भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

१०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अध्यायः ? ]

के ज्ञाता अव्यक्त आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में अव्यक्त शब्द सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों के साम्यरूप मूलप्रकृति के लिये आया है तथा चरक संहिता में अव्यक्त शब्द आत्मसंयुक्त मूलप्रकृति के लिये हैं। (iii) आत्मा के लिङ्ग चरक शा. अ. १ में निम्न दिये हैं—प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः। इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत्॥ देशान्तरगतिःस्वप्ने पञ्चत्वं ग्रहणं तथा। दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमनस्तथा॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः। बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः॥ वैशेषिक दर्शन में भी कहा है—प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवन-मनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि। (iv) मन का लक्षण—चरक शा. अ. १ में कहा है—लक्षणं मनसो ज्ञानस्य भावो भाव एव च। सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते॥ वैवृत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते॥ जब आत्मा द्वारा विषय के ग्रहण के लिये प्रवृत्त किया गया मन उस २ विषय के ग्रहण के लिये उस २ इन्द्रिय की ओर जाता है तब वह मनोयुक्त इन्द्रिय उस विषय को ग्रहण करता है। उसी समय दूसरी इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में मन प्रवृत्त नहीं होता, अतएव एक ही काल में एक ज्ञान का होना तथा दूसरे का न होना यही मन का लक्षण है। न्यायदर्शन में भी कहा है—युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्। एक काल में मन के द्वारा एक ही विषय का ज्ञान हो सकता है। यदि ऐसा न हो तो आत्मा के विभु एवं सर्वज्ञ होने से सदा सब इन्द्रियों के विषयों का एक साथ ही ज्ञान होता रहेगा। इसी के साथ आत्मा, इन्द्रिय और विषयों का संयोग होने पर भी मन का संबन्ध न हो तो ज्ञान नहीं होता और यदि उनके साथ मन का भी संबन्ध हो तो ज्ञान होता है। इसीलिये वैशेषिक में भी कहा है—‘‘आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावश्चाभावश्च मनसो लिङ्गम्’’। (v) मन के गुण एकत्व तथा अणुत्व है। चरक शा. अ. १ में भी कहा है—अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ। प्रत्येक शरीर में मन एक होता है तथा अणु होता है। यदि मन अनेक तथा महत्परिमाण वाला हो तो युगपत् अनेक ज्ञान होने चाहिये परन्तु ऐसा नहीं होता। इसीलिये चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—“न चानेकत्वं नाण्वेकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते” इत्यादि। इसी प्रकार वैशेषिक दर्शन में कहा है—“प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम्” (vi) गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि—आकाश आदि पांच महाभूतों में से प्रथम (आकाश) में केवल एक गुण (शब्द) होता है। इसके पश्चात् के भूतों में एक २ गुण बढ़ता जाता है। जैसे—वायु में शब्द और स्पर्श। अग्नि में शब्द स्पर्श और रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस। और पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध गुण रहते हैं। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा है—तेषामेकगुणः पूर्वो गुणवृद्धिः परे परे। पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः॥ (vii) द्रव्य तथा उसका लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्। तद् द्रव्यं, ........। जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य, गुण, कर्म का समवायि कारण है उसे द्रव्य कहते हैं। इसी प्रकार वैशेषिक में कहा है—क्रियावद् गुणवत्समवायि कारणं द्रव्यम्। द्रव्यसंग्रह—खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः। ये ९ द्रव्य कहलाते हैं। (viii) गुण का लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः। जो समवायी, निष्क्रिय तथा कारण हो उसे गुण कहते हैं। समवायी अर्थात् जो द्रव्य-गुणरूप समवाय का आधेय है। इससे ज्ञात होता है कि गुण द्रव्य के आश्रित रहते हैं। निश्चेष्ट से अभिप्राय कर्मशून्य का है अर्थात् गुण कर्म नहीं करते तथा गुण करण भी नहीं होते हैं। गुणसंग्रह—चरक सू. अ. १ में कहा है—सार्थाः गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः। गुणाः प्रोक्ताः .......॥ शब्द आदि ५ विषय, गुरु आदि २० गुण, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न तथा पर आदि १० गुण। ये ४१ गुण कहलाते हैं। इनमें शब्दादि ५ गुण वैशेषिक गुण कहलाते हैं क्योंकि ये आकाश आदि पांच महाभूतों के विशेष गुण हैं। गुरु आदि २० गुण सामान्य गुण कहलाते हैं क्योंकि ये पांचो महाभूतों में सामान्यरूप से रहते हैं। बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख तथा प्रयत्न—आत्मगुण कहलाते हैं। परत्व आदि १० गुण भी सामान्य गुण ही हैं इनके अतिरिक्त कोई २ आचार्य ५ इन्द्रियों के शब्द आदि ५ विषयों के साथ छटे मन के विषयचिन्त्य विचार्य आदि का भी समावेश करते हैं इस प्रकार उनके मत में गुणों की संख्या ४२ हो जाती है।