भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 456

९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [अध्यायः ?]

कहते हैं, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा (Anus) तथा उपस्थ (जननेन्द्रिय-Penis) ये पांच कर्मेन्द्रियां, शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध आदि पांच इन्द्रियों के पांच विषय तथा अतीन्द्रिय (जो इन्द्रियों का विषय न हो) मन—ये १६ विकार हैं। महदादि सम्पूर्ण अव्यक्तों को क्षेत्र कहते हैं तथा शाश्वत एवं अचिन्त्य आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। इस (आत्मा) के निम्न लक्षण हैं-चेतना, अहंकार, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, सुख, दुःख इच्छा, द्वेष, स्मृति, धृति, बुद्धि आदि। इन लक्षणों के अभाव में व्यक्ति मृत होता है। (शरीर, इन्द्रिय, आत्मा, तथा सत्व (मन) के समुदाय को पुरुष कहते हैं। कुछ लोग आत्मा को पुरुष मानते हैं। ज्ञान का युगपत् अभाव तथा भाव मन का लक्षण है। उस (मन) के एकत्व तथा अणुत्व दो गुण माने जाते हैं। प्रयत्न तथा ज्ञान के युगपत् (साथ २) न होने से मन एक है, अनेक नहीं। मन के सहित ही इन्द्रियां अर्थ (विषय) के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। अर्थात् यदि किसी विषय में मन लगा हुआ नहीं है तो इन्द्रियां उस विषय के ग्रहण करने में कदापि समर्थ नहीं हो सकती। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पञ्चमहाभूत शरीर की उत्पत्ति के कारण कहे जाते हैं। शब्द आदि (शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध) पांच महाभूतों के गुण हैं। शब्द स्पर्श आदि गुणों की क्रमशः वृद्धि द्वारा विद्यमान पञ्चमहाभूत, दिशाएँ, आत्मा, मन तथा काल (ये नौ) द्रव्य कहलाते हैं। गुण द्रव्य पर आश्रित रहते हैं। आकाश का लिङ्ग (गुण)—अप्रतिषेध (अप्रतिघात किसी प्रकार की रुकावट का न होना), वायु का लक्षण गति, अग्नि का उष्णता, जल का द्रवत्व (Liquid) तथा पृथिवी का गुण स्थिरता होता है। मन सहित इन्द्रियों (६ इन्द्रियों) में से तीन विप्रकृष्ट (दूर) तथा तीन सन्निकृष्ट (समीप) कार्य के लिये हैं। इनमें मन, चक्षु तथा श्रोत्र विप्रकृष्ट तथा घ्राण, रसना और त्वचा सन्निकृष्ट कार्य वाली हैं। इन सबको स्पर्शन लक्षण कहते हैं। उदाहरण के लिये जिस प्रकार कोई मनुष्य चारों ओर से गवाक्षों (झरोखों) वाले महल में बैठा हुआ झरोखों के द्वारा भिन्न २ विषयों का ग्रहण करता है (देखता है) उसी प्रकार यह आत्मा शरीर में स्थित हुआ स्वस्थ इन्द्रियों के द्वारा मन के ....... (योग से भिन्न २ विषयों को ग्रहण करता है) अर्थात् जिस प्रकार मकान में बैठा हुआ मनुष्य केवल द्रष्टा होता है उसी प्रकार आत्मा भी वस्तुतः केवल द्रष्टा है। वह आंख के द्वारा रूप को देखता है, कान के द्वारा शब्द को सुनता है, नासिका के द्वारा सूंघता है, इत्यादि। मन अचेतन होता हुआ भी क्रिया वाला है तथा आत्मा चेतनायुक्त है। जब मन आत्मा के साथ संयुक्त होता है तभी क्रिया होती है अत एव आत्मा व्यपदेश से ही कर्ता कहलाता है। आत्मा के ज्ञान की प्रवृत्ति मन एवं ज्ञानेन्द्रिय आदि साधनों के योग से ही होती है। यदि आत्मा का मन के साथ योग न हो अथवा इन्द्रिय आदि करण निर्मल न हों तो विषय का ज्ञान नहीं हो सकता। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा भी है—आत्मा ज्ञः करणैर्योगान्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते। करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न प्रवर्तते॥

वक्तव्य—(i) इसमें सृष्टि उत्पत्ति का क्रम बताया गया है। अन्यत्र भी सृष्टि उत्पत्ति का यही क्रम मिलता है। सुश्रुत शा. अ. १ में कहा है—

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्यजगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्। तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव। तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लिङ्ग एवाहंकार उत्पद्यते। स च त्रिविधो वैकारिकस्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकादहंदारात् तैजससहाय्याञ्च तल्लक्षणान्येवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते। तद्यथा—श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति। तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयात्मकं मनः, भूतादेरपि तैजससहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषाः शब्द स्पर्शरूप रसगन्धाः; तेभ्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोर्व्यः, एवमेषा तत्वचतुर्विंशतिर्व्याख्याता। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही विश्व की सृष्टि होती है। सांख्यकारिका में इसका बड़ा सुन्दर एवं उत्प्रेक्षात्मक वर्णन किया गया है—पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः