भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

१०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ]

गर्भतश्च माता रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिर्मुहुर्मुहुरोजः परस्परत आददाते गर्भस्यासंपूर्णत्वात्, तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदायुक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मात्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात्; तं चैवमभिसमीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः । आठवें मास में गर्भ के अपूर्ण होने से (गंगाधर के अनुसार पूर्ण होने से—यही पाठ अधिक उचित प्रतीत होता है) माता से गर्भ तथा गर्भ से माता रसवाहिनियों द्वारा परस्पर ओज का ग्रहण करते हैं। अर्थात् इस समय ओज के अस्थिर होने से गर्भ का जन्म संकटमय समझा जाता है। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—अष्टमेऽस्थिराभवत्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेन्निरोजस्वान्नैर्ऋतभागत्वाच्च, ततो बलिं मांसौदनमस्यै दापयेत् ।। इस मास में उत्पन्न हुआ गर्भ या तो मृत ही होता है अथवा उसके पालन करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है ।।

नवमादिषु मासेषु जन्म चास्य यथाक्रमम् । पूर्वदेहकृतं कर्म गर्भावाससुखासुखम् ।।
जातः स्मरति तावच्च यावन्नोपैति जीविकाम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।


नवम इत्यादि मास में यथाक्रम इसका जन्म होता है । पूर्वजन्म में किये हुए कर्म, तथा गर्भावस्था के सुख और दुःख को उत्पन्न हुआ व्यक्ति तभी तक स्मरण रखता है जब तक कि वह नवीन जीवन को प्राप्त नहीं करता । अर्थात् नवजीवन प्राप्त करते ही मनुष्य पूर्वजन्म की सब बातों को भूलकर अपने जीवन की बिलकुल नवीनता प्रारंभ करता है ।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ४ में प्रसवकाल १२ मास तक माना गया है । कहा है—तस्मिन्नेकदिवसमतिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकालमित्याहुराद्वादशान्मासात्, एतावान्कालः, वैकारिकमतः परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य । सुश्रुत शा.अ. ३ में भी कहा है—नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन् जायते, अतोऽन्यथा विकारी भवति । गर्भ के गर्भाशय में रहने का साधारणतया समय २८० दिन माना गया है । इससे हम गर्भ की आनुमानिक तिथि जान सकते हैं । अर्थात् अन्तिम ऋतुकाल की प्रथम तिथि में २८० दिन जोड़कर प्रसव की तिथि निकाली जा सकती है । अथवा अन्तिम ऋतुस्त्राव के प्रथम दिन में ७ दिन जोड़ने से जो तिथि आये वही नवम मास में प्रसव की तिथि होगी । उदाहरण के लिये यदि किसी स्त्री को अन्तिम मासिक स्त्राव १ दिसम्बर को हुआ हो तो इसमें ७ दिन जोड़कर आगे ९ महीने गिनने से ७ सितम्बर आता है जो कि प्रसव की संभावित तिथि होनी चाहिये ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।
(इति) शारीरेऽसमानगोत्रीयं नाम (शारीरम्) ।।


गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः

अथातो गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम गर्भाक्रान्ति शारीर का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा है ।

वक्तव्य—इस अध्याय में यह वर्णन किया जायगा कि गर्भाशय में गर्भ कैसे उत्पन्न होता है अथवा गर्भ में जीव किस प्रकार अवक्रमण (प्रवेश) करता है । सुश्रुत शा.अ. ३ की टीका में डल्लन ने लिखा है—अत्र हि शुक्रशोणितं