काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | ११७ |
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आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा क्रमशः शुद्ध करके दूध तथा घृत से पुष्ट हुए २ पुरुष को मधुर ओषधियों से सिद्ध घृत का तथा स्त्री को तैल और मांस (माष पाठ होने पर उड़द अर्थ होगा) का सेवन करायें-ऐसा कुछ लोग कहते हैं परन्तु प्रजापति कश्यप के मत में जिसे जो सात्म्य हो उसे उसी का सेवन करायें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—अथाप्येतौ स्त्रीपुरुषौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्, उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्या पुरुषं, स्त्रिय तु तैलमाषाभ्याम्। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—विशेषतस्तु धृतक्षीरवद्भिर्मधुरौषधसंस्कारैः पुरुषं, तैलेन नारीं पित्तलैश्च मांसैः शुक्र एवं रज को शुद्ध करने तथा उनको पूर्ण करने के लिये यह निधान दिया गया है ॥३॥
यथा च पुष्पमध्ये फलमनिर्वृत्तं सुसूक्ष्ममस्ति न चोपलभ्यते, यथा चाग्निदारुषु सर्वगतः प्रयत्नाभावान्नोपलभ्यते, तथा स्त्रीपुंसयोः शोणितशुक्रे कालावक्षे स्वकर्मावक्षे च भवतः । षाडशवर्षयोर्हि शोणित१शुक्रयोर्मध्ये प्रभवतः; अर्वागपि यदाहारविशेषादारोग्याच्च पूर्णे भवत इति परिषत् ।।४।।
जिस प्रकार पुष्प में फल सूक्ष्म तथा अनुत्पन्न (Latent) या अदृश्य अवस्था में होने से उपलब्ध नहीं होता अथवा जिस प्रकार लकड़ियों में सब जगह अग्नि होने पर भी प्रयत्न के बिना प्राप्त नहीं होती है उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष में क्रमशः शोणित (आर्तव) तथा शुक्र (वीर्य) काल तथा अपने कर्मों की अपेक्षा रखते हैं अर्थात् उचित समय पर प्रकट होते हैं। स्त्री एव पुरुष के १६ वर्ष के होने पर शोणित तथा शुक्र कार्य करने में समर्थ होते हैं अथवा पूर्ण होते हैं। १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व भी आहार की विशेषता तथा आरोग्य के कारण शोणित और शुक्र पूर्ण हो सकते हैं। अर्थात् साधारणतया १६ वर्ष की अवस्था में शुक्र एवं शोणित पूर्ण परिपक्व होता है परन्तु यदि पौष्टिक आहार मिले तथा स्वास्थ्य उत्तम हो तो इससे पूर्व भी शुक्र एवं शोणित पूर्ण हो सकते हैं।
वक्तव्य—सुश्रुत में पुरुष के २५ वर्ष तथा स्त्री के १६ वर्ष का होने पर ही मैथुन का विधान दिया गया है। शोणित एवं शुक्र की उपस्थिति इससे पूर्व भी होती है परन्तु वे पूर्ण अवस्था में नहीं होते हैं। शारीर स्थान के दशवें अध्याय में कहा है—ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ।। जातो वा न चिरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।। इस अवस्था में जो गर्भ की स्थिति होगी वह या तो गर्भाशय में ही मृत हो जाता है अथवा उत्पन्न होने के बाद मृत हो जायगा या अत्यन्त ही दुर्बल सन्तान उत्पन्न होगी। स्त्री में १६-२० वर्ष तक की अवस्था में सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक होती है। उससे पूर्व अपक्वावस्था होती है तथा उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। इसी प्रकार पुरुष में २० वर्ष की अवस्था से लकर प्रायः ३०-३५ वर्ष की अवस्था तक सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक विद्यमान होती है। उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। यह सामान्य नियम है। इसके अपवाद भी हो सकते हैं तथा वाजीकरण ओषधियों के द्वारा इस शक्ति को बहुत बड़ी अवस्था तक भी स्थिर रखा जा सकता है ॥४॥
रजस्वलायाश्चेत् प्रथमेऽहनि गर्भ आपद्येत तं वातगर्भमाचक्षते विफलं वातपुष्पमिवोद्भिदानां; द्वितीयेऽहनि चेत् स्रंसते च्यवते वा; तृतीयेऽहनि सूतिकासने म्रियते, न वा दीर्घायुर्भवति, हीनाङ्गश्च जायते; अतऊर्ध्वमृतुर्द्वादशाहं ब्राह्मणीनाम्, एकादशाहं क्षत्रियाणां, दशाहं वैश्यानां, नवरात्रमितरासाम् । ऋतुर्बीजकालमवेक्षत इत्याहुर्महर्षयः । अत ऊर्ध्वमकालजमाहुः । अकालजं हीनं दुर्बलमस्थिरमदृढ़मपीनभङ्गुरं धान्यमिव भवति ।।५।।
१. 'शोताणुशुक्रे पूर्णे भवतः' इति पाठश्चेत् साधु ।