काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११५
मज्जमेदोवसामूत्रपित्तश्लेष्माणि विट् तथा। एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्सप्ताञ्जलिकाः स्मृताः ।।
शोणिताञ्जलयोऽष्टौ तु नव पंक्तिरसस्य तु। दशैवाञ्जलयः प्रोक्ता उदकस्य त्वचाश्रयाः ।।
तेनोदकेन पुष्यन्ति धातवो लोहितादयः। अतीसारे पुरुषं च ततो मूत्रं प्रवर्तते ।।
व्रणे लसीका पूयं च पिच्छा चातः प्रवर्तते। भवन्ति तस्मिन् दुष्टे च दद्रुकण्डूविचर्चिकाः ।।
त्वगामयाः किलासानि पामा केशवधस्तथा। तदग्निमारुतोद्विद्धं (कू) पकैः स्वेद उच्यते¹ ।।
श्लेष्मणस्तु प्रमाणेन प्रमाणं तुल्यमोजसः। शुक्रस्यार्धाञ्जलिर्देहे मस्तिष्कस्य तथैव च ।।
एतत् प्रमाणमुद्दिष्टमुत्कृष्टं सर्वमेव तु। प्रज्ञाप्तपिशितीयस्य ततो मध्यं ततोऽधमम् ।।
मज्जा, मेद, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा तथा मल ये क्रमशः एक, दो, तीन, चार, पांच, छः तथा सात अञ्जलि होते हैं। शोणित (रक्त) की आठ अञ्जलियां तथा पक्तिरस (आहार के परिणत होने-पकने पर जो सबसे पूर्व धातु बनती है तथा जिसे 'रस' कहते हैं) की ९ अञ्जलियां होती हैं। त्वचा के आश्रित उदक (जल) की १० अञ्जलियां होती हैं। इसी उदक (जल) के द्वारा ही शरीर की रक्त आदि धातुओं का पोषण होता है। यही अतिसार में पुरीष के रूप में तथा मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलता है। यह जल व्रण में लसीका (Lymph), पूय (Pus) तथा पिच्छा (लेसदार द्रव्य) के रूप में निकलता है। इस उदक (जल) के दूषित हो जाने पर दद्रु, कण्डू (खुजली), विचर्चिका, किलास (श्वित्र-श्वेत कुष्ठ) तथा पामा (Eczema) आदि त्वग्रोग तथा केशवध (बालों का झड़ना) आदि होते हैं। यही उदक अग्नि एवं वायु के संयोग से जब रोमकूपों के द्वारा बाहर निकलता है तब स्वेद (Sweat) कहलाता है। श्लेष्मा (कफ) के प्रमाण के समान ही अर्थात् ६ अञ्जलि ओज का प्रमाण है। शरीर में शुक्र का प्रमाण आधी अञ्जलि है तथा मस्तिष्क का भी इतना ही (आधी अञ्जलि) है। यह प्रज्ञप्तिपिशित (पूर्व निर्दिष्ट) नामक शारीरिक संहनन वाले (कलियुगी) पुरुष के सम्पूर्ण शरीर के द्रवों का उत्कृष्ट (Maximum) प्रमाण कहा गया है। मध्य व्यक्तियों का मध्यम (Medium) तथा अधम व्यक्तियों का अधम (Minimum) प्रमाण भी होता है। चरक शा. अ. ७ में भी शारीरिक द्रव्यों का इसी प्रकार अञ्जलि प्रमाण दिया गया है—यत्त्वञ्जलिसंख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्परं प्रमाणमभिक्षेय, तच्च वृद्धिह्रासयोगि, तर्क्यमेव; तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेनाञ्जलिप्रमाणे यत्तत् प्रच्यवमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून्, यत्तत् सर्वशरीरचर बाह्या त्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्धं लोमकूपेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणं, नवाञ्जलयः पूर्वस्याहारपरिणामधातोर्र्यं तं रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणितस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एकः मज्जः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य तावदेव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ।।
शुक्रं तु षोडशे वर्षे सम्पूर्णं संप्रवर्तते । अन्योन्यसंश्रयाण्याहुरन्योन्यगुणवन्ति च ।।
महाभूतानि दृश्यानि दार्वग्नितिलतैलवत् ।
सोलहवें वर्ष में पुरुष में शुक्र सम्पूर्ण (पूर्ण परिपक्व) रूप से प्रवृत्त होने लगता है। जिस प्रकार लकड़ी में अग्नि तथा तिलों में तेल होता है उसी प्रकार ये पञ्चमहाभूत भी परस्पर एक दूसरे के आश्रित तथा एक दूसरे के गुणों वाले होते हैं ।।
१. 'यच्चोष्मणाऽनुबद्धं रोमकूपेभ्यो निष्पतत् स्वेदशब्दमवाप्नोति' इति चरकः (शा.अ. ७) ।