काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८५
कृत्वा, तत्र पाला-शीभिरिङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनविधिमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहुयादग्निमाशीः प्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति । शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान्स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् । इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—उपनयनीयस्तु ब्राह्मणः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त्तनक्षत्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थण्डिलमुपलिप्य गोमयेन दर्भैः सस्तीर्य रत्नपुष्पैर्लाजभक्तैरन्नैश्च पूजयित्वा देवता विप्रान् भिषजश्च तत्रोल्लिख्याभ्युक्ष्य दक्षिणाणं ब्रह्माणं स्थापयित्वाऽग्निमुपसमाधाय खदिरपलाशदेवदारुबिल्वानां समिद्भिश्चतुर्णां वा क्षीरिवृक्षाणां न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थमधूकानां दधिमधुघृताक्ताभिर्दार्वीहोमिकेन विधिना सप्रणवाभिर्महाव्याहृतिभिः स्रवेणाज्याहुतीर्जुहुयात् । प्रतिदैवतमृषींश्च स्वाहाकारं जुहुयात् । शिष्यमपि कारयेत् ॥३॥
अथ शिष्यगुणाः-क्षान्तिर्दाक्ष्यं दाक्षिण्यमानुकूल्यंशौचं कुले जन्म धर्मसत्याहिंसासामकल्याणज्ञान-विज्ञानस्थितिविनिवेशः पाटवं यथोक्तकारित्वं ब्रह्मचर्यमनुत्सेको लोभेर्ष्याविवर्जनमिति; अतोऽन्यथा दोषैः सवर्ज्यः ।।४।।
शिष्य के गुण—क्षमा, निपुणता, चतुराई, अनुकूलता, (आचार्य के अनुकूल होना), पवित्रता, उत्तमकुल में जन्म (कुलीनता), धर्म, सत्य, अहिंसा, साम (शान्ति), कल्याण, ज्ञान तथा विज्ञान की स्थिति प्रवेश, पटुता, यथोक्तकारित्व (आचार्य की आज्ञा के अनुसार कार्य करना), ब्रह्मचर्य, उत्सेक (गर्व-अहंकार) का अभाव और लोभ तथा ईर्ष्या का त्याग—ये शिष्य के गुण हैं । इसके विपरीत दोषों से युक्त शिष्य का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित शिष्य का ग्रहण नहीं करना चाहिये । चरक वि. अ. ८ में शिष्य के निम्न गुण दिये हैं—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादितः परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासावंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिण्मिनं धृतिमन्तममहंकृतं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसम्पन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमव्यसनिनमर्थतत्त्वभावकमकोपनं शीलशौंचाचारानुरागदाक्ष्यप्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थविज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितैषिणामाचार्यसर्वानुशिष्टप्रतिपत्तिकरमनुरक्तमेवगुणसमुदितमध्याप्यमेव हुः । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २ में कहा है—ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामन्यतममन्वयवयः शीलशौर्यशौचाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृति-मतिप्रतिपत्तियुक्तं तनुजिह्वौष्ठदन्ताग्रमृजुवक्त्राक्षनासं प्रसन्नचित्तवाक्चेष्टं क्लेशसहं च भिषक् शिष्यमुपनयेत् । अतो विपरीतगुणं नोपनयेत् ॥४॥
अथ गुरुः-धर्मज्ञानविज्ञानापोहापोहप्रतिपत्तिकुशलगुणसंपन्नः सौम्यदर्शनः शुचिः शिष्यहितदर्शी चोपदेष्टा च भिषकशास्त्रव्याख्यानकुशलस्तीर्थगतज्ञानविज्ञानः कल्योऽनन्यकर्माऽव्यावृत्तः शिष्यगुणा^१न्वितश्च । अतोऽन्यथा दौषैर्वर्ज्यः ।।५।।
गुरु या आचार्य के गुण—धर्म, ज्ञान विज्ञान, ऊहापोह (तर्क वितर्क) तथा प्रतिपत्ति (प्रागल्भ्य, प्रागुत्पन्नमतित्व अथवा युक्ति) में कुशल, गुणसम्पन्न (गुणी), जिसका दर्शन या आकृति सौम्य हो, पवित्र, शिष्यों के हितों का ध्यान रखनेवाला, उपदेशक, चिकित्सा शास्त्र के व्याख्यान में कुशल, ज्ञान तथा विज्ञान जिसे कण्ठस्थ हों, कल्प (मंगलकारी), जो और कोई कार्य न करता हो (अर्थात् शिष्यों को अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कोई आजीविकार्थ कार्य न करता हो), जिसने अध्यापन कार्य छोड़ा हुआ न हो (जिसे अध्यापन कार्य में रुचि हो) तथा जो पूर्वोक्त शिष्य में होने वाले गुणों से भी युक्त हो) इनके विपरीत दोषों से युक्त गुरु (आचार्य) का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित आचार्य अध्यापन कार्य के योग्य नहीं होता है । चरक वि. अ. ८ में आचार्य को निम्न गुणों से युक्त बताया है—ततोऽनन्तरमाचार्य
१. पूर्वोक्तैः शिष्यगुणैरपि यथासंभविभिर्युक्त इत्यर्थः ।