काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]
प्रणयन्तीं चोपेक्षेत, न च प्रकाशयेत् । न चातुरकुलगुह्यं बहिःप्रकाशयेत्, नातुरकुलदोषान् प्रथयेत् । दृष्टारिष्टमपि चातुरं न तत्त्वं ब्रूयात्, नित्यमाश्वासयेत् । न मृत्युपरिगतशरीरमसाध्यरोगमनुपकरणं चोपगच्छेत्, नौषधमक्रमेणोपदिशेत्, न पराधीनं कुर्यात् । न स्वयं कृ¹तकमौषधं प्रयुञ्जीत, शरीरौषधव्याधिवयसां चावस्थान्तरज्ञः स्यात् । नित्यसंभृतधूपाम्नौषधः स्यात् । न चान्यभिषग्भिर्विरोधं गच्छेत् । संयुक्तश्च तैरौषधं प्रकल्पयेत् । प्रगल्भो निःशङ्क उपस्थितपदे विस्पष्टं विचित्रं मृदूपनयवद्ग्राहकमविरुद्धं धर्म्यं सदा ब्रूयात् । प्रजानां हि स्वस्तिकामो भिषगिह चामुत्र च नन्दत इति ।।८।।
शिक्षा ग्रहण करने के बाद आचार्य से अनुमति लेकर, शुभ्र वस्त्रों को धारण करके, बालों को ठीक करके, भ्रमरहित, युग (चार हाथ) मात्र दूरी तक देखने वाला (अर्थात् नीचे मुंह किये हुए), पहले बोलने वाला (अर्थात् परस्पर मिलने पर दूसरे के बोलने से पहले सत्कारयुक्त वचनों को बोलने वाला), तथा उत्तम एवं सुन्दर बात बोलने वाला होकर चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करे । रोगी के घर में बिना बुलाये प्रवेश न करे । तथा प्रवेश करते हुए निमित्तों को देखे । रोगी के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का अवलोकन न करे । रोगी के घर में स्त्रियों के साथ उपहास न करे । उनके द्वारा दी हुई पूजा (भेंट) को स्वीकार न करे । उचित ढंग से ही उनसे बातचीत करे । उनके साथ अत्यन्त व्यवहार तथा प्रीति न करे । पति के ज्ञान के बिना स्त्री से कोई वस्तु न ले । बिना ज्ञान के घर में प्रवेश न करे अर्थात् आगमन की सूचना दिये बिना रोगी के घर में प्रवेश न करे । स्त्रियों के साथ एकान्त में बातचीत न करे तथा उनके पास न बैठे । वस्त्रों से रहित अर्थात् नग्न अवस्था में उन्हें न देखे, न हंसे । यदि वह प्रीति करे तो उसकी उपेक्षा करे तथा उसके प्रति अपने भावों को प्रकट न करे । आतुरकुल की गुप्त (Private) बातों को बाहर प्रकाशित न करे । आतुरकुल के दोषों को न बढ़ाये । रोगी में अरिष्टलक्षणों का ज्ञान हो जाने पर भी रोगी से इस तत्त्व (वास्तविकता) का उल्लेख² न करें । उसे सदा आश्वासन देता रहे । मरणासन्न, असाध्य तथा उपकरण (धन आदि अथवा चिकित्सा के उपकरण) से रहित रोगी के पास न जाये तथा औषधक्रम (व्यवस्था) का उपदेश न करे । दूसरे के आधीन न रहे । स्वयं कृत्रिम ओषधि का प्रयोग न करे । शरीर, औषध, रोग तथा उम्र आदि की भिन्न २ अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करे । धूप, अञ्जन आदि ओषधियां पास में सदा तैयार रहनी चाहिये । दूसरे चिकित्सकों के साथ विरोध न करे अपितु उनके साथ मिलकर औषध व्यवस्था करे । अवसर उपस्थित होने पर सदा प्रगल्भ एवं निःशङ्क (सन्देह रहित) होकर अत्यन्त स्पष्ट, विचित्र, मृदु, उपनयवत् (नीतियुक्त), ग्रहण करने वाली, अविरुद्ध (जो परस्पर विरुद्ध न हो) तथा धर्मयुक्त वचन बोले । लोगों के कल्याण की कामना करने वाला वैद्य इहलोक तथा परलोक में सुखी होता है । चरक सू. अ. ८ में अत्यन्त विस्तार के साथ इन सब कर्तव्य कर्मों का निर्देश किया गया है ॥८॥
अथान्यो भिषगभि³षदेत्तस्मै क्षमेत, साम्ना चानुनयेत् । पुनः पुनः कुत्सयन्तं तु विगृह्यादितो ग्रन्थेनाऽवकिरेत्, न चास्य वाक्यावकाशं दद्यात् । ब्रुवतोऽपि प्रोक्तं च ब्रूयात्-नैतदेवमिति । परिहसेत्, अपशब्दांश्चास्य विगृह्णीयात्, अर्थे कृच्छ्रे चैनमवतारयेत्, न चैनमवशः परुषयेत्, स्तोत्रगभीरैर्वैनं धर्षयेदिति ।।९।। (इति ताडपत्रपुस्तके ७५ तमं पत्रम् )
१. कृतकं=कृत्रिमम् ।
२. आजकल कुछ लोग इस सिद्धान्त को मानने लगे हैं कि रोगी को रोग की वास्तविक्ता का ज्ञान अवश्य करा देना चाहिये जिससे वह अच्छीप्रकार परहेज तथा संयम से रह सके अन्यथा रोग की गम्भीरता का ज्ञान न होने पर वह उसकी उपेक्षा कर सकता है ।
३. अभ्यागच्छेदित्यर्थः ।