भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [अध्यायः ?]

कहते हैं, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा (Anus) तथा उपस्थ (जननेन्द्रिय-Penis) ये पांच कर्मेन्द्रियां, शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध आदि पांच इन्द्रियों के पांच विषय तथा अतीन्द्रिय (जो इन्द्रियों का विषय न हो) मन—ये १६ विकार हैं। महदादि सम्पूर्ण अव्यक्तों को क्षेत्र कहते हैं तथा शाश्वत एवं अचिन्त्य आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। इस (आत्मा) के निम्न लक्षण हैं-चेतना, अहंकार, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, सुख, दुःख इच्छा, द्वेष, स्मृति, धृति, बुद्धि आदि। इन लक्षणों के अभाव में व्यक्ति मृत होता है। (शरीर, इन्द्रिय, आत्मा, तथा सत्व (मन) के समुदाय को पुरुष कहते हैं। कुछ लोग आत्मा को पुरुष मानते हैं। ज्ञान का युगपत् अभाव तथा भाव मन का लक्षण है। उस (मन) के एकत्व तथा अणुत्व दो गुण माने जाते हैं। प्रयत्न तथा ज्ञान के युगपत् (साथ २) न होने से मन एक है, अनेक नहीं। मन के सहित ही इन्द्रियां अर्थ (विषय) के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। अर्थात् यदि किसी विषय में मन लगा हुआ नहीं है तो इन्द्रियां उस विषय के ग्रहण करने में कदापि समर्थ नहीं हो सकती। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पञ्चमहाभूत शरीर की उत्पत्ति के कारण कहे जाते हैं। शब्द आदि (शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध) पांच महाभूतों के गुण हैं। शब्द स्पर्श आदि गुणों की क्रमशः वृद्धि द्वारा विद्यमान पञ्चमहाभूत, दिशाएँ, आत्मा, मन तथा काल (ये नौ) द्रव्य कहलाते हैं। गुण द्रव्य पर आश्रित रहते हैं। आकाश का लिङ्ग (गुण)—अप्रतिषेध (अप्रतिघात किसी प्रकार की रुकावट का न होना), वायु का लक्षण गति, अग्नि का उष्णता, जल का द्रवत्व (Liquid) तथा पृथिवी का गुण स्थिरता होता है। मन सहित इन्द्रियों (६ इन्द्रियों) में से तीन विप्रकृष्ट (दूर) तथा तीन सन्निकृष्ट (समीप) कार्य के लिये हैं। इनमें मन, चक्षु तथा श्रोत्र विप्रकृष्ट तथा घ्राण, रसना और त्वचा सन्निकृष्ट कार्य वाली हैं। इन सबको स्पर्शन लक्षण कहते हैं। उदाहरण के लिये जिस प्रकार कोई मनुष्य चारों ओर से गवाक्षों (झरोखों) वाले महल में बैठा हुआ झरोखों के द्वारा भिन्न २ विषयों का ग्रहण करता है (देखता है) उसी प्रकार यह आत्मा शरीर में स्थित हुआ स्वस्थ इन्द्रियों के द्वारा मन के ....... (योग से भिन्न २ विषयों को ग्रहण करता है) अर्थात् जिस प्रकार मकान में बैठा हुआ मनुष्य केवल द्रष्टा होता है उसी प्रकार आत्मा भी वस्तुतः केवल द्रष्टा है। वह आंख के द्वारा रूप को देखता है, कान के द्वारा शब्द को सुनता है, नासिका के द्वारा सूंघता है, इत्यादि। मन अचेतन होता हुआ भी क्रिया वाला है तथा आत्मा चेतनायुक्त है। जब मन आत्मा के साथ संयुक्त होता है तभी क्रिया होती है अत एव आत्मा व्यपदेश से ही कर्ता कहलाता है। आत्मा के ज्ञान की प्रवृत्ति मन एवं ज्ञानेन्द्रिय आदि साधनों के योग से ही होती है। यदि आत्मा का मन के साथ योग न हो अथवा इन्द्रिय आदि करण निर्मल न हों तो विषय का ज्ञान नहीं हो सकता। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा भी है—आत्मा ज्ञः करणैर्योगान्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते। करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न प्रवर्तते॥

वक्तव्य—(i) इसमें सृष्टि उत्पत्ति का क्रम बताया गया है। अन्यत्र भी सृष्टि उत्पत्ति का यही क्रम मिलता है। सुश्रुत शा. अ. १ में कहा है—

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्यजगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्। तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव। तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लिङ्ग एवाहंकार उत्पद्यते। स च त्रिविधो वैकारिकस्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकादहंदारात् तैजससहाय्याञ्च तल्लक्षणान्येवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते। तद्यथा—श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति। तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयात्मकं मनः, भूतादेरपि तैजससहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषाः शब्द स्पर्शरूप रसगन्धाः; तेभ्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोर्व्यः, एवमेषा तत्वचतुर्विंशतिर्व्याख्याता। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही विश्व की सृष्टि होती है। सांख्यकारिका में इसका बड़ा सुन्दर एवं उत्प्रेक्षात्मक वर्णन किया गया है—पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः

अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९९

अध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९९

सर्गः ।। प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकात्पञ्चभ्यः पंचभूतानि। प्रकृति और पुरुष का संयोग ही सृष्टि का उत्पादक है क्योंकि प्रकृति जड़ है तथा पुरुष स्वभावतः निष्क्रिय है अतः ये पृथक् २ सृष्टि को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं है इसलिये दोनों का संयोग आवश्यक है। प्रकृति और पुरुष का यह संयोग अन्धे एवं लंगड़े के परस्पर संयोग के समान होता है। अन्धे में चलने की शक्ति है परन्तु उसे मार्ग नहीं दिखाई देता। इससे विपरीत लंगड़ा मार्ग देख सकता है परन्तु उसमें चलने का सामर्थ्य बिलकुल नहीं है। परन्तु पारस्परिक संयोग से अर्थात् लंगड़े व्यक्ति को यदि अन्धे के कन्धे पर बिठा दिया जाय तो कार्य सम्यक् प्रकार से सम्पन्न हो जाता है। उसी प्रकार प्रकृति एवं पुरुष का संयोग परस्पर सृष्टि उत्पत्तिरूप कार्य को करने में सफल होता है। पुरुष प्रकृति के संयोग का इच्छुक इसलिये बना रहता है कि वह उससे विवेक ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष की सिद्धि करता है। और प्रकृति पुरुष से इसलिये मिलना चाहती है क्योंकि पुरुष (भोक्ता) के अभाव में प्रकृति (भोग्या) की स्वरूप सिद्धि नहीं हो सकती। इस प्रकार दोनों का परस्पर संयोग कार्य में साधक होता है।

सांख्य सम्मत सृष्टिविकासक्रम निम्न प्रकार है—

                        पुरुष+प्रकृति
                          (अव्यक्त)
                             |
                      महत्तत्व (बुद्धितत्व)
                             |
                          अहंकार
           वैकारिक         तैजस         भूतादि
          (सात्विक)       (राजस)        (तामस)
             |           /      \          |
             |     सहायता से   सहायता से   |
             |     /                  \    |
             v   v                      v  v
        एकादश इन्द्रियां               पांच तन्मात्राएं
(५ ज्ञानेन्द्रियां+५ कर्मेन्द्रियां+१ मन)       |
                                          पञ्चमहाभूत

(ii) क्षेत्रज्ञ—क्षेत्र का वास्तविक शब्दार्थ खेत है। दर्शन शास्त्र में चतुर्विंशति तत्व समुदाय (८ प्रकृति+१६ विकार) अर्थात् शरीर को क्षेत्र कहते हैं तथा क्षेत्र के ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में कहा है—इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद् यो वेत्तितं प्राहु क्षेत्रज्ञमिति तद्विदः ॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ इसी प्रकार चरक शा. अ. १ में कहा है—तदेव भावादग्राह्यं नित्यत्वान्न कुतश्चन। भावाज्ज्ञेयं, तदव्यक्तमचिन्त्य व्यक्तमन्यथा ॥ अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः। तस्माद्यदन्यत्तद्व्यक्तं वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः। अतोऽन्यत् पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहंकारस्तथाष्टमः। भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा विकाराश्चैव षोडशः ॥ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति संज्ञिताः ॥ इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम्। अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ अव्यक्त को छोड़कर शेष मूलप्रकृति और विकार का नाम क्षेत्र है। तथा इस क्षेत्र

१०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अध्यायः ? ]

के ज्ञाता अव्यक्त आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। गीता में अव्यक्त शब्द सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों के साम्यरूप मूलप्रकृति के लिये आया है तथा चरक संहिता में अव्यक्त शब्द आत्मसंयुक्त मूलप्रकृति के लिये हैं। (iii) आत्मा के लिङ्ग चरक शा. अ. १ में निम्न दिये हैं—प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः। इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत्॥ देशान्तरगतिःस्वप्ने पञ्चत्वं ग्रहणं तथा। दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमनस्तथा॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः। बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः॥ वैशेषिक दर्शन में भी कहा है—प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवन-मनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि। (iv) मन का लक्षण—चरक शा. अ. १ में कहा है—लक्षणं मनसो ज्ञानस्य भावो भाव एव च। सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते॥ वैवृत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते॥ जब आत्मा द्वारा विषय के ग्रहण के लिये प्रवृत्त किया गया मन उस २ विषय के ग्रहण के लिये उस २ इन्द्रिय की ओर जाता है तब वह मनोयुक्त इन्द्रिय उस विषय को ग्रहण करता है। उसी समय दूसरी इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में मन प्रवृत्त नहीं होता, अतएव एक ही काल में एक ज्ञान का होना तथा दूसरे का न होना यही मन का लक्षण है। न्यायदर्शन में भी कहा है—युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्। एक काल में मन के द्वारा एक ही विषय का ज्ञान हो सकता है। यदि ऐसा न हो तो आत्मा के विभु एवं सर्वज्ञ होने से सदा सब इन्द्रियों के विषयों का एक साथ ही ज्ञान होता रहेगा। इसी के साथ आत्मा, इन्द्रिय और विषयों का संयोग होने पर भी मन का संबन्ध न हो तो ज्ञान नहीं होता और यदि उनके साथ मन का भी संबन्ध हो तो ज्ञान होता है। इसीलिये वैशेषिक में भी कहा है—‘‘आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावश्चाभावश्च मनसो लिङ्गम्’’। (v) मन के गुण एकत्व तथा अणुत्व है। चरक शा. अ. १ में भी कहा है—अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ। प्रत्येक शरीर में मन एक होता है तथा अणु होता है। यदि मन अनेक तथा महत्परिमाण वाला हो तो युगपत् अनेक ज्ञान होने चाहिये परन्तु ऐसा नहीं होता। इसीलिये चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—“न चानेकत्वं नाण्वेकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते” इत्यादि। इसी प्रकार वैशेषिक दर्शन में कहा है—“प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम्” (vi) गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि—आकाश आदि पांच महाभूतों में से प्रथम (आकाश) में केवल एक गुण (शब्द) होता है। इसके पश्चात् के भूतों में एक २ गुण बढ़ता जाता है। जैसे—वायु में शब्द और स्पर्श। अग्नि में शब्द स्पर्श और रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस। और पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध गुण रहते हैं। इसीलिये चरक शा. अ. १ में कहा है—तेषामेकगुणः पूर्वो गुणवृद्धिः परे परे। पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः॥ (vii) द्रव्य तथा उसका लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्। तद् द्रव्यं, ........। जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य, गुण, कर्म का समवायि कारण है उसे द्रव्य कहते हैं। इसी प्रकार वैशेषिक में कहा है—क्रियावद् गुणवत्समवायि कारणं द्रव्यम्। द्रव्यसंग्रह—खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः। ये ९ द्रव्य कहलाते हैं। (viii) गुण का लक्षण—चरक सू. अ. १ में कहा है—समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः। जो समवायी, निष्क्रिय तथा कारण हो उसे गुण कहते हैं। समवायी अर्थात् जो द्रव्य-गुणरूप समवाय का आधेय है। इससे ज्ञात होता है कि गुण द्रव्य के आश्रित रहते हैं। निश्चेष्ट से अभिप्राय कर्मशून्य का है अर्थात् गुण कर्म नहीं करते तथा गुण करण भी नहीं होते हैं। गुणसंग्रह—चरक सू. अ. १ में कहा है—सार्थाः गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः। गुणाः प्रोक्ताः .......॥ शब्द आदि ५ विषय, गुरु आदि २० गुण, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न तथा पर आदि १० गुण। ये ४१ गुण कहलाते हैं। इनमें शब्दादि ५ गुण वैशेषिक गुण कहलाते हैं क्योंकि ये आकाश आदि पांच महाभूतों के विशेष गुण हैं। गुरु आदि २० गुण सामान्य गुण कहलाते हैं क्योंकि ये पांचो महाभूतों में सामान्यरूप से रहते हैं। बुद्धि, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख तथा प्रयत्न—आत्मगुण कहलाते हैं। परत्व आदि १० गुण भी सामान्य गुण ही हैं इनके अतिरिक्त कोई २ आचार्य ५ इन्द्रियों के शब्द आदि ५ विषयों के साथ छटे मन के विषयचिन्त्य विचार्य आदि का भी समावेश करते हैं इस प्रकार उनके मत में गुणों की संख्या ४२ हो जाती है।

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०१

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः

....................................

वक्तव्य—यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। अध्याय के अन्त में समाप्तिसूचक वाक्य को देखकर ही अध्याय के इस नाम का संकेत मिलता है। अध्याय के नाम तथा प्रकरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसमें गर्भसम्बन्धी विवेचन किया गया होगा। गर्भाशय में गर्भ की मासिक वृद्धि (Intrauterine developement) का विषय इस अध्याय में दिया गया है। तृतीय मास से गर्भ की क्रमिक वृद्धि के विषय से ही यह खण्डित अध्याय प्रारम्भ होता है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इससे पूर्व के खण्डित भाग में गर्भधारण प्रक्रिया एवं गर्भधारण के बाद प्रथम तथा द्वितीय मास में होने वाली गर्भ की वृद्धि का विषय इसमें दिया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये चरक तथा सुश्रुत आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम उस विषय को यहां देने का प्रयत्न करेंगे। सबसे पूर्व अध्याय के नाम से यह स्पष्ट है कि परस्पर विवाह एवं मैथुन भिन्न गोत्र वालों का ही होना चाहिये। इससे सगोत्र विवाह का निषेध किया गया है। यद्यपि समान गोत्र वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर मैथुन से भी गर्भ स्थित हो जाता है परन्तु उसमें नाना प्रकार के रोग होते देखे जाते हैं। इसी लिये मनु महाराज ने भी सगोत्र विवाह को निषिद्ध ठहराया है—असपिण्डा च या मातुर सगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ।। इसीलिये चरक संहिता में भी शारीरस्थान का द्वितीय अध्याय इसी (अतुल्य गोत्रीय शारीर) नाम से दिया गया है। अब हम गर्भधारण प्रक्रिया का वर्णन करेंगे। जब पूर्ण युवा तथा अविकृत शुक्राणु वाला पुरुष पूर्ण युवती तथा मासिकस्राव से शुद्ध हुई स्त्री के साथ मैथुन करता है उस समय हर्ष से प्रेरित हुई शरीर की उत्कृष्ट धातु शुक्र रूप में प्रवृत्त होती है। शुक्र में स्थित शुक्राणु बाहर निकल कर स्त्री के योनिमार्ग द्वारा गर्भाशय में पहुंच कर आर्तव (Ovum) के साथ संयुक्त होता है तथा वहां गर्भ धारण कराता है। यह मैथुन ऋतुकाल में ही होना चाहिये। यह काल स्त्रियों में सामान्यतया आर्तव प्रवृत्ति से ज्ञात होता है। स्त्रियों में आर्तव प्रवृत्ति २८ दिन के बाद होती है। रजोदर्शन से लेकर पहले तीन दिन तक स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिये। इन दिनों में स्त्रियों को स्नान, श्रृंगार तथा अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक श्रम बिलकुल नहीं करना चाहिये। इसके बाद चतुर्थ दिन स्त्री को स्नान इत्यादि कर लेना चाहिये। स्नान करने के बाद वह शुद्ध कहलाती है। इस प्रकार रजोदर्शन के चौथे दिन से लेकर १२ दिन तक स्त्री तथा पुरुष को सन्तानोत्पत्ति के निमित्त मैथुन करना चाहिये। अन्तिम १६ वां दिन भी योनिसंकोच के कारण मैथुन के लिये त्याज्य है। चरक शारीर स्थान के द्वितीय अध्याय में विस्तार पूर्वक यथाविधि गर्भाधान का प्रकरण दिया हुआ है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह प्रकरण वहीं देखना चाहिये। इस गर्भ को पञ्चभूतों का विकार तथा चेतना (आत्मा) का आश्रय माना गया है। अर्थात् जब तक उसमें चेतना या आत्मा का संयोग न हो तब तक गर्भ की स्थापना नहीं होती। इसीलिये चरक में कहा है—‘शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति’। इस गर्भ का धीरे २ गर्भाशय में क्रमिक विकास होता जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—स सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि सम्मूर्च्छितः सर्वधातुकललीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः । पञ्चमहाभूतों के गुणों से युक्त हुआ वह आत्मा गर्भभाव को प्राप्त होकर प्रथम मास में सब धातुओं का उत्पादक होकर रूप में कफ के सदृश होता है। इस समय उसका शरीर अस्पष्ट होता है तथा उसके अवयव सत् भी होते हैं और असत् भी। अर्थात् प्रारम्भ में जब शुक्राणु तथा डिम्ब (Ovum) का संयोग होता है तब यह बीजरूप से गर्भाशय की आभ्यन्तरिक श्लैष्मिक कला में चिपक जाते हैं। इस अवस्था में इसके अङ्ग आदि बीजरूप में विद्यमान होने से सत् कहलाते हैं तथा रूप में अव्यक्त होने से असत् कहलाते हैं। यह बीज समयान्तर से बढ़ता जाता है तथा धीरे २ इसमें एक खोखली जगह हो

१०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | असमानगोत्रीयशरीराध्यायः ? ]

जाती है जिसमें लेसदार द्रव भर जाता है इसीलिये प्रथम मास में इसका रूप कफ के सदृश बताया है। इसी को प्रकट करने के लिये सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘तत्र प्रथमे मासि कललं जायते’। दूसरे मास में गर्भाशय की श्लैष्मिक कला मोटी होने लगती है तथा यह बीजरूप गर्भ को चारों ओर से घेर लेती है। इसके ऊपर दो आवरण बन जाते हैं। इसी समय गर्भ के चारों ओर गर्भोदक (Liguor Amnoc) एकत्र हो जाता है। इसके दबाव से गर्भावरण की दोनों झिल्लियां परस्पर मिल जाती हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—“द्वितीये मासि घनः सम्पद्यते-पिण्डः पेश्यर्बुदं वा, तत्र पिण्डः पुरुषः स्त्री पेशी आर्द्रं नपुंसकम्”। यदि वह घनाकार गर्भ पिण्डरूप हो तो पुरुष, यदि मांस पेशी की आकृति का ही तो स्त्री तथा अर्बुदाकृति हो तो नपुंसक गर्भ होता है।

अब हम मूल ग्रन्थोक्त विषय पर आते हैं क्योंकि इस अध्याय का प्रस्तुत विषय इस प्रकरण के बाद ही प्रारम्भ होता है।

प्राणस्तु बीजधातुं हि विभजत्यस्थिसंख्य(स्थ)या । प्रविष्टमात्रं बीजं हि रक्तेन परिवेष्ट्यते ।।
शुक्रादस्थ्यस्थितो मांसमुभाभ्यां स्नायवः स्मृताः । सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा ।।

जीवात्मा के प्राण बीजधातु (शुक्रधातु) को अस्थि संस्थान के अनुसार विभक्त करता है। शरीर में प्रविष्ट हुआ बीज रक्त के द्वारा परिवेष्टित हो जाता है। अर्थात् जब पुरुष के शुक्राणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट होते हैं तब उस शुक्राणु के चारों ओर स्त्री का आर्तव फैल जाता है। शुक्र से गर्भस्थ बालक के अस्थि एवं मांस बनते हैं तथा इन दोनों से अर्थात् अस्थि और मांस से स्नायुओं का निर्माण होता है। यह गर्भावस्था में गर्भस्थ बालक की प्रथम दो मास की आन्तरिक वृद्धि का वर्णन किया गया है॥

