भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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तृतीयं विमानस्थानम्

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**वक्तव्य—**इस अध्याय की केवल अन्तिम दो पंक्तियां ही उपलब्ध हुई हैं। शेष सम्पूर्ण अध्याय खण्डित है। अध्याय की समाप्ति-सूचक अन्तिम वाक्य '(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं विमानम्' भी अत्यन्त अस्पष्ट है। इसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि इस अध्याय का क्या विषय है। अन्तिम पंक्ति से थोड़ी सी ध्वनि अवश्य निकलती है। 'अवेक्षितजान् गदान्' को देखकर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः इसमें दृष्टि-दोष से उत्पन्न होने वाले रोगों का वर्णन किया गया होगा। अन्त में उन्हीं का देवता तथा नक्षत्र आदिकों की पूजा के द्वारा प्रतीकार दिया हुआ है। इससे अधिक इसके विषय में कुछ कहना कठिन है।

पृथक् पूजा हिताशनम्।
तिथिनक्षत्रदेवार्चा घ्नन्त्यवेक्षितजान् गदान्॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः॥
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥

पृथक् २ देवताओं की पूजा, हिताशन (पथ्य आहार का सेवन) तथा तिथि, नक्षत्र और देवताओं की अर्चना से दृष्टिदोष नष्ट होते हैं॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥


शिष्योपक्रमणीयविमानाध्यायः

अथातः शिष्योपक्रमणीयं विमानमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शिष्योपक्रमणीय विमानाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

**वक्तव्य—**शिष्योपक्रमणीय का अभिप्राय शिष्य का अध्ययन के निमित्त गुरु के पास आना है। गुरु उसकी सम्यक् प्रकार से परीक्षा करके उसे शास्त्र का ज्ञान देता है। शिष्य विद्या का अधिकारी है या नहीं, यह जानने के लिये ही इस अध्याय का उपक्रम किया गया है ॥१-२॥

अथ खलु गुरुः शिष्यमभिगतं विद्यार्थिनं शिष्यगुणान्वितं विधिनोपनयेदुदगयने पुण्याहे नक्षत्रेऽश्वयुजि रोहिण्यामुत्तरास्वन्यस्मिन् वा। पुण्ये प्रागुदक्प्रवणदेशे गोमयेनाद्भिश्च गोचर्ममात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य; यथोक्तं तत्र लक्षणोल्लेखनाग्निप्रणयन-परिसमूहनपर्युक्षणब्रह्मप्रणीतास्तरणाज्योत्पवनाधाराज्यभागप्रिग्रहोमान् कृत्वा, पालाशीः समिधो घृताक्ता जुहोति—अग्नयेस्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय