भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 474
११६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

शरीरसंख्या निर्दिष्टा यथास्थूलं प्रकारतः ।।
देहावयवसूक्ष्मं तु भेदानन्त्यं सुदुर्वचम् ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


यह स्थूल (मोटे) रूप से शरीर के अवयव इत्यादिकों की संख्या का निर्देश किया है। देह के सूक्ष्म अवयवों के भेद तो अनन्त हैं इसलिये उनका परिगणन करना हो तो अत्यन्त कठिन है ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


जातिसूत्रीयशारीराध्यायः

अथातो जातिसूत्रीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम जातिसूत्रीयं शारीर का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में जन्मशास्त्र या उत्पत्तिशास्त्र की व्याख्या की जायेगी ।।१-२।।

जातौ जातौ खलु स्वभाव एवाकृतिभेदनिर्वर्तयिता भवति । स्वभावतो ह्यस्य वायुपरमाणवः संयोगविभागचेष्टाधिकारा आकुञ्चनप्रसारणकोष्ठाङ्गप्रत्यङ्गधातुचेतनाश्रोतांसि विभजान्त । समत्यके¹ धातुरिव निषिक्तः पुरुषः पुरुषमभिनिर्वर्तयति, गौर्गमिक्ष्वाऽश्वमेवमादि । नृणामपि तु मध्ये गर्भनिर्वृत्तिः । तत्र द्वयोदम्पत्योः स्वभावात् स्वकर्मपरिणामाद्वा प्रजाभिवृद्धिर्भवति, तौ धन्यौ; अतोऽन्यथा भिषजितव्यो । स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनैः क्रमश उपचरेन्मधुरौषधसिद्धाभ्यां क्षीरघृतपुष्टं पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमांसा (माषा) भ्यामित्येके; सात्म्यैरेवेति प्रजापतिः ।। ३ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८४ तमं पत्रम् ।)

प्रत्येक जाति में स्वभाव से ही आकृति भेद होता है। संयोग, विभाग तथा चेष्टा को करने वाले वायु के परमाणु स्वभाव से ही इसके आकुञ्चन (सिकुड़ना), प्रसारण (फैलना), कोष्ठ के अङ्ग, प्रत्यङ्ग, धातु, चेतना तथा स्रोतों का विभाजन करते हैं। जिस प्रकार सांचों में ढला हुआ पुरुष-पुरुष को उत्पन्न करता है और गौ-गौ को तथा घोड़ा-घोड़े को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में भी गर्भ की निर्वृत्ति होती है। पति और पत्नी दोनों के स्वभाव से अथवा अपने कर्मों के परिणाम से यदि सन्तान उत्पन्न होती है तो वे (पति तथा पत्नी) धन्य (प्रशस्त) हैं। यदि इसके विपरीत हैं अर्थात् किसी कारण से सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है तो उनकी चिकित्सा करनी चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन,


¹ १. तद्यथा-कनकरजतताम्रत्रपुसीसकान्यवसिच्यमानानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टबिम्बेषु (मधूच्छिष्टविग्रहेषु) तानि यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते' इति चरकः (शा. अ. ३)