तृतीये मासि युगपन्निर्वर्तन्ते यथाक्रमम् । प्रस्पन्दते चेतयति वेदनाश्चावबुद्ध्यते ।।

तृतीय मास में गर्भ की सब इन्द्रियां तथा सब अवयव यथाक्रम युगपत् (एकसाथ) प्रकट हो जाते हैं। गर्भ स्पन्दन करने लगता है। वह चेतना तथा वेदना का भी अनुभव करने लगता है। इस मास में उसकी इन्द्रियां अत्यन्त सूक्ष्म होती हैं तथा मन में सुख दुःख का ज्ञान होने लगता है। चरक शा. अ. ४ में भी कहा है—तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिण्डका निर्वर्तन्तेऽङ्गप्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति। इस मास में गर्भ के अङ्ग अत्यन्त सूक्ष्म रूप में होते हैं। चरक में इसी मास में गर्भ के हृदय का विकसित होना सूचित किया गया है। वहां कहा है—“तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद् द्वैहृदयमाचक्षते वृद्धाः मातृजं चास्य हृदयं मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं भवति रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः सम्पद्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृदयस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति कर्तुं, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु, तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणोपचरन्ति कुशलाः”। इस मास में गर्भ स्पन्दन करने लगता है तथा उसी समय मन में सुख दुःख आदि का ज्ञान होने लगता है तथा वह पूर्वजन्म के अनुभूत विषयों की इच्छा करने लगता है। इस काल में गर्भिणी को जो भी इच्छा होती है उसे दौहृद (दोहद) कहते हैं क्योंकि यह इच्छा दो हृदयों से उत्पन्न होती है। इस दौहृद को अवश्य पूरा करना चाहिये क्योंकि वास्तव में इस समय गर्भगत शिशु की इच्छा के अनुकूल ही माता की इच्छा हुआ करती है। उसे यदि पूरा नहीं किया जाता है तो गर्भ में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। सुश्रुत ने इस दौहृद को चतुर्थ मास में माना है। वास्तव में गर्भ का स्पन्दन तीसरे मास में प्रारम्भ हो जाता है परन्तु गर्भोदक के कारण उस समय उन स्पन्दनों का कई बार गर्भिणी को ज्ञान नहीं हो पाता है। चतुर्थ या पञ्चम मास में जाकर अधिक स्पष्ट हो जाने पर वह इन स्पन्दनों को अनुभव करती है॥

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ? ]शारीरस्थानम्१०३

सूक्ष्मप्रव्यक्तकरणस्तृतीये तु मनोऽधिकः । चतुर्थे स्थिरतां याति गर्भः कुक्षौ निरामयः ।।

चतुर्थ मास में गर्भ गर्भाशय में स्थिर हो जाता है तथा उपद्रवों से रहित होता है। इस मास में गर्भिणी का शरीर भी अधिक भारी हो जाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—चतुर्थे मासि स्थिरतामापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्वमधिकमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भिणी को अपनी देह विशेष भारी मालूम पड़ने लगती है क्योंकि इस समय गर्भ की विशेष वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्तो भवति। गर्भहृदयप्रव्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिव्यक्तो भवति, कस्मात् तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति।

गुरुगात्रत्वमधिकं गर्भिण्यास्तत्र जायते । मांसशोणितवृद्धिस्तु पञ्चमे मासि जीवकं ! ।।

हे जीवक ! पांचवें मास में गर्भ के मांस और रक्त में विशेष वृद्धि होने लगती है। इसलिये इस समय गर्भिणी अत्यन्त कृश (दुर्बल) हो जाती है। अर्थात् इस मास में मांस और रक्त की अधिक वृद्धि के कारण गर्भ का स्पन्दन अधिक बढ़ जाने से अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—पञ्चमे मासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयः भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण परन्तु सुश्रुत में इससे विपरीत इस मास में मन का अधिक व्यक्त होना बताया है। वहां कहा है—पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति ॥

गर्भिणी पञ्चमे मासि तस्मात् कार्श्येन युज्यते । बलवर्णौजसां वृद्धिः षष्ठे मातुः श्रमोऽधिकः ।।

छठे मास में गर्भ में बल, वर्ण तथा ओज की वृद्धि होती है इसलिये माता (गर्भिणी) को अधिक श्रम (थकावट) हो जाती है। चरक शा.अ. ४ में कहा है—षष्ठेमासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण। इस मास में गर्भ के बल, वर्ण एवं ओज की अधिक वृद्धि होने से गर्भिणी दुर्बल हो जाती है तथा वर्ण भी पीला पड़ जाता है। सुश्रुत में इस मास में बुद्धि का आविर्भाव बताया है। शा.अ. ३ में कहा है—"षष्ठे बुद्धिः" ॥

सर्वधात्वङ्गसम्पूर्णो वातपित्तकफान्वितः । सप्तमे मासि तस्माच्च नित्यक्लान्ताऽत्र गर्भिणी ।।

सातवें मास में गर्भ सब धातुओं तथा अङ्गो से पूर्ण हो जाता है तथा वात पित्त और कफ से भी युक्त होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी सदा क्लान्ति (थकावट) अनुभव करती है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—सप्तमे मासि गर्भः सर्वभावैराप्यायते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वकारैः क्लान्ततमा भवति। परन्तु इस मास में सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः ॥

अष्टमे गर्भिणीगर्भावादादाते परस्परम् । ओजो र$^१$सवहायुक्तैः पूर्णत्वाच्छलयत्यपि ।।
तस्मात्तत्र मुहुर्ग्लानि मुहुर्हृष्टा च गर्भिणी । अत्ययं चाप्नुते तस्मान्न मासो गण्यतेऽष्टमः ।।

आठवें मास में गर्भ के पूर्ण होने से गर्भिणी तथा गर्भ, रसवाहा नाड़ियों के योग से ओज का परस्पर आदान प्रदान करते हैं तथा ओज के इधर उधर संचरण करने से गर्भ के विषय में सदा धोखा होता रहता है। अर्थात् ओज के बार २ विनिमय से मन में सदा सन्देह उत्पन्न होता रहता है कि गर्भ जीवित है या मृत हो चुका हैं। इसलिये इस मास में गर्भिणी कभी प्रसन्न होती है तथा कभी ग्लानियुक्त हो जाती है तथा उसे अन्य उपद्रव भी होते रहते हैं। इसलिये इस आठवें मास को प्रसव के लिये उचित काल नहीं माना है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अष्टमे मासि गर्भश्च मातृत्तो


१. रसवहानाडीयोगादित्यर्थः । गङ्गाधर प्रकाशितचरकपाठसंवादाद्यौचित्याच्च पूर्णत्वादिति पाठः साधुरेव । गर्भस्य पूर्णत्वमोजोग्रहणे हेतुः संभवति, ओजस इतस्ततःसंक्रमणेन गर्भश्छलयत्यपीत्यर्थः ।

१०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ]

गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिर्मुहुर्मुहुरोजः परस्परत आददाते गर्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदायुक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मात्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्; तं चैवमभिसमीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः । आठवें मास में गर्भ के अपूर्ण होने से (गंगाधर के अनुसार पूर्ण होने से—यही पाठ अधिक उचित प्रतीत होता है) माता से गर्भ तथा गर्भ से माता रसवाहिनियों द्वारा परस्पर ओज का ग्रहण करते हैं। अर्थात् इस समय ओज के अस्थिर होने से गर्भ का जन्म संकटमय समझा जाता है। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—अष्टमेऽस्थिराभवत्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेन्निरोजस्वान्नैर्ऋतभागत्वाच्च, ततो बलिं मांसौदनमस्यै दापयेत् ।। इस मास में उत्पन्न हुआ गर्भ या तो मृत ही होता है अथवा उसके पालन करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है ।।

नवमादिषु मासेषु जन्म चास्य यथाक्रमम् । पूर्वदेहकृतं कर्म गर्भावाससुखासुखम् ।।
जातः स्मरति तावच्च यावन्नोपैति जीविकाम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।


नवम इत्यादि मास में यथाक्रम इसका जन्म होता है । पूर्वजन्म में किये हुए कर्म, तथा गर्भावस्था के सुख और दुःख को उत्पन्न हुआ व्यक्ति तभी तक स्मरण रखता है जब तक कि वह नवीन जीवन को प्राप्त नहीं करता । अर्थात् नवजीवन प्राप्त करते ही मनुष्य पूर्वजन्म की सब बातों को भूलकर अपने जीवन की बिलकुल नवीनता प्रारंभ करता है ।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ४ में प्रसवकाल १२ मास तक माना गया है । कहा है—तस्मिन्नेकदिवसमतिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकालमित्याहुराद्वादशान्मासात्, एतावान्कालः, वैकारिकमतः परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य । सुश्रुत शा.अ. ३ में भी कहा है—नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन् जायते, अतोऽन्यथा विकारी भवति । गर्भ के गर्भाशय में रहने का साधारणतया समय २८० दिन माना गया है । इससे हम गर्भ की आनुमानिक तिथि जान सकते हैं । अर्थात् अन्तिम ऋतुकाल की प्रथम तिथि में २८० दिन जोड़कर प्रसव की तिथि निकाली जा सकती है । अथवा अन्तिम ऋतुस्त्राव के प्रथम दिन में ७ दिन जोड़ने से जो तिथि आये वही नवम मास में प्रसव की तिथि होगी । उदाहरण के लिये यदि किसी स्त्री को अन्तिम मासिक स्त्राव १ दिसम्बर को हुआ हो तो इसमें ७ दिन जोड़कर आगे ९ महीने गिनने से ७ सितम्बर आता है जो कि प्रसव की संभावित तिथि होनी चाहिये ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।


गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः

अथातो गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम गर्भाक्रान्ति शारीर का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।

वक्तव्य—इस अध्याय में यह वर्णन किया जायगा कि गर्भाशय में गर्भ कैसे उत्पन्न होता है अथवा गर्भ में जीव किस प्रकार अवक्रमण (प्रवेश) करता है । सुश्रुत शा.अ. ३ की टीका में डल्लन ने लिखा है—अत्र हि शुक्रशोणितं

गर्भक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०५

गर्भशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूर्च्छितं गर्भं इत्युच्यते, तस्मावक्रान्तिरूपगमनमवतरणमिति यावत् गर्भावक्रान्तिः, साऽस्मिन्नस्तीति ॥१-२॥

जीवस्तु खलु भो सर्वगतत्वादीश्वरगुणसमन्वितः पूर्वशरीराच्चावक्रामति परशरीरं चोपक्रामति युगपत्, न कदाचिदपि बीजशोणितवाव्वाकाशादिमनोबुद्धिभिर्वियुक्तपूर्वः, सर्वगतत्वाच्च न कस्यांचिद्योनौ नोपपद्यते स्वकर्मफलानुभवादिति ।।३।।

हे वत्स ! जीव सर्वगत होने से ईश्वर के गुणों से युक्त हुआ युगपत् पूर्व शरीर से अवक्रमण (छुटकारा) तथा पर (दूसरे-अगले) शरीर में उपक्रमण (प्रवेश) करता है। अर्थात् जीव एक शरीर को छोड़ता है तथा उसके साथ ही दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाता है। ये कार्य युगपत् ही होते हैं। बीज (शुक्र), शोणित (आर्तव), वायु, आकाश आदि पञ्चमहाभूत, मन तथा बुद्धि से कभी भी इसका वियोग नहीं होता। अर्थात् गर्भ में इन सबका संयोग होना आवश्यक है। यह जीव सर्वगत होने से जिस किसी योनि में नहीं चलाजाता अपितु अपने २ (पूर्वजन्मकृत) कर्मों के फलों के अनुसार ही भिन्न २ योनियों को प्राप्त करता है ॥३॥

गर्भस्य पुनर्भगवन् ! के शरीरावयवा आकाशाद्विर्वर्तन्ते, के वायोः, के तेजसः, केऽद्भ्यः, के पृथिव्याः, के चास्य मातृजः संभवतः संभवन्ति, के चास्य पितृतः, किमात्मनः, किंच सात्म्यतः, किंच रसतः, किंच सत्त्वतः, कुत्र चैते सर्वभावा अन्वायत्ता भवन्ति कं चार्थमवेक्षन्ते; इति पृष्टो भगवान् कश्यप उवाच-गर्भस्य खलु भो शब्दश्च श्रोत्रं च लाघवं च सौक्ष्म्यं च विवेकश्च मुखं च कण्ठश्च कोष्ठं चाकाशात्मकानि भवन्ति, स्पर्शश्च स्पर्शनं च रौक्ष्यं च प्रेरणं च धातुव्यूहनं च प्राणाश्चापानश्च शरीरचेष्टा च वाय्वात्मकानि भवन्ति, रूपं च चक्षुश्च प्रकाशश्च पित्तं च पक्तिश्चोष्मा च शरीरवृद्धिश्च तैजसानि भवन्ति, रसश्च रसनं च शैत्यं च मार्दवं च द्रवश्च स्नेहश्च क्लेदश्च श्लेष्मा च मेदश्च रक्तं च मांसं च शुक्नं चाप्यानि भवन्ति, गन्धश्च घ्राणं च गौरवं च स्थैर्यं च मूर्तिश्च पार्थिवानि भवन्ति; तस्मात् पुरुषो लोकसंमितः प्रोच्यते। लोहितं च मांसं च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषधारणं चामाशयश्चोत्तरगुदश्च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं चेति मातृजानि, केशाश्च रोमाणि च श्मश्रूणि च नखाश्च दन्ताश्चास्थीनि च सिराश्च स्नायवश्च धमन्यश्च शुक्नं चेति पितृजानि, आयुश्चात्मज्ञानं च मनश्चेन्द्रियाणि च प्राणापानौ च धारणं च प्रेरणं च चाकृतिश्च स्वरवर्णोपचयविशेषाश्च सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ च स्मृतिश्चाहङ्कारश्च प्रयत्नश्चावस्थान्तरगमनं च सत्त्वं च नानायोनिषूपपत्तिश्चेत्यात्मजानि, आरोग्यं चोत्थानं च सन्तोषश्चेन्द्रियप्रसादश्च स्वरवर्णबीजसंपच्च मेधा च प्रहर्षभूयिष्ठता चेति सात्म्यजानि, शरीराभिनिर्वृत्तिश्च शरीराभिवृद्धिश्च प्राणाश्च बन्धश्च वृत्तिश्च पुष्टिश्चोत्साहश्चेति रसजानि। कल्याणरोषमोहात्मकं तु सत्त्वं त्रिविधमुक्तमग्रे, तत्रौप¹पादि(दु)कं सत्त्वं मनश्च लयि(?) नित्यं शुभाशुभमिश्रभावानां ²स्पर्श इत्युच्यते। ते सर्वभावाः स्वकर्मण्यायत्ताः कालं चावेक्षन्ते। वायुर्हि कालसहितः शरीरं विभजति संदधाति चेति ।।४।।

भगवन् ! गर्भ के शरीर के कौन से अवयव आकाश से उत्पन्न होते हैं तथा कौन से वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, माता के बीज, पिता के बीज, सात्म्य, रस तथा सत्व से उत्पन्न होते हैं ? तथा ये सब भाव परस्पर कहां मिलते हैं तथा


१. आत्मनः शरीरान्तरसम्बन्धकारकमित्यर्थः।
२. स्पर्श इति वेदमित्यर्थः।

१०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ]

इनके परस्पर मिलने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया-आकाश तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-वत्स ! गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, सूक्ष्मता, विवेक, मुख, कण्ठ तथा कोष्ठ ये भाव आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायुतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-स्पर्श, त्वचा, रूक्षता, प्रेरणा (गति देना), धातुओं का परिवर्तन, प्राण, अपान तथा शरीर की चेष्टा (गतियां)-ये वायु से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। अग्नितत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रूप, चक्षु, प्रकाश, पित्त, पक्ति (पाचन), ऊष्मा (शरीर की गर्मी) तथा शरीर की वृद्धि-ये तैजस-अग्नि से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। जलतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रस, रसना (जिह्वा) शैत्य (शीतलता), मृदुता, द्रव, स्नेह, क्लेद (गीलापन) श्लेष्मा, मेद, रक्त, मांस तथा शुक्र-ये आप्य (जल से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। पृथिवी तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-गन्ध, घ्राण (नासिका), गुरुता, स्थिरता, तथा मूर्ति (आकृति-ढांचा) ये पार्थिव (पृथिवी से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। चरक शा. अ. ७ में इन महाभूतों से उत्पन्न होने वाले भावों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया है-तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद्गुरुरखरकठिनमङ्गं नखास्थिदन्तमांसचर्मवर्चः केशश्मश्रुनखलोमकण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च, यद्द्रवसरमन्दस्निग्धमृदुपिच्छिलं रसरुधिरवसाकफपित्तमूत्रस्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च, यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे तत्सर्वमाग्नेयं रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेषनिमेषाकुञ्चनप्रसारणगमनप्रेरणधारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्विविक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च, यत्प्रयोक्तृ तत्तत्प्रधानं, बुद्धिर्मनश्चेति। शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनावयवानां निर्दिष्टा। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १ में भी कहा है-आन्तरिक्षास्तु-शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्तता च। वायव्यास्तु-स्पर्शः, स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दनं लघुता च। तैजसास्तु-रूपं रूपेन्द्रिये वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिर्मर्षस्तैक्ष्ण्यं शौर्यं च। आप्यास्तु रसो रसेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्यं स्नेहो रेतश्च। पार्थिवास्तु-गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वभूतसमूहो गुरुता चेति। इसलिये यह पुरुष लोकसंमत (जगत के तुल्य) कहा जाता है। चरक शा.अ. ५ में भी कहा है-"पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवान्पुनर्वसुरात्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके"। षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्दं लभन्ते; तद्यथा-पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समुदिता 'पुरुषः' इति शब्दं लभन्ते। पुरुष इस महान् लोक का ही एक छोटा प्रतिरूप (Miniature) है। जितने भी मूर्तिमान् भाव इस लोक में हैं उतने ही पुरुष में हैं तथा जितने पुरुष में हैं उतने ही लोक में हैं। उदाहरण के लिये पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा अव्यक्त ब्रह्म-ये छः धातुएं मिलकर ही लोक कहाता है तथा इसीको पुरुष भी कहते हैं। चरक में आगे लोक एवं पुरुष की विभूतियों की विस्तृत तुलना की गई है-तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापो, वायुः प्राणो, वियच्छुषिराणि, ब्रह्मान्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिन्तर्रात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्वं, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदि त्यास्तु आदानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादो, वसवः सुखं, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवा सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं, यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, तथा द्वापरस्तथा स्थविर्यं, यथाकलिरवेमातुर्यं, यथायुगान्तथा मरणमिति, एवमनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश! सामान्यं विद्यात्। मातृज अर्थात् माता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव-रक्त, मांस, नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत् (Liver), प्लीहा (Spleen), वृक्क (Kidney-गुर्दे), बस्ति (मूत्राशय-Bladder), पुरीषधारण (पुरीष-मल का जहां धारण होता है-Sigmoid colon), आमाशय (Stomach), उत्तर गुदा (Rectum), अधरगुदा (Anus), क्षुद्रान्त्र (Small Intestines-छोटी आंते), स्थूलान्त्र (Large-intestines colon-बड़ी आंते)-ये मातृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में-त्वचा, वपा (मेद) तथा वपावहन (Adipose tissue) अधिक दिये हैं। कहा है-यानि चास्य मातृतः सम्भवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा-त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च यकृच्च प्लीहा

गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १०७

च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधानं चामाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—मांसशोणितमेदोमज्जहृन्नाभियकृत्प्लीहान्त्रगुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि। पितृज अर्थात् पिता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव—केश, रोम, दाढ़ी, मूंछ, नख, दांत, अस्थियां, शिरा, स्नायु धमनियां तथा शुक्र—ये पितृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी इन्हीं का परिगणन किया गया है—यानि चास्य पितृतः सम्भवतः संभवन्ति तान्तनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—केशश्मश्रुनखलोमदन्तास्थिसिरास्नायुधमन्यः शुक्रमिति पितृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘‘गर्भस्य केशश्मश्रुलोमास्थिनखदन्तसिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि’’। आत्मज (आत्मा से उत्पन्न होने वाले) भाव—आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रियां, प्राण, अपान, धारण (देह का धारण), प्रेरणा (गति), आकृति, स्वर तथा वर्ण का उपचय (वृद्धि), सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, स्मृति, अहंकार, प्रयत्न, अवस्थान्तर गगन (अन्य अवस्थाओं में जाना), सत्व तथा नाना योनियों में उत्पन्न होना—ये आत्मज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्यात्मजानि, यानि चास्यात्मतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा—तासु तासु योनिक्षूत्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणिः प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वरवर्णविशेषाः सुखदुःखेच्छाद्वेषौ चेतनाधृतिर्बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारः प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि। सुश्रुत शा.अ. ३ में कहा है—इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखदुःखादिक चात्मजानि। सात्म्यज अर्थात् सात्म्य के सेवन से उत्पन्न होनेवाले भाव—आरोग्य, उत्थान (उन्नति), सन्तोष, इन्द्रियों की प्रसन्नता, स्वर, वर्ण तथा बीज का उत्तम होना, मेधा (बुद्धि), हर्ष (प्रसन्नता अथवा मैथुन में हर्ष की अधिकता)—ये सात्म्यज भाव हैं। चरक शा.अ. ३ में कहा है—यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसम्पत्प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—वीर्यमारोग्यं बलवर्णौ मेधा च सात्म्यजानि। रसज अर्थात् रस के सेवन से उत्पन्न होने वाले भाव शरीर को उत्पन्न करना, शरीरं की वृद्धि, प्राण, बन्ध (बन्धन) वृत्ति (शरीर का यात्रा), पुष्टि तथा उत्साह—ये रसज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसततः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—शरीरस्याभिनिवृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि। सुश्रुत शा. अ ३ में भी कहा है—शरीरोपचयो बल वर्णः स्थितिर्हानिश्च रसजानि। कल्याण, रोष (क्रोध) तथा मोहात्मक—तीन प्रकार का सत्व पहले (लक्षणाध्याय में) कहा जा चुका है इनमें आत्मा अथवा जीव का शरीरान्तर के साथ संबन्ध कराने वाला सत्व शुभ अशुभ आदि मिश्रित भावों का सूचक (ज्ञान कराने वाला) है। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—अस्ति खल्वपि सत्वमौपपादुकं यज्जीवस्पृक् शरीरेण भिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यन्ते, बलं हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीनः प्राणाञ्जहाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहकं च मन इत्यभिधीयते, तत्रिविधमाख्यायते—शुद्धं राजसं तामसं चेति। येनास्य खलु मनो भूयिष्ठं तेन द्वितीयायामजातौ सम्प्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन सयुज्यते तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैवमनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर इत्युच्यते इति सत्वमुक्तम्। ये सब भाव अपने कर्मों के आश्रित हैं तथा काल की प्रतीक्षा करते हैं। काल सहित वायु शरीर का विभाजन करता है तथा इसे धारण करता है ॥४॥

तत्र श्लोकाः-

शोणिताद्धृदयं तस्य जायते हृदयाद्यकृत् ।। यकृतो जायते प्लीहा प्लीहः फुप्फुसमुच्यते ।।५।।
परस्परनिबन्धानि सर्वाण्येतानि भार्गव ! ।। तेषामधस्ताद्विपुलं स्रोतः कुण्डलसंस्थितम् ।।६।।
जरायुणा परिवीतं स गर्भाशय उच्यते ।। आमपक्वाशयौ तस्मिन्नन्नपानाश्रयौ गुदः ।।७।।
तस्मात् संजायते बस्तिः परिव्यन्दाच्च पूर्यते ।। धमनीमुखसंस्थाने स्रोतसी चाप्यधः स्मृते ।।८।।

१०८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

विण्मूत्रकृमिपक्वामकफपित्ताशयाः पृथक् ।। सन्त्येते देहिनां कोष्ठे स्त्रिया गर्भाशयोऽष्टमः ।। ९ ।।
शुक्रमज्जास्थि पितृतो मातृत्तो मांसशोणितम् ।। षट्कोशं प्रवदन्त्येके देह० ........ ।। १० ।।
....................... । ........................ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८१ तमं पत्रम्¹ ।)

गर्भ के शोणित (रक्त) से हृदय बनता है, हृदय से यकृत्, यकृत् से प्लीहा, तथा प्लीहा से फुफ्फुस (Lungs) बनते हैं। हे भार्गव (भृगुकुल में उत्पन्न जीवक) ! ये सब अङ्ग परस्पर संबद्ध होते हैं। इनके नीचे जरायु से युक्त तथा कुण्डलिनी चक्र में स्थित एक बड़ा स्रोत होता है जिसे गर्भाशय कहते हैं। (स्त्रीणां तु बस्तिपार्श्वगतो गर्भाशय इति सुश्रुतः)। इसमें आमाशय, पक्वाशय तथा अन्न एवं पान का आश्रय गुदा स्थित होती है। उससे बस्ति (श्रोणि गुहा—Pelvis cavity) बनती है जो स्राव से पूरित होती रहती है। इसके नीचे धमनीमुख संस्थान एवं स्त्रोतस् होते हैं। मनुष्यों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा पित्त के आशय (स्थान) पृथक् २ होते हैं। तथा स्त्रियों के कोष्ठ में इनके अतिरिक्त आठवां गर्भाशय भी होता है। पिता के अंश से गर्भ में शुक्र, मज्जा तथा अस्थियां बनती हैं और माता के अंश से मांस और शोणित बनते हैं। कुछ लोग देह में ६ कोश बताते हैं ........ ।।५-१०।।

**वक्तव्य—**यह अध्याय यहीं (मध्य में ही) समाप्त हो गया है। इसलिये विषय का पूर्ण ज्ञान होना कठिन है। उपलब्ध विषय से ही सन्तोष करना पड़ता है।


शरीरविचयशारीराध्यायः

· · · · · · · · · · · · · · · · · · ·
· · · · · · · · · · · · · · · · · · ·

(द्वात्रिंशत्त मता दन्तास्तावन्त्यू) खलिकानि च।
पाणिपादाङ्गुल्यास्थीनि षष्टिः स्युर्विंशतिर्नखाः।
पाणिपादशलाकास्तु विंशतिः परिकीर्तिताः।
पाणिपादशलाकानामधिष्ठानचतुष्टयम् ।
द्वे पाष्ण्यो॑रस्थिनी कूर्चाश्चत्वारः पादयोः स्मृताः।
द्वावेव हस्तमणिकौ चत्वार्याहुररत्निषु।
जान्वस्थिनी द्वे संख्याते चत्वार्यस्थीनि जङ्घयोः।
द्वावूरुनलकौ द्वे च ख्याते जानुकपालिके।
द्वावंसावंसफलकावपि द्वावेव चाक्षकौ।
द्वे बाहुनलके द्वे द्वे श्रोणितालूषके तथा।
एकं जत्रु भगास्थ्येकं ग्रीवा पञ्चदशास्थिकी।
भार्गवाऽस्थीनि पृष्ठ्यानि चत्वारिंशच्च पञ्च च।


१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके।

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०९

चतुर्दशास्थीन्युरसि हन्वस्थ्येकं तु निर्दिशेत् ।
शिरसस्तु कपालानि चत्वार्याहुर्मनीषिणः ।
चतुर्विंशतिः पार्श्वे च तावन्ति स्थालकानि च ।
चतुर्विंशतिरेवाहुः स्थालकार्बुदकानि च ।
द्वौ शङ्खौ परिसंख्यातौ द्वे हनुमूलबन्धने ।
ललाटनासिकागण्डकूटास्थ्येकं विनिदिशेत् ।
इत्यस्थिसंख्या सामान्याद् वृद्धिह्रासौ निमित्तजौ ।

वक्तव्य— यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में शरीर के विशेष ज्ञान का वर्णन किया गया है। 'शरीरविचय' शब्द की व्याख्या करते हुए चरक की टीका में चक्रपाणि ने कहा है—‘‘शरीरस्य विचयनं विचयः, शरीरस्य प्रविभागेन ज्ञानमित्यर्थः’’। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्व ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है। यहां सर्वप्रथम उन्हीं का पृथक २ परिगणन करते हैं। यह परिगणन स्थूल रूप में दिया गया है। यह संख्या पूर्णरूप से ठीक नहीं मिलती है। यह संख्या ३६३ होती है।

विवरणसंख्या
दांत३२
दांत के उलूखल (गड्ढे)३२
हाथ तथा पैर की अगुलियों की हड्डियां६०
नख२०
हाथ तथा पैर की शलाकास्थियां<br>(Metacarpus $ metatarsus bones)२०
उपर्युक्त शलाकास्थियों के अधिष्ठान
पाष्णि देश की अस्थियां
पैरों की कूर्चास्थियां
हाथ की मणिबन्ध देश की (मणकास्थि)
अरत्नि (प्रबाहु) की अस्थियां
जानु की अस्थियां
जङ्घाओं की अस्थियां
उस देश की नलकास्थियां
जानु कपालिका (Patella)
अंस
अंसफलक
अक्षकास्थि (Cotterbones)
बाहु की नलिकास्थियां
श्रोणि की अस्थियां
तालु की अस्थियां
जत्रुदेश में

११० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शारीरविचयशारीराध्यायः ? ]

भगास्थि १
ग्रीवा की अस्थियां १५
पीठ की अस्थियां ४५
छाती में उरोस्थियां १४
हन्वस्थि १
शिर की कपालास्थियां ४
पार्श्वास्थियां २४
पार्श्वास्थियों के स्थालक (Facets) २४
अर्बुदाकृति स्थालक २४
शङ्खदेश की अस्थियां २
हनुमूल को बांधने वाली अस्थियां २
ललाटास्थि १
नासिका में १
गण्डास्थि १
कूटास्थि १
कुल— ३६३

