काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ९७
गया है कि प्रत्येक युग में पुरुष की आयु एवं अन्य गुणों का क्रमशः ह्रास होता जाता है । चरक संहिता में भी प्रत्येक युग में क्रमशः आयु के ह्रास होने का निर्देश मिलता है । चरक वि. अ. ३ में कहा है—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणपादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ।। संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ।। प्रत्येक युग में क्रमशः धर्म का एक पाद (चतुर्थांश) कम हो जाता है। पञ्चमहाभूतों के गुणों का भी एक २ पाद नष्ट होता जाता है । भिन्न २ कालों में संवत्सर के १०० वें भाग के पूर्ण हो जाने पर मनुष्यों की आयु में एक संवत्सर की कमी हो जाती है। जैसे उदाहरण के लिये सतयुग का काल ४८०० दिव्य वर्ष माना जाता है। ४८०० के १०० वें भाग अर्थात् ४८ दिव्य वर्षों के व्यतीत हो जाने पर मनुष्य की आयु में एक वर्ष की कमी आजायेगी । इस प्रकार ४८०० दिव्य वर्षों के व्यतीत होने पर त्रेतायुग के प्रारंभ में १०० वर्ष की आयु कम हो जायेगी अर्थात् सतयुग के प्रारंभ में यदि मनुष्य की आयु ४०० वर्ष थी तो त्रेता के प्रारंभ में वह ३०० वर्ष रह जायगी। द्वापर के प्रारंभ में मनुष्य की आयु २०० वर्ष तथा अन्त में कलियुग के प्रारंभ में तो मनुष्य की आयु १०० वर्ष ही रह जाती है। इसी क्रम से यह आगे भी धीरे २ कम होती जायेगी तथा अन्त में कलियुग के १२०० दिव्य वर्ष बीतने पर संसार नष्ट हो जायगा—प्रलय हो जायगा । ३. उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी—इन शब्दों पर तथा नारायण, अर्धनारायण, कैशिक, तथा प्रज्ञप्तिपिशित आदि शारीरिक संहननों के विषय में उपोद्घात में विशेष विचार किया गया है । इन्हें वहीं देखना चाहिये ।।
समुदयकारणं तु ब्रूमः—अव्यक्तान् महान्, महतोऽहङ्कारः; अहङ्कारात् खादीनि, ता अष्टौ भूतप्रकृतयः । चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि, तान्येव बुद्धीन्द्रियाणि; हस्तौ पादौ जिह्वा गुद उपस्थ इति पञ्च कर्मेन्द्रियाणि; शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चेन्द्रियार्थाः; अतीन्द्रियं तु मनः; इत्येते षोडश विकाराः महदादि सर्वं क्षेत्रमव्यक्तमाचक्षते, क्षेत्रज्ञं तु शाश्वतमचिन्त्यमात्मानम् । अस्य लिङ्गानिचेतनाहङ्कारप्राणापानोन्मेषनिमेषसुखदुःखेच्छाद्वेषस्मृतिधृतिबुद्धयः; तदभावे मृताख्या । शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयं पुरुषमाचक्षते, आत्मानमेके । ज्ञानस्याभावो भावश्च मनसो१ लक्षणं, तस्यैकत्वमणुत्वं च द्वौ गुणौ, प्रयत्नज्ञानायौगपद्यादेकं, पृथक् (न) । समनस्कमिन्द्रिय मर्थग्रहणसमर्थं भवति । खं वायुस्तेज आपः पृथिवीति पञ्च महाभूतानि शरीरहेतुरुच्यते । शब्दादयस्तेषां गुणाः । गुणवृद्ध्याऽवस्थितानि महाभूतानि दिगात्मा मनः कालश्च द्रव्याणि । द्रव्याश्रया गुणाः । खस्याप्रतिषेधो लिङ्गं, वायोश्चलनं, तेजस औष्ण्यम्, अपां द्रवत्वं, पृथिव्याः स्थैर्यम् । मनःषष्ठानामिन्द्रियाणां त्रीणि त्रीणि विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तीनि । मनश्चक्षुः श्रोत्रमिति विप्रकृष्टवृत्तीनि, घ्राणं रसनं त्वगिति सन्निकृष्टवृत्तीनि । तत् सर्वं स्पर्शनलक्षणमाहुः; तद्यथा-पुरुषः सर्वतोगवाक्षं प्रासादमभिरूढस्तांस्तानर्थान् गवाक्षैरालोचयत्येवमयमात्मा शरीरस्थ इन्द्रियैरनुपहतैर्मनःप. ।। .................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ७९ तमं पत्रम्२ ।)
अब हम समुदयकारण (सृष्टि उत्पत्ति के क्रम) को कहते हैं—अव्यक्त (मूलप्रकृति) से महत्तत्व (बुद्धितत्व) उत्पन्न होता है, महत्तत्व से अहंकार (अहं भावना), अहंकार से आकाश आदि पांच सूक्ष्मभूत (पंचतन्मात्राएं) उत्पन्न होते हैं । ये आठ भूतप्रकृतियां हैं । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण (नासिका), रसना तथा त्वचा—ये पांच इन्द्रियां जिन्हें बुद्धीन्द्रियां (ज्ञानेन्द्रियां)
१. अत्र मनसोऽनेकत्ववादमाक्षिप्य एकत्ववादश्वरके इव व्यवस्थापितः । अस्मिन्नेवार्थे समनस्कमित्युत्तरवाक्यं साधकत्वेन संगच्छते । अतोऽत्र ‘न पृथक्’ इति सनकारपाठश्चैत् साधु ।
२. अस्याग्रे ८० तमं पत्रं त्रुटितं ताडपत्रपुस्तके ।