भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

१२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]


दक्षिणा देवे । तदनन्तर शालाग्नि (गार्हपत्य अग्नि) में आहुति डालकर उसी मन्त्र के द्वारा दोनों पति तथा पत्नी यज्ञशेष को खायें । इसके बाद पति मृदु तथा आस्तीर्ण युक्त बिछौने पर पत्नी को लिटाकर लक्ष्मणा (पुत्रदा-श्वेत कटेरी) नामक ओषधि को जल में घोलकर “सोमः पवत” इत्यादि मन्त्र को १०० वार जपकर सावित्री (गायत्री) मन्त्र की “भूर्भुवः स्वः महः” इत्यादि व्याहृतियों के द्वारा 'अपो देवीरुपसृज' इत्यादि मन्त्र से (लक्ष्मणा ओषधि का) नस्य देवे । तदनन्तर वामदेव (सामगान) को गाकर दाईं ओर स्त्री को लिटाये तथा बाईं ओर पुरुष लेटे । फिर ऊपर तथा नीचे की स्थिति में होकर लेट जायें और शनैः २ सन्तानोत्पत्ति के निमित्त आचरण करें अर्थात् मैथुन करें । चरक में भी पुत्रेष्टि का विधान दिया गया है । शारीर स्थान के आठवें अध्याय में कहा है—ततस्तस्या आशासानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्याः कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टं निर्वपेत विष्णुर्योनिं कल्पयतु” इत्यनया ऋचा । ततश्चैवाज्येन स्थालीपाकमभिधार्य त्रिजुहुयात्, यथाऽऽम्नायं चोपमन्त्रितमुदकपात्रं तस्यै दद्यात्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् । ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नीयात्, पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री, न चोच्छिष्टमवशेषयेत्; ततस्तौ सह संवसेतामष्टरात्रं तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, यथेष्टपुत्रं जनयेताम् ।

वक्तव्य—सन्तानोत्पत्ति के लिये मैथुन के समय पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना चाहिये । केवल मैथुन के आनन्द के लिए यद्यपि कामशास्त्र के अनुसार अनेक प्रकार के आसनों का प्रयोग किया जाता है तथापि उनका उद्देश्य केवल आनन्द मात्र ही है । सन्तानोत्पत्ति नहीं । सन्तानोत्पत्ति के लिये तो सर्वश्रेष्ठ आसन पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना ही है । इसीलिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—न च न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत, न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिदधाति गर्भाशयं, वामे पित्तं पार्श्वे तस्याः पीडितं विदहति रक्तशुक्रं, तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात्; तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठते दोषाः । बीज (शुक्र) के योनि में अवसिंचन हो जाने पर स्त्री को उसे धारण करके अलग सो जाना चाहिये । उसके बाद मैथुन के समाप्त हो जाने पर ठण्डे पानी से शुद्धि करनी चाहिये । ठण्डे पानी से योनि की मांसपेशियां सिकुड़ेंगी जिससे धारण किये हुए वीर्य की योनि में स्थिरता होकर गर्भोत्पत्ति की संभावना अधिक होगी । इसीलिये चरक में कहा है-‘पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत्’ इसकी व्याख्या में 'गङ्गाधर' ने लिखा है-एनां कृतकर्मणां स्त्रियं मैथुनश्रमोष्मप्रशमार्थं शोतोदकेन मुखनयनादिषु योनिषु च परिषिश्चेत्” । मुख, नेत्र तथा योनि में शीतल जल के छींटे देने चाहिये । इसके साथ ही चरक शा. अ. ८ में गर्भस्थापनकारक औषधियां दी हुई हैं, इनका सेवन किया जा सकता है। कहा है-अत ऊर्ध्वं गर्भस्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्रीब्राह्मीशतवीर्यासहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथाशिवा बलाऽरिष्टावाट्यपुष्पीविष्वक्सेनकान्ता च, आसामोषधीनां शिरसादक्षिणेन पाणिना धारणम्, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नानं, सदा समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयोगस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः, इति गर्भस्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति । इसके बाद अग्निकर्म (अग्नि के पास बैठकर कार्य आदि का अधिक करना), धूप, आयास (परिश्रम), व्यायाम तथा शोक आदि का त्याग कर देना चाहिये अर्थात् इनका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये । चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तस्मादहितानाहारविहारान् प्रयोजसम्पदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्जयेत्, साध्वाचारा चात्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहार विहाराभ्याम् ॥८॥

सा चेदिच्छेद् गौरमोजस्विनं शुचिमायुष्मन्तं पुत्रं जनयेयमिति, तस्या एवं शुद्धस्नानात् प्रभृति, शुक्लयवंसक्तूनां मधुघृताभ्यां श्वेतायाः श्वेतपुंवत्साया गोः क्षीरेण संसृज्य मन्थं राजते पात्रे कांस्ये वा सदा पाययेत्, शालिगौरयवक्षीरदधिघृतप्रायं च काले मात्रया अश्नीयात्, पुष्पाभरणवासांसि च शुक्लानि बिभृयात्, सायं प्रातश्च श्वेतमश्वं वृषभं वा पश्येत्, सौम्यहितप्रियकथाभिरासीत अनुकूलपरिवारा च स्यादिष्टमपत्यं जनयति । या तु श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं पुत्रमिच्छेत् कृष्णं वा तत्र तादृगुपचारो