**वक्तव्य—**यहां पर पूर्व अस्थियों की संख्या ३६० बताई गई है परन्तु पृथक् २ गिनने पर वे ३६३ हो जाती हैं। चरक शा. अ. ७ में भी ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है परन्तु उन्हें भी पृथक् २ गिनने पर वे ३६८ होती हैं। जयदेव विद्यालंकार ने अपनी चरक की टीका में हाथ पैर की शलाकास्थियों के ४ अधिष्ठान (चत्वार्यधिष्ठानान्येषां) तथा हाथ और पैरों के ४ पृष्ठ (चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि) को नहीं गिना है। इस प्रकार ३६० संख्या पूरी की है। यहां भी यदि हम शलाकास्थियों के अधिष्ठानों को न गिनें तो संख्या कुछ अंश तक पूरी हो सकती है। चरकोक्त अस्थियां निम्न प्रकार से हैं—त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तोलूखलनखैः; तद्यथा—द्वांत्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, विंशतिः पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपाद पृष्ठानि, ष्ठ्यङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्योर्मणिकाः चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, बाह्वोः मांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुंसां मेढ्रास्थि, एकं त्रिकसं श्रितम् एकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायां, द्वे जत्रुणि, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्डयोर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशतिश्चतुर्विंशतिः पञ्जरास्थीनि च पार्श्विकानि, तावन्ति चैषां स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि द्विसप्ततिः द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिरःकपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति। इस प्रकार हमें प्रकृत ग्रन्थ तथा चरक की अस्थि गणना में निम्न अन्तर मिलता है—

चरककाश्यपसंहिता
पाणिपादपृष्ठानि×
कूर्चास्थियां
हाथों की मणिकास्थि
गुल्फास्थि×
कूर्परास्थि×
अंसफलक×

शरीरविचयशारीराध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् १११

बाहु×
मेढ्रास्थि×
त्रिकास्थि×
गुदास्थि×
पृष्ठास्थि३५४५
जत्रु अस्थि
ललाटास्थि
आंखों की अस्थियां×
गण्डास्थि
नासिकास्थि
छाती में१७१४
जानुकपालास्थि×
कूटास्थि×
योग८२७६

इनके अतिरिक्त अन्य सब अस्थियां परस्पर मिलती हैं। सुश्रुत ३६० अस्थियां स्वीकार नहीं करता। वह केवल ३०० अस्थियां मानता है। वह दांत के उलूखल तथा नखों को अस्थियों में नहीं गिनता। आजकल के शरीरशास्त्र के ज्ञाता शरीर में कुल २०६ अस्थियां मानते हैं। इस प्रकार काश्यपसंहिता, चरक तथा सुश्रुत सब में ही अस्थियों की संख्या बहुत अधिक दी हुई हैं तथा गिनने पर उनकी संख्या ठीक भी नहीं बैठती है तथा बहुत से स्थानों पर उनमें परस्पर समानता नहीं है। उन्होंने अस्थि शब्द से संभवतः शरीर के सभी कठिन पदार्थों का ग्रहण कर लिया है तभी इतना अधिक अन्तर हो गया प्रतीत होता है। आधुनिक विज्ञान एक पूर्ण युवा मनुष्य में निम्न अस्थियां मानता है—

बाहुओं में ३०×२=६०
सक्थियों में ३०×२=६०
शिर और ग्रीवा में=३६
मध्यदेह=५०
कुल२०६

इसका विशेष विवरण शरीर-शास्त्र की किसी पुस्तक में देखना चाहिये। यह साधारण रूप में अस्थियों की संख्या कही गई है। इसमें कारणवश वृद्धि अथवा ह्रास भी हो सकता है॥

दशैवायतनान्याहुः प्राणानां तानि मे शृणु।
मूर्धाऽथ हृदयं बस्तिः कण्ठौजः शुक्रशोणितम्।
शङ्खौ गुदं ततस्त्रीणि महामर्माणि चादितः।

प्राणों के दस आयतन कहे गये हैं। इन्हें तू मुझ से सुना, १. मूर्धा २. हृदय ३. बस्ति ४. कण्ठ ५. ओज ६. शुक्र ७. शोणित ८-९. दोनों शङ्ख प्रदेश (Temporal regious) १०. गुदा। चरक सू. अ. २९ में भी ये ही १० प्राणायतन गिनाये हैं—दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः। शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम्॥ परन्तु चरक शा. अ. ७ में शङ्खप्रदेशों के स्थान पर नाभि तथा मांस को गिना गया है—दश प्राणायतनानि तद्यथा—मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्तिः ओजः शुक्रं शोणितं मांसमिति। अष्टाङ्गसंग्रह शा. अ. ५ में मांस के स्थान पर जिह्वाबन्धन पढ़ा गया


३० का.सं.

११२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

है—दश प्राणायतनानि–मूर्धा जिह्वा बन्धनं कण्ठो हृदयं नाभिर्बस्तिर्गुदः शुक्रमोजो रक्तं च । तेषामाद्यानि सप्त पुनर्महामर्मसंज्ञानि । इनमें से प्रथम तीन महामर्म कहलाते हैं अर्थात् मूर्धा, हृदय और बस्ति को महामर्म कहते हैं । अष्टाङ्गसंग्रह में महामर्म ७ गिनाये हैं-१. मूर्धा २. जिह्वाबन्धन ३. कण्ठ ४. हृदय ५. नाभि ६. बस्ति ७. गुदा । इनका ऊपर प्राणायतनों में निर्देश किया गया है ॥

नाभिः प्लीहा यकृत् क्लोम हृद्वृक्कौ गुदबस्तयः ।
क्षुद्रान्त्रमथ च स्थूलमामपक्वाशयौ वपा ।
कोष्ठाङ्गानि वदन्ति ज्ञाः प्रत्यङ्गानि निबोध मे ।

कोष्ठ के अङ्ग—१. नाभि (Umblicus) २. प्लीहा (Spleen) ३. यकृत् (जिगर–Liver) ४. क्लोम ५. हृदय (Heart) ६. दोनों वृक्क (गुर्दे–Kidneys) ७. गुदा (Anus) ८. बस्ति (Bladder) ९. क्षुद्रान्त्र (Small Intestines) १०. स्थूलान्त्र (Large Intestines) (११). आमाशय (Stomach) १२. पक्वाशय १३. वपा (हृदय के चारों ओर की मेद–Fatty Tissues) चरक शा. अ. ७ में कोष्ठ के अंग १५ दिये हैं—पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि, तद्यथा—नाभिश्च हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च; बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्रं च, स्थूलान्त्रं च, वपावहनं चेति । इनमें एक पुरीषाधार को अधिक गिना है तथा गुदा के दो भाग उत्तरगुदा तथा अधरगुदा–करके पृथक् २ गिने हैं–इसलिये ये १५ होते हैं ॥१२॥

अक्षिणी नासिके कर्णौ स्तनावेष्ठौ कुकुन्दरौ ।
हस्तौ पादौ भ्रुवौ कूटौ बाहुजङ्घोरुपिण्डिकाः ।
सृक्किणी कर्णशष्कुल्यौ कर्णपुत्राक्षितारके ।
वृषणौ दन्तवेष्टौ च शङ्ककावुपजिह्विके ।
¹दन्तलोहाधिमूलानि द्वे द्वे सर्वाणि निर्दिशेत् ।
बस्तिर्बस्तिशिरः शेफः पृष्ठं सचिबुकोदरम् ।
ललाटमास्यं गोजिह्वा शिरो हृदयमेकशः ।
पाणिपादतलेष्वेव चत्वारि हृदयानि तु ।
शाखाहृदयसंज्ञानि पञ्चमं चेतनाश्रयम् ।
अक्षिबन्धानि चत्वारि विद्याद्विंशतिरङ्गुलीः ।

अब तू मुझसे प्रत्यङ्गों को सुन— २ आंखे+२ नासिका+२ कर्ण+२ स्तन+२ ओष्ठ+२ कुकुन्दर (जघनास्थियों के बाहर की ओर का निम्न भाग–Ischial tuberocities) +२ हाथ+२ पैर+२ भ्रू (भौहें)+२ कूट (अक्षिकूटक–जहां अक्षिगोलक रहते हैं) बाहु की पिण्डिकाएं +२ जङ्घा की पिण्डिकाएं +२ ऊरु देश की पिण्डिकाएं +२ सृक्किणी (होठों के किनारे) +२ कर्णशष्कुलियां–(बाहर से दीखने वाले कान–Pinna of ears) +२ कर्णपुत्रक (कर्णशष्कुली के सामने का उभार–Tragus) +२ अक्षितारक (आंख की पुतलियां–Pupils) +२ वृषण (अण्ड–Testicles) +२ दन्त वेष्ट (मसूड़े) +२ शङ्खदेश (Temporal regious) +२ उपजिह्विका (Tonsils) + २ स्फिक् (नितम्ब–चूतड़ Buttocks) +२ गण्ड (गाल) +२ वंक्षण (रानें–groius) +१ बस्ति (Bladder) +१ बस्तिशिर (नाभि के नीचे का प्रदेश) +१


१. 'स्फिचौ गण्डौ वंक्षणौ च' इति पाठश्चेत् साधु ।

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११३

शेफ (मूत्रेन्द्रिय) + १ पृष्ठ + १ चिबुक (ठोडी) + १ उदर (पेट) + १ ललाट + १ आस्य (मुख) + १ गोजिह्वा (जिह्वा के नीचे की छोटी जीभ) + १ शिर + ४ पाणितल तथा पादतल के हृदय¹ (इन्हें शाखाहृदय भी कहते हैं) + १ हृदय (चेतनाश्रय) + ४ अक्षिबन्धन + २० अंगुलियां = ८७ प्रत्यङ्ग होते हैं। चरक शा. अ. ७ में निम्न ५६ प्रत्यङ्ग गिनाये हैं— षट्पञ्चाशत्प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपनिबद्धानि यानि यान्यपरिसंख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति; तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरुपिण्डिके, द्वौ स्फिचौ, द्वौ वृषणौ, एकं शेफः, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्षम्, एकमुदरं, द्वौ स्तनौ, द्वौ श्लेष्मभुवौ, द्वे बाहुपिण्डिके, चिबुकमेकं द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्कण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि, द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि। सुश्रुत में निम्न प्रत्यङ्ग गिनाये हैं—मस्तकोदरपृष्ठनाभिललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः। कर्णनेत्रभ्रूशङ्खांसगण्डकक्षस्तनवृषण-पार्श्वस्फिग्जानुबाहूरुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्गुलयः, स्रोतांसि वक्ष्यमाणानि, एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः॥

