भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८७

अथाध्ययनविधिः—गुरुः शुचिरुद्धतहस्तः शुचौ देशे तद्वच्छिष्यायावहितायाथशब्दमोङ्कारं वा पूर्वं प्रयुज्य महाव्याहृतीरनूच्य सावित्रीं च त्रिभ्यस्याऽधीष्व भो इत्युक्ते(क्त्वा) रूपमेकं निगदेत्, तं चानुपठेत्, तच्छिष्यो रूपहतं संस्थाहतं च कुर्यात्^१, ग्रहणशक्त्यवेक्षः खण्डनसंदर्शनापूर्वग्रहणानि सोढुं यथोक्तश्रवणं तस्याभ्यासो धन्यः, धारणाध्यापनेनार्थतत्त्वाधिगमनं तु मोक्षाय । नानध्यायेष्वधीयीत, न गुरुव्यलीकेषु, न पर्वसु, न सन्ध्यायां, न विद्युदुल्कानभ्रवर्षाऽसूर्यदर्शनिषु (?), न महोत्सवे न भुक्तवान्, नाद्भुतदर्शने, न गोब्राह्मणगुरुपरात्मपीडायां, न पक्षिणीषु, नाप्यष्टकासु, नात्युच्चनाचप्लतक्लीबस्वरैः, नामुखाद् गुरोः, नालक्षितं, न संदिग्धं, न च क्षत्पिपासाव्याधिवैमनस्यादियुक्तोऽभ्यसेत् ।। ७ ।।

अध्ययन विधि—सबसे पूर्व गुरु पवित्र एवं उद्धत-हस्त होकर पवित्र स्थान पर सावधान हुए शिष्य के प्रति 'अथ' शब्द या ओङ्कार शब्दपूर्वक महाव्याहृतियों (ओं भूः स्वाहा, ओं भुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा, ओं भूर्भुवः स्वः स्वाहा इति) का उच्चारण करके तथा सावित्री (गायत्री मन्त्र) का तीन बार अभ्यास करके, 'वत्स पढ़ो' यह कहकर पहले किसी एक रूप (विषय) का उपदेश करे तथा उसको एकबार पुनः पढ़ाये (अर्थात् उसकी पुनः आवृत्ति कराये)। फिर उस उपदेश को शिष्य शब्द के स्वरूप तथा विषय की आवृत्ति द्वारा दृढ़ करे अर्थात् शिष्य उस उपदेश को अच्छी प्रकार याद करे। ग्रहणशक्ति के अनुसार खण्डन तथा संदर्शनपूर्वक ग्रहण किये हुए को सहना तथा यथोक्त श्रवण किये हुए का अभ्यास करना प्रशस्त होता है। उसके बाद उसे धारण करने तथा अध्यापन के द्वारा विषय के तत्त्व को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनध्याय (अवकाश) के दिनों में, यदि गुरु-आचार्य को पीडा-रोग हो, पर्व (त्यौहारों) में, दोनों सन्ध्याकालों में तथा बिजली गिरने, उल्कापात, अनभ्र-वर्षा, तथा सूर्य के दर्शन न होने पर, महोत्सव में, खाने के बाद, अद्भुत वस्तु के दर्शन के बाद, गौ-ब्राह्मण-गुरु-अन्य व्यक्ति या स्वयं (अपने आप) को पीडा (कष्ट) होने पर तथा पक्षिणी (अमावस्या तथा पूर्णमासी) और अष्टका (अष्टमी) आदि की उपस्थिति में नहीं पढ़ना चाहिये। तथा पढ़ते समय न अत्यन्त ऊँचे, न नीचे, न लुप्त तथा न क्लीब (नपुंसक) स्वर से पढ़ना चाहिये। गुरुमुख से बिना पढ़े, अलक्षित (जो बताया नहीं गया है) तथा संदिग्ध स्थल को भी नहीं पढ़ना चाहिये (अर्थात् उसका अभ्यास नहीं करना चाहिये) तथा भूख, प्यास, रोग तथा उदासीनता के समय भी नहीं पढ़ना चाहिये। चरक वि. अ. ८ में कहा है—तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमपस्पृश्योदकं देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो। मनःपुरःसराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरिक्रामन्पुनः पुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारपरदोषप्रमाणार्थम्, एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः। इसी प्रकार चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—न विद्युत्स्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं न तान्तं न विस्वरं नानवस्थितपदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिक्लिबं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरैरध्ययनमभ्यसेत् ॥७॥

अधीत्यानुज्ञातः प्रचरेच्छुक्लवासाः संह(य)तकेशोऽनुद्ध्वान्तो युगमात्रावलोकी पूर्वाभिभाषी सुमुखः । न चातुरुकुलमनाहूतः प्रविशेत्, प्रविशंश्च निमित्तानि लक्षयेत् । न च सर्वतोऽवलोकयेदन्यत्रातुरात् । न चातुरुकुलेषु स्त्रीभिः प्रेष्याभिरपि सहोपहासं गच्छेत्, न चासामपूजापुरस्कृतं नाम गृह्णीयात्, मान्यस्थानेनैव तु ब्रूयात्, न च ताभिः संव्यवहारमतिप्रणयं वा कुर्यात्, न च भर्तुरविदितं स्त्रीभ्यः किञ्चिदादद्यात्, न चाविदितः प्रति(वि)शेत्, न च रहसि स्त्रिया सह ब्रूयादासीत वा, न चैनां विवृतां प्रेक्षेत विहसेद्वा,


^१. गुरुरैकैकविषयस्वरूपमुपदिशेत्, पुनरप्युपदेशं सुबोधायावर्तयेत्, शिष्यस्तमुपदेशं शब्दस्वरूपावृत्त्या च दृढी कुर्यादिति भावः ॥