काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अध्याय: ? ] |
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ब्रह्मा ने कलाओं के समूहरूप काल को शुभ और अशुभ दो प्रकार का बनाया । ये शुभ और अशुभ काल भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् के भेद से समान परिमाण वाले होते हैं। इनमें शुभ काल को उत्सर्पिणी तथा अशुभ काल को अवसर्पिणी कहते हैं। ये दोनों पुन: युगभेद से तीन प्रकार के हैं। उत्सर्पिणी के आदियुग, देवयुग तथा कृतयुग ये तीन भेद हैं। इसी प्रकार अवसर्पिणी के त्रेता, द्वापर एवं कलियुग-ये तीन भेद हैं, युगों के अनन्त होने से इनका परिमाण नहीं कहा गया है। आदियुग तथा देवयुग का परिमाण अचिन्त्य होने से इनके कर्म, भोजन, पान, गति वीर्य तथा आयु का निर्देश संभव नहीं है। कृतयुग में मनुष्यों का नारायण नाम का शारीरिक संहनन उत्पन्न होता है। इसलिये उसके लक्षण कहते हैं—उसका सिर घन (ठोस) तथा कपाल रहित होता है, अस्थियां सत्व से युक्त होती हैं, आकृतियां वज्र के समान श्रेष्ठ (स्पष्ट) होती हैं, हृदय में इसके दश महाशिराएं होती हैं, इसकी त्वचा तथा सिर अभेद्य तथा अच्छेद्य होते हैं, इसके सारे शरीर में शुक्र होता है। इसकी विशालता एक योजन होती है। सात रात्रि (सात मास) यह गर्भ में निवास करता है। उत्पन्न होते ही यह सब कर्म कर सकता है। इसे भूख, प्यास, श्रम (थकावट), ग्लानि, शोक, भय, ईर्ष्या, अधर्म, चिन्ता, आधि (मानसिक रोग) तथा व्याधि (शारीरिक रोग) तथा वृद्धावस्था नहीं सताती है, यह स्तन्यवृत्ति नहीं होता अर्थात् आरंभ से ही दूध नहीं पीता। इसमें धर्म, तप, ज्ञान, विज्ञान, स्थिति तथा युक्ति का आधिक्य होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपमार्थ होती है। इसके बाद त्रेता में मनुष्यों का अर्धनारायण नाम का शारीरिक संहनन होता है। उसका शरीर प्राय: एक अस्थिवाला तथा आकुञ्चन (Contraction) एवं प्रसारण (Dilatation) से रहित होता है। आठ मास यह गर्भ में रहता है। स्तन्य (दूध) पर यह जीवित रहता है। इसके सिर में दो कपाल होते हैं। पार्श्वों तथा छाती में एक २ सन्धि होती है। पीठ तीन अस्थि वाली होती है। (दो Sacrum तथा एक Coccyx), कोष्ठ में बीस शिराएं होती हैं। शुक्र भी होता है। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का चौथाई भाग होता है। पहले (कृतयुग) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद द्वापर में कैशिक संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसकी अस्थियां केश के समान अणु तथा सुषिर होती हैं। सन्धियां अतिक्षिप्त होती हैं। हाथी के समान बड़ा बल होता है, सारा शरीर शिराओं से व्याप्त होता है शरीर की सन्धियों में शुक्र (बल) होता है अर्थात् शरीर की सन्धियां अत्यन्त दृढ़ होती हैं। इसकी उत्कृष्ट आयु पलितोपम का आठवां हिस्सा होती है तथा पहले (त्रेता) की अपेक्षा इसमें आधे गुणों का ह्रास हो जाता है। इसके बाद कलियुग में प्रज्ञप्ति पिशित संहनन वाला शरीर उत्पन्न होता है। इसके शरीर में अत्यन्त सुषिर, मज्जा से युक्त तथा नल की तरह भङ्गुर तीन सौ साठ अस्थियां होती हैं, ४०० मांसपेशियां होती हैं, ७०० शिराएं होती हैं, जिनका मूल हृदय होता है, मस्तिष्क मूल वाले ९०० स्नायु, तालूमूलवाली २०० धमनियां, १०७ मर्म, ३ महामर्म, प्राणों के १० आयतन, ५ हृदय, ३८१ सन्धियां, १४ कण्डराएं, ४२ कूर्च, ६ त्वचा तथा ७ धातुएं होती हैं। स्रोत दो प्रकार के होते हैं। उत्पन्न होने के बाद उसके दांतों का जन्म होता है। वह दस मास तक गर्भ में रहता है। एक वर्ष के बाद वह खड़ा होने लगता है तथा बोलने लगता है। इसकी उत्कृष्ट आयु १०० वर्ष होती है। वह सुख-दु:ख, आधि-व्याधि, वृद्धावस्था तथा मृत्यु से युक्त होता है अर्थात् वह इन सब से घिरा रहता है। ......... इसका शरीर पूर्ण होता है। इसे प्राय: भूख, प्यास, गौरव (भारीपन), श्रम (थकावट) शिथिलता, चित्त, ईर्ष्या, रोष (क्रोध), असत्य, लोलुपता, दु:ख, मोह तथा वियोग होते हैं। उसे संसार के सब कर्म करने पड़ते हैं तथा वह कष्टों से युक्त होता है। ये दो २ युग सत्व, रज एवं तम से युक्त जानें। इस प्रकार यह पुरुष की उत्पत्ति का कारण कहा है।
वक्तव्य— १. कलासमूहं कालम्—छोटी २ कलाओं के समूह को ही काल कहते हैं इसीलिये 'कला' शब्द के द्वारा ही 'काल' शब्द बनता है। सुश्रुत सू. अ. ६ में कहा है—'स सूक्ष्मामपि कलां न लीयते इति काल:'। इसकी व्याख्या में डल्लण ने कहा है—'स: काल: सूक्ष्मामपि स्तोकामपि कलां भागं न लीयते गतिमत्वात् श्लिष्टो न भवति'। इसलिये कई विद्वान् कहते हैं—कलाशब्दस्य ककाराकारौ लीधातोश्च लकारमादाय कालशब्दनिष्पत्ति: ॥ २. इस अध्याय में बताया