भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

११४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

ततश्च प्रसरन्त्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च। तथा आगे फिर कहा है-व्याप्नुवन्त्यभितो देहं नाभितः प्रसृताः सिराः। प्रतानाः पद्मिनीकन्दाद्विसादीनां यथा जलम्॥

यथा काष्ठमयं रूपं तृणरज्जुवोपवेष्टितम्। भवेल्लिप्तं मृदा बाह्यं तथेदं देहसंज्ञकम्। अस्थीनि स्नायुबद्धानि स्नायवो मांसलेपनाः। सिराभिः पुष्यते नित्यं तस्य सर्वं त्वचा ततम्।

जिस प्रकार एक लकड़ी का बना हुआ मकान पहले तिनकों तथा रज्जु (रस्सियों) से बांधा जाता है तथा फिर ऊपर से मिट्टी द्वारा लीपा जाता है उसी प्रकार यह देह (शरीर) रूपी मकान है। इसमें सबसे पूर्व अस्थियां स्नायुओं (Ligaments) द्वारा बंधी हुई हैं। स्नायुओं के ऊपर मांस (Museles) चढ़ा हुआ है। शिराओं के द्वारा इसका निरन्तर पोषण होता है। तथा इसके ऊपर त्वचा (Skin) फैली हुई है॥

त....तः (संततं) कर्णमूलाभ्यां धमनीनां शतं शतम्। तासु नित्योऽनिलस्तिष्ठन्नग्नीषोमौ बिभर्त्यधि।।

प्रत्येक कर्णमूल से सौ-सौ धमनियां फैली हुई हैं। इनमें नित्य वायु रहता हुआ अग्नि तथा सोम को धारण करता है।

वक्तव्य—सुश्रुत शा.अ. ९ में ‘धमनी’ शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए टीका में डल्लण ने लिखा है— “धमानादनिलपूरणाद्धमन्यः” उसने भी धमनियों में वायु का होना स्वीकार किया है। वहीं टीका में उसने “शब्दरूपरसगन्धवहत्वादिकं धमनीनाम्” द्वारा धमनियों का कार्य शब्द आदि का वहन दिया है। इस प्रकार ये धमनियां वातवाही नाडियां प्रतीत होती हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान की भाषा में हम Nerves कह सकते हैं। आजकल व्यवहार में धमनी शब्द Artry (रक्तवाहिनी) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। वह यहां अभिप्रेत नहीं है॥

साग्रे शतसहस्रे द्वे बहिरन्तश्च कूपकाः। रोमकूपानि तावन्ति जातान्येकैकशो यदि।। वृद्धिह्रासौ निषेकाच्च स्वभावाद्विश्वकर्मणः। चतुर्भागविहीनानि स्त्रीणां विद्धि स्वभावतः।। कूपके कूपके चापि विद्यात् सूक्ष्मं सिरामुखम्। प्रस्विद्यमानस्तैः स्वेदं विमुञ्चति सिरामुखैः।। जातस्य वर्धमानस्य यूनो वृद्धस्य देहिनः। स्वेनाञ्जलिप्रमाणेण द्रवाणि प्रमिमीमहे।।

इसके आगे दो लाख बाह्य एवं आभ्यन्तरिक कूप (छिद्र) होते हैं। रोमकूप भी इतने ही होते हैं। इनमें जन्म से ही अथवा विश्वकर्मा के स्वभाव से वृद्धि एवं ह्रास हो सकता है। अर्थात् इस संख्या में यदि वृद्धि एवं ह्रास हो तो वह जन्म से एवं विश्व के बनाने वाले परमात्मा के स्वभाव से ही समझना चाहिये। स्त्रियों में यह संख्या स्वभाव से चतुर्थांश कम होती है। प्रत्येक रोमकूप में एक २ सूक्ष्म शिरा होती है। स्वेद (पसीना) आने पर उन शिराओं के द्वारा ही पसीना बाहर निकलता है। शरीर से पसीना आने के विषय में आधुनिक विज्ञान भी इसी सिद्धान्त को मानता है। हैलिबर्टन की फिजियोलोजी में कहा है—Sweating in accompanied by a dilatation of the blood-vessels of the region, presumably the result of the production of metabolic products. अब हम उत्पन्न हुए २ (सद्योजात), बढ़ने वाले, युवा तथा वृद्ध पुरुष के शारीरिक द्रवों का अपनी २ अञ्जलि के अनुसार प्रमाण बताते हैं॥