भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 464
१०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ]

इनके परस्पर मिलने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया-आकाश तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-वत्स ! गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, सूक्ष्मता, विवेक, मुख, कण्ठ तथा कोष्ठ ये भाव आकाश से उत्पन्न होते हैं। वायुतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-स्पर्श, त्वचा, रूक्षता, प्रेरणा (गति देना), धातुओं का परिवर्तन, प्राण, अपान तथा शरीर की चेष्टा (गतियां)-ये वायु से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। अग्नितत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रूप, चक्षु, प्रकाश, पित्त, पक्ति (पाचन), ऊष्मा (शरीर की गर्मी) तथा शरीर की वृद्धि-ये तैजस-अग्नि से उत्पन्न होने वाले भाव हैं। जलतत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-रस, रसना (जिह्वा) शैत्य (शीतलता), मृदुता, द्रव, स्नेह, क्लेद (गीलापन) श्लेष्मा, मेद, रक्त, मांस तथा शुक्र-ये आप्य (जल से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। पृथिवी तत्व से उत्पन्न होने वाले भाव-गन्ध, घ्राण (नासिका), गुरुता, स्थिरता, तथा मूर्ति (आकृति-ढांचा) ये पार्थिव (पृथिवी से उत्पन्न होने वाले) भाव हैं। चरक शा. अ. ७ में इन महाभूतों से उत्पन्न होने वाले भावों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया है-तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद्गुरुरखरकठिनमङ्गं नखास्थिदन्तमांसचर्मवर्चः केशश्मश्रुनखलोमकण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च, यद्द्रवसरमन्दस्निग्धमृदुपिच्छिलं रसरुधिरवसाकफपित्तमूत्रस्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च, यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे तत्सर्वमाग्नेयं रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेषनिमेषाकुञ्चनप्रसारणगमनप्रेरणधारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्विविक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च, यत्प्रयोक्तृ तत्तत्प्रधानं, बुद्धिर्मनश्चेति। शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनावयवानां निर्दिष्टा। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १ में भी कहा है-आन्तरिक्षास्तु-शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्तता च। वायव्यास्तु-स्पर्शः, स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दनं लघुता च। तैजसास्तु-रूपं रूपेन्द्रिये वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिर्मर्षस्तैक्ष्ण्यं शौर्यं च। आप्यास्तु रसो रसेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्यं स्नेहो रेतश्च। पार्थिवास्तु-गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वभूतसमूहो गुरुता चेति। इसलिये यह पुरुष लोकसंमत (जगत के तुल्य) कहा जाता है। चरक शा.अ. ५ में भी कहा है-"पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवान्पुनर्वसुरात्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके"। षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्दं लभन्ते; तद्यथा-पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समुदिता 'पुरुषः' इति शब्दं लभन्ते। पुरुष इस महान् लोक का ही एक छोटा प्रतिरूप (Miniature) है। जितने भी मूर्तिमान् भाव इस लोक में हैं उतने ही पुरुष में हैं तथा जितने पुरुष में हैं उतने ही लोक में हैं। उदाहरण के लिये पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा अव्यक्त ब्रह्म-ये छः धातुएं मिलकर ही लोक कहाता है तथा इसीको पुरुष भी कहते हैं। चरक में आगे लोक एवं पुरुष की विभूतियों की विस्तृत तुलना की गई है-तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापो, वायुः प्राणो, वियच्छुषिराणि, ब्रह्मान्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिन्तर्रात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्वं, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदि त्यास्तु आदानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादो, वसवः सुखं, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवा सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं, यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, तथा द्वापरस्तथा स्थविर्यं, यथाकलिरवेमातुर्यं, यथायुगान्तथा मरणमिति, एवमनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश! सामान्यं विद्यात्। मातृज अर्थात् माता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव-रक्त, मांस, नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत् (Liver), प्लीहा (Spleen), वृक्क (Kidney-गुर्दे), बस्ति (मूत्राशय-Bladder), पुरीषधारण (पुरीष-मल का जहां धारण होता है-Sigmoid colon), आमाशय (Stomach), उत्तर गुदा (Rectum), अधरगुदा (Anus), क्षुद्रान्त्र (Small Intestines-छोटी आंते), स्थूलान्त्र (Large-intestines colon-बड़ी आंते)-ये मातृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में-त्वचा, वपा (मेद) तथा वपावहन (Adipose tissue) अधिक दिये हैं। कहा है-यानि चास्य मातृतः सम्भवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा-त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च यकृच्च प्लीहा