भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 469

शरीरविचयशारीराध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् १११

बाहु×
मेढ्रास्थि×
त्रिकास्थि×
गुदास्थि×
पृष्ठास्थि३५४५
जत्रु अस्थि
ललाटास्थि
आंखों की अस्थियां×
गण्डास्थि
नासिकास्थि
छाती में१७१४
जानुकपालास्थि×
कूटास्थि×
योग८२७६

इनके अतिरिक्त अन्य सब अस्थियां परस्पर मिलती हैं। सुश्रुत ३६० अस्थियां स्वीकार नहीं करता। वह केवल ३०० अस्थियां मानता है। वह दांत के उलूखल तथा नखों को अस्थियों में नहीं गिनता। आजकल के शरीरशास्त्र के ज्ञाता शरीर में कुल २०६ अस्थियां मानते हैं। इस प्रकार काश्यपसंहिता, चरक तथा सुश्रुत सब में ही अस्थियों की संख्या बहुत अधिक दी हुई हैं तथा गिनने पर उनकी संख्या ठीक भी नहीं बैठती है तथा बहुत से स्थानों पर उनमें परस्पर समानता नहीं है। उन्होंने अस्थि शब्द से संभवतः शरीर के सभी कठिन पदार्थों का ग्रहण कर लिया है तभी इतना अधिक अन्तर हो गया प्रतीत होता है। आधुनिक विज्ञान एक पूर्ण युवा मनुष्य में निम्न अस्थियां मानता है—

बाहुओं में ३०×२=६०
सक्थियों में ३०×२=६०
शिर और ग्रीवा में=३६
मध्यदेह=५०
कुल२०६

इसका विशेष विवरण शरीर-शास्त्र की किसी पुस्तक में देखना चाहिये। यह साधारण रूप में अस्थियों की संख्या कही गई है। इसमें कारणवश वृद्धि अथवा ह्रास भी हो सकता है॥

दशैवायतनान्याहुः प्राणानां तानि मे शृणु।
मूर्धाऽथ हृदयं बस्तिः कण्ठौजः शुक्रशोणितम्।
शङ्खौ गुदं ततस्त्रीणि महामर्माणि चादितः।

प्राणों के दस आयतन कहे गये हैं। इन्हें तू मुझ से सुना, १. मूर्धा २. हृदय ३. बस्ति ४. कण्ठ ५. ओज ६. शुक्र ७. शोणित ८-९. दोनों शङ्ख प्रदेश (Temporal regious) १०. गुदा। चरक सू. अ. २९ में भी ये ही १० प्राणायतन गिनाये हैं—दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः। शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम्॥ परन्तु चरक शा. अ. ७ में शङ्खप्रदेशों के स्थान पर नाभि तथा मांस को गिना गया है—दश प्राणायतनानि तद्यथा—मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्तिः ओजः शुक्रं शोणितं मांसमिति। अष्टाङ्गसंग्रह शा. अ. ५ में मांस के स्थान पर जिह्वाबन्धन पढ़ा गया


३० का.सं.