भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०१

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः

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वक्तव्य—यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। अध्याय के अन्त में समाप्तिसूचक वाक्य को देखकर ही अध्याय के इस नाम का संकेत मिलता है। अध्याय के नाम तथा प्रकरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसमें गर्भसम्बन्धी विवेचन किया गया होगा। गर्भाशय में गर्भ की मासिक वृद्धि (Intrauterine developement) का विषय इस अध्याय में दिया गया है। तृतीय मास से गर्भ की क्रमिक वृद्धि के विषय से ही यह खण्डित अध्याय प्रारम्भ होता है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इससे पूर्व के खण्डित भाग में गर्भधारण प्रक्रिया एवं गर्भधारण के बाद प्रथम तथा द्वितीय मास में होने वाली गर्भ की वृद्धि का विषय इसमें दिया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये चरक तथा सुश्रुत आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम उस विषय को यहां देने का प्रयत्न करेंगे। सबसे पूर्व अध्याय के नाम से यह स्पष्ट है कि परस्पर विवाह एवं मैथुन भिन्न गोत्र वालों का ही होना चाहिये। इससे सगोत्र विवाह का निषेध किया गया है। यद्यपि समान गोत्र वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर मैथुन से भी गर्भ स्थित हो जाता है परन्तु उसमें नाना प्रकार के रोग होते देखे जाते हैं। इसी लिये मनु महाराज ने भी सगोत्र विवाह को निषिद्ध ठहराया है—असपिण्डा च या मातुर सगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ।। इसीलिये चरक संहिता में भी शारीरस्थान का द्वितीय अध्याय इसी (अतुल्य गोत्रीय शारीर) नाम से दिया गया है। अब हम गर्भधारण प्रक्रिया का वर्णन करेंगे। जब पूर्ण युवा तथा अविकृत शुक्राणु वाला पुरुष पूर्ण युवती तथा मासिकस्राव से शुद्ध हुई स्त्री के साथ मैथुन करता है उस समय हर्ष से प्रेरित हुई शरीर की उत्कृष्ट धातु शुक्र रूप में प्रवृत्त होती है। शुक्र में स्थित शुक्राणु बाहर निकल कर स्त्री के योनिमार्ग द्वारा गर्भाशय में पहुंच कर आर्तव (Ovum) के साथ संयुक्त होता है तथा वहां गर्भ धारण कराता है। यह मैथुन ऋतुकाल में ही होना चाहिये। यह काल स्त्रियों में सामान्यतया आर्तव प्रवृत्ति से ज्ञात होता है। स्त्रियों में आर्तव प्रवृत्ति २८ दिन के बाद होती है। रजोदर्शन से लेकर पहले तीन दिन तक स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिये। इन दिनों में स्त्रियों को स्नान, श्रृंगार तथा अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक श्रम बिलकुल नहीं करना चाहिये। इसके बाद चतुर्थ दिन स्त्री को स्नान इत्यादि कर लेना चाहिये। स्नान करने के बाद वह शुद्ध कहलाती है। इस प्रकार रजोदर्शन के चौथे दिन से लेकर १२ दिन तक स्त्री तथा पुरुष को सन्तानोत्पत्ति के निमित्त मैथुन करना चाहिये। अन्तिम १६ वां दिन भी योनिसंकोच के कारण मैथुन के लिये त्याज्य है। चरक शारीर स्थान के द्वितीय अध्याय में विस्तार पूर्वक यथाविधि गर्भाधान का प्रकरण दिया हुआ है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह प्रकरण वहीं देखना चाहिये। इस गर्भ को पञ्चभूतों का विकार तथा चेतना (आत्मा) का आश्रय माना गया है। अर्थात् जब तक उसमें चेतना या आत्मा का संयोग न हो तब तक गर्भ की स्थापना नहीं होती। इसीलिये चरक में कहा है—‘शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति’। इस गर्भ का धीरे २ गर्भाशय में क्रमिक विकास होता जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—स सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि सम्मूर्च्छितः सर्वधातुकललीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः । पञ्चमहाभूतों के गुणों से युक्त हुआ वह आत्मा गर्भभाव को प्राप्त होकर प्रथम मास में सब धातुओं का उत्पादक होकर रूप में कफ के सदृश होता है। इस समय उसका शरीर अस्पष्ट होता है तथा उसके अवयव सत् भी होते हैं और असत् भी। अर्थात् प्रारम्भ में जब शुक्राणु तथा डिम्ब (Ovum) का संयोग होता है तब यह बीजरूप से गर्भाशय की आभ्यन्तरिक श्लैष्मिक कला में चिपक जाते हैं। इस अवस्था में इसके अङ्ग आदि बीजरूप में विद्यमान होने से सत् कहलाते हैं तथा रूप में अव्यक्त होने से असत् कहलाते हैं। यह बीज समयान्तर से बढ़ता जाता है तथा धीरे २ इसमें एक खोखली जगह हो