स्रोतांसि द्विविधान्याहुः सूक्ष्माणि च महान्ति च।
महान्ति नव जानीयाद् द्वे चाधः सप्त चोपरि।
नाभिश्च रोमकूपाश्च सूक्ष्मस्रोतांसि निर्दिशेत्॥

स्रोत दो प्रकार के होते हैं। १. सूक्ष्म २. महान्। महास्रोत नौ होते हैं जिनमें दो नीचे (मूत्रेन्द्रिय अथवा जननेन्द्रिय और गुदा) तथा सात ऊपर शिर में (२ आंखें + २ नाक + २ कान + १ मुखविवर = ७)-ये कुल मिलाकर ९ होते हैं। चरक शा. अ. ७ में कहा है—नव महान्ति छिद्राणि सप्त शिरसि द्वे चाधः। नाभि तथा रोमकूप सूक्ष्म स्रोत समझे जाते हैं।

हृदयात् संप्रतायन्ते सिराणां दश मातरः।
ऊर्ध्वं चतस्रो द्वे तिर्यक्चतस्रोऽधोवहाः सिराः।
व्याप्नुवन्ति शरीरं ता भिद्यमानाः पुनः पुनः।
पर्णानामिव सीवन्यः सरणाच्च सिराः स्मृताः॥

हृदय प्रदेश से शिराओं की १० माताएं (मुख्य या मूल शिराएं-Mother roots) निकलती हैं जिनमें चार ऊपर की ओर, दो तिर्यक् (तिरछी) तथा चार अधोवहा शिरायें होती हैं। ये दस शिरायें ही पुनः २ विभक्त होती हुई सारे शरीर को व्याप्त कर लेती हैं। जिस प्रकार पत्तों में सीवनियां होती हैं उसी प्रकार सारे शरीर में सरण (गति) करने के कारण इन्हें ‘सिरा’ कहते हैं।

वक्तव्य— पूर्व शारीर स्थान के प्रथम अध्याय में शिराओं की संख्या ७०० बताई हैं। यहां ये १० बताई हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मूल में ये शिरायें १० ही होती हैं जो कि धीरे २ विभक्त होकर ७०० या इससे भी अधिक संख्या में होकर सारे शरीर में व्याप्त हो जाती हैं। सुश्रुत शा. अ. ७ में छोटी २ जलहारिणियों (नालियों) का उदाहरण देकर बताया है कि जिस प्रकार छोटी २ एवं कृत्रिम असंख्य नालियों द्वारा उद्यान में पानी दिया जाता है उसी प्रकार इन शिराओं से सारे शरीर का पोषण होता है। कहा है—सप्त सिराशतानि भवन्ति, याभिरिदं शरीरमाराम इव जलहारिणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्निह्यतेऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, द्रुमपत्रसेवनीनामिव च तासां प्रतानाः तासां नाभिर्मूलं,


१. इन्हें सुश्रुत ने तलहृदय नामक मर्म कहा है जो कि दोनों हाथों तथा पैरों के तले में होते हैं (मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेण मध्येपादतलस्य तलहृदयं नाम-सुश्रुत शा. अ. ६-२४)।

११४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

ततश्च प्रसरन्त्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च। तथा आगे फिर कहा है-व्याप्नुवन्त्यभितो देहं नाभितः प्रसृताः सिराः। प्रतानाः पद्मिनीकन्दाद्विसादीनां यथा जलम्॥

यथा काष्ठमयं रूपं तृणरज्जुवोपवेष्टितम्। भवेल्लिप्तं मृदा बाह्यं तथेदं देहसंज्ञकम्। अस्थीनि स्नायुबद्धानि स्नायवो मांसलेपनाः। सिराभिः पुष्यते नित्यं तस्य सर्वं त्वचा ततम्।

जिस प्रकार एक लकड़ी का बना हुआ मकान पहले तिनकों तथा रज्जु (रस्सियों) से बांधा जाता है तथा फिर ऊपर से मिट्टी द्वारा लीपा जाता है उसी प्रकार यह देह (शरीर) रूपी मकान है। इसमें सबसे पूर्व अस्थियां स्नायुओं (Ligaments) द्वारा बंधी हुई हैं। स्नायुओं के ऊपर मांस (Museles) चढ़ा हुआ है। शिराओं के द्वारा इसका निरन्तर पोषण होता है। तथा इसके ऊपर त्वचा (Skin) फैली हुई है॥

त....तः (संततं) कर्णमूलाभ्यां धमनीनां शतं शतम्। तासु नित्योऽनिलस्तिष्ठन्नग्नीषोमौ बिभर्त्यधि।।

प्रत्येक कर्णमूल से सौ-सौ धमनियां फैली हुई हैं। इनमें नित्य वायु रहता हुआ अग्नि तथा सोम को धारण करता है।

वक्तव्य—सुश्रुत शा.अ. ९ में ‘धमनी’ शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए टीका में डल्लण ने लिखा है— “धमानादनिलपूरणाद्धमन्यः” उसने भी धमनियों में वायु का होना स्वीकार किया है। वहीं टीका में उसने “शब्दरूपरसगन्धवहत्वादिकं धमनीनाम्” द्वारा धमनियों का कार्य शब्द आदि का वहन दिया है। इस प्रकार ये धमनियां वातवाही नाडियां प्रतीत होती हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान की भाषा में हम Nerves कह सकते हैं। आजकल व्यवहार में धमनी शब्द Artry (रक्तवाहिनी) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। वह यहां अभिप्रेत नहीं है॥

साग्रे शतसहस्रे द्वे बहिरन्तश्च कूपकाः। रोमकूपानि तावन्ति जातान्येकैकशो यदि।। वृद्धिह्रासौ निषेकाच्च स्वभावाद्विश्वकर्मणः। चतुर्भागविहीनानि स्त्रीणां विद्धि स्वभावतः।। कूपके कूपके चापि विद्यात् सूक्ष्मं सिरामुखम्। प्रस्विद्यमानस्तैः स्वेदं विमुञ्चति सिरामुखैः।। जातस्य वर्धमानस्य यूनो वृद्धस्य देहिनः। स्वेनाञ्जलिप्रमाणेण द्रवाणि प्रमिमीमहे।।

इसके आगे दो लाख बाह्य एवं आभ्यन्तरिक कूप (छिद्र) होते हैं। रोमकूप भी इतने ही होते हैं। इनमें जन्म से ही अथवा विश्वकर्मा के स्वभाव से वृद्धि एवं ह्रास हो सकता है। अर्थात् इस संख्या में यदि वृद्धि एवं ह्रास हो तो वह जन्म से एवं विश्व के बनाने वाले परमात्मा के स्वभाव से ही समझना चाहिये। स्त्रियों में यह संख्या स्वभाव से चतुर्थांश कम होती है। प्रत्येक रोमकूप में एक २ सूक्ष्म शिरा होती है। स्वेद (पसीना) आने पर उन शिराओं के द्वारा ही पसीना बाहर निकलता है। शरीर से पसीना आने के विषय में आधुनिक विज्ञान भी इसी सिद्धान्त को मानता है। हैलिबर्टन की फिजियोलोजी में कहा है—Sweating in accompanied by a dilatation of the blood-vessels of the region, presumably the result of the production of metabolic products. अब हम उत्पन्न हुए २ (सद्योजात), बढ़ने वाले, युवा तथा वृद्ध पुरुष के शारीरिक द्रवों का अपनी २ अञ्जलि के अनुसार प्रमाण बताते हैं॥

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११५

मज्जमेदोवसामूत्रपित्तश्लेष्माणि विट् तथा। एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्सप्ताञ्जलिकाः स्मृताः ।।
शोणिताञ्जलयोऽष्टौ तु नव पंक्तिरसस्य तु। दशैवाञ्जलयः प्रोक्ता उदकस्य त्वचाश्रयाः ।।
तेनोदकेन पुष्यन्ति धातवो लोहितादयः। अतीसारे पुरुषं च ततो मूत्रं प्रवर्तते ।।
व्रणे लसीका पूयं च पिच्छा चातः प्रवर्तते। भवन्ति तस्मिन् दुष्टे च दद्रुकण्डूविचर्चिकाः ।।
त्वगामयाः किलासानि पामा केशवधस्तथा। तदग्निमारुतोद्विद्धं (कू) पकैः स्वेद उच्यते¹ ।।
श्लेष्मणस्तु प्रमाणेन प्रमाणं तुल्यमोजसः। शुक्रस्यार्धाञ्जलिर्देहे मस्तिष्कस्य तथैव च ।।
एतत् प्रमाणमुद्दिष्टमुत्कृष्टं सर्वमेव तु। प्रज्ञाप्तपिशितीयस्य ततो मध्यं ततोऽधमम् ।।

