मांस पेशी की आकृति का ही तो स्त्री तथा अर्बुदाकृति हो तो नपुंसक गर्भ होता है।
अब हम मूल ग्रन्थोक्त विषय पर आते हैं क्योंकि इस अध्याय का प्रस्तुत विषय इस प्रकरण के बाद ही प्रारम्भ होता है।
प्राणस्तु बीजधातुं हि विभजत्यस्थिसंख्य(स्थ)या । प्रविष्टमात्रं बीजं हि रक्तेन परिवेष्ट्यते ।।
शुक्रादस्थ्यस्थितो मांसमुभाभ्यां स्नायवः स्मृताः । सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा ।।
जीवात्मा के प्राण बीजधातु (शुक्रधातु) को अस्थि संस्थान के अनुसार विभक्त करता है। शरीर में प्रविष्ट हुआ बीज रक्त के द्वारा परिवेष्टित हो जाता है। अर्थात् जब पुरुष के शुक्राणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट होते हैं तब उस शुक्राणु के चारों ओर स्त्री का आर्तव फैल जाता है। शुक्र से गर्भस्थ बालक के अस्थि एवं मांस बनते हैं तथा इन दोनों से अर्थात् अस्थि और मांस से स्नायुओं का निर्माण होता है। यह गर्भावस्था में गर्भस्थ बालक की प्रथम दो मास की आन्तरिक वृद्धि का वर्णन किया गया है॥
तृतीये मासि युगपन्निर्वर्तन्ते यथाक्रमम् । प्रस्पन्दते चेतयति वेदनाश्चावबुद्ध्यते ।।
तृतीय मास में गर्भ की सब इन्द्रियां तथा सब अवयव यथाक्रम युगपत् (एकसाथ) प्रकट हो जाते हैं। गर्भ स्पन्दन करने लगता है। वह चेतना तथा वेदना का भी अनुभव करने लगता है। इस मास में उसकी इन्द्रियां अत्यन्त सूक्ष्म होती हैं तथा मन में सुख दुःख का ज्ञान होने लगता है। चरक शा. अ. ४ में भी कहा है—तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिण्डका निर्वर्तन्तेऽङ्गप्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति। इस मास में गर्भ के अङ्ग अत्यन्त सूक्ष्म रूप में होते हैं। चरक में इसी मास में गर्भ के हृदय का विकसित होना सूचित किया गया है। वहां कहा है—“तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद् द्वैहृदयमाचक्षते वृद्धाः मातृजं चास्य हृदयं मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं भवति रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः सम्पद्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृदयस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति कर्तुं, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु, तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणोपचरन्ति कुशलाः”। इस मास में गर्भ स्पन्दन करने लगता है तथा उसी समय मन में सुख दुःख आदि का ज्ञान होने लगता है तथा वह पूर्वजन्म के अनुभूत विषयों की इच्छा करने लगता है। इस काल में गर्भिणी को जो भी इच्छा होती है उसे दौहृद (दोहद) कहते हैं क्योंकि यह इच्छा दो हृदयों से उत्पन्न होती है। इस दौहृद को अवश्य पूरा करना चाहिये क्योंकि वास्तव में इस समय गर्भगत शिशु की इच्छा के अनुकूल ही माता की इच्छा हुआ करती है। उसे यदि पूरा नहीं किया जाता है तो गर्भ में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। सुश्रुत ने इस दौहृद को चतुर्थ मास में माना है। वास्तव में गर्भ का स्पन्दन तीसरे मास में प्रारम्भ हो जाता है परन्तु गर्भोदक के कारण उस समय उन स्पन्दनों का कई बार गर्भिणी को ज्ञान नहीं हो पाता है। चतुर्थ या पञ्चम मास में जाकर अधिक स्पष्ट हो जाने पर वह इन स्पन्दनों को अनुभव करती है॥