काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११९
सहवास करे। यदि वह कन्या की उत्पत्ति का इच्छुक है तो अयुग्म (पांचवीं, सातवीं, नवमी, इग्यारहवीं, तेरहवीं) रात्रियों में मैथुन करना चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—नारीमुपेयाद्रात्रौ सामादिभिरभिविश्वास्य। विकल्प्यैवं चतुर्थ्यां षष्ठयामष्टम्यां दशम्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः। एषूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च। प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ।। अतः परं पञ्चम्यां सप्तम्यां नवम्यानेकादश्यां च स्त्रीकामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः ॥६॥
अथ शुद्धस्नातां (ता) स्त्रियं (स्त्री) चतुर्थेऽहनि स्नानगृहे श्वेतेन एवाऽन्येन वाससाऽवगुण्ठ्यानवलोकयन्ती शुचिर्देवगृहं प्रविश्योद्धताग्नि१ प्रज्वलन्तं घृताक्षतेनाभ्यर्च्य ब्राह्मणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं च संप्रेक्ष्याभिवाद्य, निष्क्रम्य सूर्यचन्द्रमसाविति, न तु प्रेतपिशाचरक्षांसि; शुद्धस्नातमात्रा हि स्त्री यं वा पश्यति मनसा वाऽभिध्यायति तादृशाचारवपुषं प्रायेण जनयति; तस्माद्देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धाचार्यान् सन्तः पश्येत्, कल्याणमनाश्च स्यात्। न तु सन्ध्ययोः स्नानं मैथुनं वोपेयान्नान्यमना इति ॥७॥
इससे बाद स्नान आदि के द्वारा शुद्ध हुई स्त्री चौथे दिन स्नानगृह में अन्य श्वेत (शुभ्र) वस्त्र से अपने आपको ढककर इधर उधर न देखती हुई पवित्र मन से देवगृह (मन्दिर) में जाकर प्रज्वलित तथा हवन की हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत द्वारा अभ्यर्चना (पूजा) करके, ब्राह्मण, ईश्वर, विष्णु तथा स्कन्द को देखकर तथा उनका अभिवादन करके, सूर्य एवं चन्द्रमा को नमस्कार करे। वह प्रेत, पिशाच तथा राक्षस आदिकों को नमस्कार न करे। स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्री सबसे प्रथम जिसे देखती है अथवा जिसका ध्यान करती है उसी प्रकार के आचार एवं शरीर वाली सन्तान को उत्पन्न करती है। इसलिये सब से पहले वह स्त्री-देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध पुरुष (गुरुजन) तथा आचार्य का दर्शन करे एवं कल्याणयुक्त मन वाली रहे अर्थात् मन में सदा कल्याण की ही इच्छा करे। सन्ध्या काल में स्त्री स्नान तथा मैथुन न करे। तथा उसे अन्यमना (पति के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति में मन वाली) नहीं होना चाहिये। सुश्रुत शा. अ. २ में कहा है—पूर्व पश्येद् ऋतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना। तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥७॥
तत ऋत्विक् पुत्रीयामिष्टिं निर्वपेत्। सिद्धमांसौदना वातघ्नौ (?) वाऽऽज्यभागौ, यवमयः पुरोडा- शोऽष्टाकपालो, ब्रीहिमयरुः, उभौ वागायुर्युतौ प्रजायेते; नत्वदे ....... क्षे, 'आब्रह्मन्ब्राह्मण' इति यजमानभागमभिमन्त्र्य शेषं दम्पती प्राश्नीयाताम्। श्वेत ऋषभोऽश्वो वा हिरण्यं वा भिषजे सैव दक्षिणा, सैवमनाहिताग्नेः, शलाग्नौ नित्यं होमं हुत्वा, तेनैव मन्त्रेण हुतशेषं तौ प्रा (श्नीतः)। शयनीये मृदुस्वास्तीर्णोपहितेऽस्यै भर्ता .......... त्र लक्ष्मणामद्भिरालोड्य, 'सोमः पवत' इत्येतेन शतजप्तेन सावित्र्या व्याहृतिभिः 'अपो देवीरुपसृज' इति मन्त्रेण नस्यं दत्त्वा, वामदेव्यं जपित्वा, दक्षिणेन पार्श्वेन स्त्रियं शाययीत, वामपार्श्वेन पुमानूर्ध्वोत्तरेणोपशयीत्। शनैः प्रजार्थं चाचरेत्। बीजेऽवसिक्ते विधार्यावसर्फेत्। शीतोदकेन च शौचं कुर्यात्। तत ऊर्ध्वमग्निकर्मप्रतापायासव्यायामशोकादिवर्जनमिति ॥८॥
इसके बाद ऋत्विक् पुत्रीय इष्टि (पुत्रेष्टि यज्ञ) को करे। एतदर्थ आज्याहुति के निमित्त वातनाशक एवं सिद्ध किये हुए मांस और ओदन, आठ कपालों में संस्कृत होने वाला यव का बना हुआ पुरोडाश (पूड़ा-अपूप) तथा ब्रीहि के बने हुए चरु (हविविशेष) इत्यादि पदार्थों को तैयार करे। इससे वे दोनों (पति तथा पत्नी) वाणी और आयु से युक्त हो जाते हैं। फिर "ओं आब्रह्मन् ब्राह्मण" इत्यादि मन्त्र बोलकर उससे यजमान के भाग को अभिमन्त्रित करके शेष भाग की दम्पती (पति-पत्नी) खायें। अनाहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान नहीं किया है) वद्य को सफेद बैल, घोड़ा अथवा धन की
१. 'उद्वाहाग्निं' इति पाठश्चेत् साधु।