काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९९
सर्गः ।। प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकात्पञ्चभ्यः पंचभूतानि। प्रकृति और पुरुष का संयोग ही सृष्टि का उत्पादक है क्योंकि प्रकृति जड़ है तथा पुरुष स्वभावतः निष्क्रिय है अतः ये पृथक् २ सृष्टि को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं है इसलिये दोनों का संयोग आवश्यक है। प्रकृति और पुरुष का यह संयोग अन्धे एवं लंगड़े के परस्पर संयोग के समान होता है। अन्धे में चलने की शक्ति है परन्तु उसे मार्ग नहीं दिखाई देता। इससे विपरीत लंगड़ा मार्ग देख सकता है परन्तु उसमें चलने का सामर्थ्य बिलकुल नहीं है। परन्तु पारस्परिक संयोग से अर्थात् लंगड़े व्यक्ति को यदि अन्धे के कन्धे पर बिठा दिया जाय तो कार्य सम्यक् प्रकार से सम्पन्न हो जाता है। उसी प्रकार प्रकृति एवं पुरुष का संयोग परस्पर सृष्टि उत्पत्तिरूप कार्य को करने में सफल होता है। पुरुष प्रकृति के संयोग का इच्छुक इसलिये बना रहता है कि वह उससे विवेक ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष की सिद्धि करता है। और प्रकृति पुरुष से इसलिये मिलना चाहती है क्योंकि पुरुष (भोक्ता) के अभाव में प्रकृति (भोग्या) की स्वरूप सिद्धि नहीं हो सकती। इस प्रकार दोनों का परस्पर संयोग कार्य में साधक होता है।
सांख्य सम्मत सृष्टिविकासक्रम निम्न प्रकार है—
पुरुष+प्रकृति
(अव्यक्त)
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महत्तत्व (बुद्धितत्व)
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अहंकार
वैकारिक तैजस भूतादि
(सात्विक) (राजस) (तामस)
| / \ |
| सहायता से सहायता से |
| / \ |
v v v v
एकादश इन्द्रियां पांच तन्मात्राएं
(५ ज्ञानेन्द्रियां+५ कर्मेन्द्रियां+१ मन) |
पञ्चमहाभूत
(ii) क्षेत्रज्ञ—क्षेत्र का वास्तविक शब्दार्थ खेत है। दर्शन शास्त्र में चतुर्विंशति तत्व समुदाय (८ प्रकृति+१६ विकार) अर्थात् शरीर को क्षेत्र कहते हैं तथा क्षेत्र के ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में कहा है—इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद् यो वेत्तितं प्राहु क्षेत्रज्ञमिति तद्विदः ॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ इसी प्रकार चरक शा. अ. १ में कहा है—तदेव भावादग्राह्यं नित्यत्वान्न कुतश्चन। भावाज्ज्ञेयं, तदव्यक्तमचिन्त्य व्यक्तमन्यथा ॥ अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः। तस्माद्यदन्यत्तद्व्यक्तं वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः। अतोऽन्यत् पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहंकारस्तथाष्टमः। भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा विकाराश्चैव षोडशः ॥ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति संज्ञिताः ॥ इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम्। अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ अव्यक्त को छोड़कर शेष मूलप्रकृति और विकार का नाम क्षेत्र है। तथा इस क्षेत्र