मज्जा, मेद, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा तथा मल ये क्रमशः एक, दो, तीन, चार, पांच, छः तथा सात अञ्जलि होते हैं। शोणित (रक्त) की आठ अञ्जलियां तथा पक्तिरस (आहार के परिणत होने-पकने पर जो सबसे पूर्व धातु बनती है तथा जिसे 'रस' कहते हैं) की ९ अञ्जलियां होती हैं। त्वचा के आश्रित उदक (जल) की १० अञ्जलियां होती हैं। इसी उदक (जल) के द्वारा ही शरीर की रक्त आदि धातुओं का पोषण होता है। यही अतिसार में पुरीष के रूप में तथा मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलता है। यह जल व्रण में लसीका (Lymph), पूय (Pus) तथा पिच्छा (लेसदार द्रव्य) के रूप में निकलता है। इस उदक (जल) के दूषित हो जाने पर दद्रु, कण्डू (खुजली), विचर्चिका, किलास (श्वित्र-श्वेत कुष्ठ) तथा पामा (Eczema) आदि त्वग्रोग तथा केशवध (बालों का झड़ना) आदि होते हैं। यही उदक अग्नि एवं वायु के संयोग से जब रोमकूपों के द्वारा बाहर निकलता है तब स्वेद (Sweat) कहलाता है। श्लेष्मा (कफ) के प्रमाण के समान ही अर्थात् ६ अञ्जलि ओज का प्रमाण है। शरीर में शुक्र का प्रमाण आधी अञ्जलि है तथा मस्तिष्क का भी इतना ही (आधी अञ्जलि) है। यह प्रज्ञप्तिपिशित (पूर्व निर्दिष्ट) नामक शारीरिक संहनन वाले (कलियुगी) पुरुष के सम्पूर्ण शरीर के द्रवों का उत्कृष्ट (Maximum) प्रमाण कहा गया है। मध्य व्यक्तियों का मध्यम (Medium) तथा अधम व्यक्तियों का अधम (Minimum) प्रमाण भी होता है। चरक शा. अ. ७ में भी शारीरिक द्रव्यों का इसी प्रकार अञ्जलि प्रमाण दिया गया है—यत्त्वञ्जलिसंख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्परं प्रमाणमभिक्षेय, तच्च वृद्धिह्रासयोगि, तर्क्यमेव; तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेनाञ्जलिप्रमाणे यत्तत् प्रच्यवमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून्, यत्तत् सर्वशरीरचर बाह्या त्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्धं लोमकूपेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणं, नवाञ्जलयः पूर्वस्याहारपरिणामधातोर्र्यं तं रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणितस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एकः मज्जः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य तावदेव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ।।

शुक्रं तु षोडशे वर्षे सम्पूर्णं संप्रवर्तते । अन्योन्यसंश्रयाण्याहुरन्योन्यगुणवन्ति च ।।
महाभूतानि दृश्यानि दार्वग्नितिलतैलवत् ।

सोलहवें वर्ष में पुरुष में शुक्र सम्पूर्ण (पूर्ण परिपक्व) रूप से प्रवृत्त होने लगता है। जिस प्रकार लकड़ी में अग्नि तथा तिलों में तेल होता है उसी प्रकार ये पञ्चमहाभूत भी परस्पर एक दूसरे के आश्रित तथा एक दूसरे के गुणों वाले होते हैं ।।


१. 'यच्चोष्मणाऽनुबद्धं रोमकूपेभ्यो निष्पतत् स्वेदशब्दमवाप्नोति' इति चरकः (शा.अ. ७) ।

११६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

शरीरसंख्या निर्दिष्टा यथास्थूलं प्रकारतः ।।
देहावयवसूक्ष्मं तु भेदानन्त्यं सुदुर्वचम् ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


यह स्थूल (मोटे) रूप से शरीर के अवयव इत्यादिकों की संख्या का निर्देश किया है। देह के सूक्ष्म अवयवों के भेद तो अनन्त हैं इसलिये उनका परिगणन करना हो तो अत्यन्त कठिन है ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


जातिसूत्रीयशारीराध्यायः

अथातो जातिसूत्रीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम जातिसूत्रीयं शारीर का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में जन्मशास्त्र या उत्पत्तिशास्त्र की व्याख्या की जायेगी ।।१-२।।

जातौ जातौ खलु स्वभाव एवाकृतिभेदनिर्वर्तयिता भवति । स्वभावतो ह्यस्य वायुपरमाणवः संयोगविभागचेष्टाधिकारा आकुञ्चनप्रसारणकोष्ठाङ्गप्रत्यङ्गधातुचेतनाश्रोतांसि विभजान्त । समत्यके¹ धातुरिव निषिक्तः पुरुषः पुरुषमभिनिर्वर्तयति, गौर्गमिक्ष्वाऽश्वमेवमादि । नृणामपि तु मध्ये गर्भनिर्वृत्तिः । तत्र द्वयोदम्पत्योः स्वभावात् स्वकर्मपरिणामाद्वा प्रजाभिवृद्धिर्भवति, तौ धन्यौ; अतोऽन्यथा भिषजितव्यो । स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनैः क्रमश उपचरेन्मधुरौषधसिद्धाभ्यां क्षीरघृतपुष्टं पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमांसा (माषा) भ्यामित्येके; सात्म्यैरेवेति प्रजापतिः ।। ३ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८४ तमं पत्रम् ।)

प्रत्येक जाति में स्वभाव से ही आकृति भेद होता है। संयोग, विभाग तथा चेष्टा को करने वाले वायु के परमाणु स्वभाव से ही इसके आकुञ्चन (सिकुड़ना), प्रसारण (फैलना), कोष्ठ के अङ्ग, प्रत्यङ्ग, धातु, चेतना तथा स्रोतों का विभाजन करते हैं। जिस प्रकार सांचों में ढला हुआ पुरुष-पुरुष को उत्पन्न करता है और गौ-गौ को तथा घोड़ा-घोड़े को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में भी गर्भ की निर्वृत्ति होती है। पति और पत्नी दोनों के स्वभाव से अथवा अपने कर्मों के परिणाम से यदि सन्तान उत्पन्न होती है तो वे (पति तथा पत्नी) धन्य (प्रशस्त) हैं। यदि इसके विपरीत हैं अर्थात् किसी कारण से सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है तो उनकी चिकित्सा करनी चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन,


¹ १. तद्यथा-कनकरजतताम्रत्रपुसीसकान्यवसिच्यमानानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टबिम्बेषु (मधूच्छिष्टविग्रहेषु) तानि यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते' इति चरकः (शा. अ. ३)

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]शारीरस्थानम्११७

आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा क्रमशः शुद्ध करके दूध तथा घृत से पुष्ट हुए २ पुरुष को मधुर ओषधियों से सिद्ध घृत का तथा स्त्री को तैल और मांस (माष पाठ होने पर उड़द अर्थ होगा) का सेवन करायें-ऐसा कुछ लोग कहते हैं परन्तु प्रजापति कश्यप के मत में जिसे जो सात्म्य हो उसे उसी का सेवन करायें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—अथाप्येतौ स्त्रीपुरुषौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्, उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्या पुरुषं, स्त्रिय तु तैलमाषाभ्याम्। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—विशेषतस्तु धृतक्षीरवद्भिर्मधुरौषधसंस्कारैः पुरुषं, तैलेन नारीं पित्तलैश्च मांसैः शुक्र एवं रज को शुद्ध करने तथा उनको पूर्ण करने के लिये यह निधान दिया गया है ॥३॥

यथा च पुष्पमध्ये फलमनिर्वृत्तं सुसूक्ष्ममस्ति न चोपलभ्यते, यथा चाग्निदारुषु सर्वगतः प्रयत्नाभावान्नोपलभ्यते, तथा स्त्रीपुंसयोः शोणितशुक्रे कालावक्षे स्वकर्मावक्षे च भवतः । षाडशवर्षयोर्हि शोणित१शुक्रयोर्मध्ये प्रभवतः; अर्वागपि यदाहारविशेषादारोग्याच्च पूर्णे भवत इति परिषत् ।।४।।

जिस प्रकार पुष्प में फल सूक्ष्म तथा अनुत्पन्न (Latent) या अदृश्य अवस्था में होने से उपलब्ध नहीं होता अथवा जिस प्रकार लकड़ियों में सब जगह अग्नि होने पर भी प्रयत्न के बिना प्राप्त नहीं होती है उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष में क्रमशः शोणित (आर्तव) तथा शुक्र (वीर्य) काल तथा अपने कर्मों की अपेक्षा रखते हैं अर्थात् उचित समय पर प्रकट होते हैं। स्त्री एव पुरुष के १६ वर्ष के होने पर शोणित तथा शुक्र कार्य करने में समर्थ होते हैं अथवा पूर्ण होते हैं। १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व भी आहार की विशेषता तथा आरोग्य के कारण शोणित और शुक्र पूर्ण हो सकते हैं। अर्थात् साधारणतया १६ वर्ष की अवस्था में शुक्र एवं शोणित पूर्ण परिपक्व होता है परन्तु यदि पौष्टिक आहार मिले तथा स्वास्थ्य उत्तम हो तो इससे पूर्व भी शुक्र एवं शोणित पूर्ण हो सकते हैं।

वक्तव्य—सुश्रुत में पुरुष के २५ वर्ष तथा स्त्री के १६ वर्ष का होने पर ही मैथुन का विधान दिया गया है। शोणित एवं शुक्र की उपस्थिति इससे पूर्व भी होती है परन्तु वे पूर्ण अवस्था में नहीं होते हैं। शारीर स्थान के दशवें अध्याय में कहा है—ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ।। जातो वा न चिरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।। इस अवस्था में जो गर्भ की स्थिति होगी वह या तो गर्भाशय में ही मृत हो जाता है अथवा उत्पन्न होने के बाद मृत हो जायगा या अत्यन्त ही दुर्बल सन्तान उत्पन्न होगी। स्त्री में १६-२० वर्ष तक की अवस्था में सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक होती है। उससे पूर्व अपक्वावस्था होती है तथा उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। इसी प्रकार पुरुष में २० वर्ष की अवस्था से लकर प्रायः ३०-३५ वर्ष की अवस्था तक सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक विद्यमान होती है। उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। यह सामान्य नियम है। इसके अपवाद भी हो सकते हैं तथा वाजीकरण ओषधियों के द्वारा इस शक्ति को बहुत बड़ी अवस्था तक भी स्थिर रखा जा सकता है ॥४॥

रजस्वलायाश्चेत् प्रथमेऽहनि गर्भ आपद्येत तं वातगर्भमाचक्षते विफलं वातपुष्पमिवोद्भिदानां; द्वितीयेऽहनि चेत् स्रंसते च्यवते वा; तृतीयेऽहनि सूतिकासने म्रियते, न वा दीर्घायुर्भवति, हीनाङ्गश्च जायते; अतऊर्ध्वमृतुर्द्वादशाहं ब्राह्मणीनाम्, एकादशाहं क्षत्रियाणां, दशाहं वैश्यानां, नवरात्रमितरासाम् । ऋतुर्बीजकालमवेक्षत इत्याहुर्महर्षयः । अत ऊर्ध्वमकालजमाहुः । अकालजं हीनं दुर्बलमस्थिरमदृढ़मपीनभङ्गुरं धान्यमिव भवति ।।५।।


१. 'शोताणुशुक्रे पूर्णे भवतः' इति पाठश्चेत् साधु ।