काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११३
शेफ (मूत्रेन्द्रिय) + १ पृष्ठ + १ चिबुक (ठोडी) + १ उदर (पेट) + १ ललाट + १ आस्य (मुख) + १ गोजिह्वा (जिह्वा के नीचे की छोटी जीभ) + १ शिर + ४ पाणितल तथा पादतल के हृदय¹ (इन्हें शाखाहृदय भी कहते हैं) + १ हृदय (चेतनाश्रय) + ४ अक्षिबन्धन + २० अंगुलियां = ८७ प्रत्यङ्ग होते हैं। चरक शा. अ. ७ में निम्न ५६ प्रत्यङ्ग गिनाये हैं— षट्पञ्चाशत्प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपनिबद्धानि यानि यान्यपरिसंख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति; तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरुपिण्डिके, द्वौ स्फिचौ, द्वौ वृषणौ, एकं शेफः, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्षम्, एकमुदरं, द्वौ स्तनौ, द्वौ श्लेष्मभुवौ, द्वे बाहुपिण्डिके, चिबुकमेकं द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्कण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि, द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि। सुश्रुत में निम्न प्रत्यङ्ग गिनाये हैं—मस्तकोदरपृष्ठनाभिललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः। कर्णनेत्रभ्रूशङ्खांसगण्डकक्षस्तनवृषण-पार्श्वस्फिग्जानुबाहूरुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्गुलयः, स्रोतांसि वक्ष्यमाणानि, एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः॥
स्रोतांसि द्विविधान्याहुः सूक्ष्माणि च महान्ति च।
महान्ति नव जानीयाद् द्वे चाधः सप्त चोपरि।
नाभिश्च रोमकूपाश्च सूक्ष्मस्रोतांसि निर्दिशेत्॥
स्रोत दो प्रकार के होते हैं। १. सूक्ष्म २. महान्। महास्रोत नौ होते हैं जिनमें दो नीचे (मूत्रेन्द्रिय अथवा जननेन्द्रिय और गुदा) तथा सात ऊपर शिर में (२ आंखें + २ नाक + २ कान + १ मुखविवर = ७)-ये कुल मिलाकर ९ होते हैं। चरक शा. अ. ७ में कहा है—नव महान्ति छिद्राणि सप्त शिरसि द्वे चाधः। नाभि तथा रोमकूप सूक्ष्म स्रोत समझे जाते हैं।
हृदयात् संप्रतायन्ते सिराणां दश मातरः।
ऊर्ध्वं चतस्रो द्वे तिर्यक्चतस्रोऽधोवहाः सिराः।
व्याप्नुवन्ति शरीरं ता भिद्यमानाः पुनः पुनः।
पर्णानामिव सीवन्यः सरणाच्च सिराः स्मृताः॥
हृदय प्रदेश से शिराओं की १० माताएं (मुख्य या मूल शिराएं-Mother roots) निकलती हैं जिनमें चार ऊपर की ओर, दो तिर्यक् (तिरछी) तथा चार अधोवहा शिरायें होती हैं। ये दस शिरायें ही पुनः २ विभक्त होती हुई सारे शरीर को व्याप्त कर लेती हैं। जिस प्रकार पत्तों में सीवनियां होती हैं उसी प्रकार सारे शरीर में सरण (गति) करने के कारण इन्हें ‘सिरा’ कहते हैं।
वक्तव्य— पूर्व शारीर स्थान के प्रथम अध्याय में शिराओं की संख्या ७०० बताई हैं। यहां ये १० बताई हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मूल में ये शिरायें १० ही होती हैं जो कि धीरे २ विभक्त होकर ७०० या इससे भी अधिक संख्या में होकर सारे शरीर में व्याप्त हो जाती हैं। सुश्रुत शा. अ. ७ में छोटी २ जलहारिणियों (नालियों) का उदाहरण देकर बताया है कि जिस प्रकार छोटी २ एवं कृत्रिम असंख्य नालियों द्वारा उद्यान में पानी दिया जाता है उसी प्रकार इन शिराओं से सारे शरीर का पोषण होता है। कहा है—सप्त सिराशतानि भवन्ति, याभिरिदं शरीरमाराम इव जलहारिणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्निह्यतेऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, द्रुमपत्रसेवनीनामिव च तासां प्रतानाः तासां नाभिर्मूलं,
१. इन्हें सुश्रुत ने तलहृदय नामक मर्म कहा है जो कि दोनों हाथों तथा पैरों के तले में होते हैं (मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेण मध्येपादतलस्य तलहृदयं नाम-सुश्रुत शा. अ. ६-२४)।