काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ] |
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स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इति हुत्वा; ब्राह्मणं हविष्यौदनेन दक्षिणावता तर्पयित्वा, देवांश्च बलिभिः, गुरवे पूर्णकुम्भं दक्षिणां दत्त्वा, 'दधिक्राव्ण' इति प्राङ्मुखो दधि प्राश्य, उपस्पृश्याद्भिः, परिक्रम्य प्रदक्षिणं, गुरोर्बाहुं संस्पृस्य ब्रूयात्—असावहं पुत्र इति, पादौ संस्पृश्य ब्रूयात्—असावहं शिष्य इति ।।३।।
सबसे प्रारम्भ में आचार्य को चाहिये कि वह समीप आये हुए, विद्या के इच्छुक तथा आगे कहे गये शिष्य के गुणों से युक्त शिष्य का उत्तरायण काल में प्रशस्त दिन तथा अश्विनी, रोहिणी, उत्तरा या अन्य किसी नक्षत्र में विधिपूर्वक उपनयन$^१$ करे। फिर पूर्व या उत्तर की ओर पुण्यकारक स्थान में गोबर तथा पानी से गोचर्म$^२$ के प्रमाण की एक चौकी या फर्श को लीपकर तथा यथोक्त लक्षणोल्लेखन (लक्षण के अनुसार भूमि खोदना आदि), अग्निप्रणयन (अग्नि का लाना), परिसमूहन (इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को एकत्र करना), पर्युक्षण (जल छिड़कना), ब्रह्मप्रणीत—आस्तरण (यज्ञ के लिए ब्रह्मा के निमित्त बनाया हुआ आसन बिछाना), आज्योत्पवन (घृत को पवित्र करना अथवा पिघलाना), आघाराज्याहुति$^३$, आज्य$^४$ भागाहुति तथा अन्य आहुतियां आदि तैयार करके घृतयुक्त पलाश (ढाक) की समिधाओं से निम्न देवताओं तथा ऋषियों के नाम से आहुति देवे—अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये$^५$ स्विष्टकृते स्वाहा। फिर दक्षिणा सहित हविष्य ओदन के द्वारा ब्राह्मणों तथा बलि के द्वारा देवताओं को तृप्त करके तथा गुरु को घड़ा भरके धन आदि की दक्षिणा देकर 'दधिक्राव्ण' इत्यादि मन्त्र बोलकर पूर्व दिशा में मुख करके दधि का सेवन करके, जल का स्पर्श करके तथा अग्नि को दक्षिण में रखकर परिक्रमा करके गुरु का हस्तस्पर्श करके वह कहे—यह मैं आपका पुत्र हूँ तथा गुरु के पैरों को स्पर्श करके कहे यह मैं आपका शिष्य हूँ। चरक वि. अ. ८ में शिष्योपनयन-विधि निम्न प्रकार से दी है—एवं विधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत—अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्यहस्तश्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्यमुपलेपनमुदकुम्भांश्च गन्धहस्तोमाल्यदाम-प्रदीपहिरण्यहेमरजतमणिमुक्ताविद्रुमक्षौमपरिधिकुशलाजसर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसो ग्रथिताग्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्ठानादायोपनिष्ठस्वेति, अथ सोऽपि तथा कुर्यात् । तमुपस्थितमाज्ञाय समे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतुष्किष्कुमात्रं चतुरस्रंस्थण्डिलं गोमयोदकेनोपलिप्ते कुशास्तीर्णे सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्तचन्दनोदक-कुम्भक्षौमहेमहिरण्यरजतमणिमुक्ताविद्रमालंकृतं मेध्यभक्ष्यगन्धशुक्लपुष्पलाजसर्षपाक्षतोपशोभितं
१. उपनयन का अर्थ अध्ययन के लिये शिष्य को आचार्य के समीप लाने से है—अध्ययनार्थमाचार्यसमीपं नीयतेऽनेनेत्युपनयनम् ॥
२. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बे-चौड़े स्थान को कहते हैं। कहा भी है—
सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् ।
दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ (अनुवादक)
३. मुख्य होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती हैं उनमें से यज्ञ कुण्ड के उत्तर भाग में जो एक आहुति और यज्ञकुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी आहुति दी जाती है उसे 'आघाराज्याहुति' कहते हैं। जैसे 'ओं अग्नये स्वाहा । इदमग्नये—इदन्न मम' के द्वारा उत्तर भाग में तथा ओं सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय—इदन्नमम' के द्वारा दक्षिण भाग में आहुति दी जाती है। (अनुवादक)
४. जो कुण्ड के मध्य में आहुति दी जाती हैं उन्हें 'आज्यभागाहुति' कहते हैं। वे—'ओं प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये—इदन्न मम'। तथा ओं इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय—इदन्न मम ॥ इत्यादि दो आहुतियां हैं।
५. स्विष्टकृत होमाहुति एक ही होती हैं जो कि निम्न मन्त्र से घृत अथवा भात की दी जाती है—ओं यदस्य कर्मणोऽयरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वे स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्त हुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते—इदन्न मम ॥