भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२१

भोजनवसनकुसुमाल्याङ्काराणां, तादृग्देशानुचिन्तनं चेति। यवागूं तु कन्यार्थिनीभ्योदद्यात्; क्षीरोदकतिलसिद्धास्तु वर्ण्याः। गौरश्यामकृष्णोभ्योऽन्ये वर्णा निन्दिताः ।।९।।

यदि वह स्त्री गौरवर्ण, ओजस्वी, पवित्र तथा दीर्घायु पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसे स्नान द्वारा शुद्ध होने के पहले दिन से ही मधु तथा घृत (असमान मात्रा) सहित सफेद जौ के सतुओं से बनाये हुए मन्थ में श्वेत रंग की तथा जीवित श्वेत रंग के बछड़े वाली गौ का दूध मिलाकर चांदी अथवा कांसी के पात्र में सदा पिलाये। तथा यथासमय शालि, सफेद जौ, दूध, दही तथा घी मिलाकर मात्रा में सेवन करे। वह श्वेत पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करे, सायं तथा प्रातः काल श्वेत घोड़े तथा बैल का दर्शन करे। सौम्य, हितकारी तथा प्रिय कथाओं (बातचीत) से युक्त रहे अर्थात् उससे सौम्य तथा प्रिय बातचीत ही करनी चाहिये तथा उसके पास उसके मन के अनुकूल परिवार के व्यक्ति ही रहने चाहिये। इस प्रकार वह अभिलषित पुत्र को उत्पन्न करती है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिभ्यां संसृज्य श्वेताया गौः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत्पानाय, प्राप्ततश्च शालियवान्निकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमावदातशरणशयनासनयानवसनभूषणा च स्यात्, सायं प्रातश्च शश्वच्छ्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूल भिरुपासीत, सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्च स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुः, तया भर्ता, न च मिश्रीभावयापद्येयाताम्। जो स्त्री श्याम वर्ण के, लाल आखों वाले, विस्तृत एवं उन्नत छाती वाले अथवा कृष्ण वर्ण के पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसके लिये भी भोजन, वस्त्र, पुष्प तथा अलंकार आदिका उसी प्रकार का उपचार करना चाहिये तथा उसीप्रकार के देश (स्थान) का चिन्तन भी करना चाहिये। अर्थात् जिस वर्ण के पुत्र को चाहे उसी वर्ण के वस्त्र, अलंकार भोजन आदि होने चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्लाक्षं, शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम्, एष एवानयोरपिहोमविधिः, किन्तु परिबर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाऽऽशोः परिबर्होऽन्यकार्यः स्यात्। परिबर्ह (भोजन, पुष्प, आसन, बिछौना इत्यादि बाह्य वस्तुओं) को छोड़कर उसके लिये भी शेष होम आदि की वही पूर्वोक्त विधि ही है। इसके आगे स्त्री जैसे भी वर्ण के पुत्रों को चाहती हो उसके लिये चरक में विधान दिया गया है—या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां पुत्राशिषमनुनिशाम्य तांस्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत्, ताननुपरिक्रम्य या या येषां जनपदानां मनुष्याणामनुरूपं पुत्रमाशासीत सा सा तेषां तेषां जनपदानामाहारविहारोपचारपरिच्छादाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्; इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातं भवति। कन्या को चाहनेवाली स्त्री को यवागू देना चाहिये। सिद्ध किये हुए क्षीरोदक तथा तिल वर्ण्य (वर्ण को बढ़ाने वाले) होते हैं। गौर, श्याम तथा कृष्ण वर्णों से भिन्न वर्ण (रंग) निन्दित माने गये हैं ।।९।।

आहारश्चतुर्विधः, षड्रसाश्रयो, विंशतिविकल्पोगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसर-मृदुकठिनविशदपिच्छिलश्लक्ष्ण-खरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवविकल्पात्; तेन त्वगादयः शुक्रान्ता धातव आप्यायन्ते। तेषां समानं वर्धनमविरुद्धाशनम्। वातादीनां तु धातूनामन्ये धातवआप्यायिता (रो) भवन्ति; भुज्यमानं मांसं मांसस्य, शोणितं शोणितस्येति; तद्धर्मभयादनिष्टं, तद्गुणैस्तु शुचिभिराहारैः क्षीणधातूनाप्याययेत्। शुक्रक्षये क्षीरघृतोपयोगो मधुरस्निग्धजीवनानां चान्येषामपि द्रव्याणामविदाहिनां प्रशस्यते, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणतक्रगुडत्रपुसोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये यवान्नविकृतिकुल्माषमाषषष्टिकयावकगोरसाम्ललवणस्निग्धशाकोपयोगः, वातक्षये कटुतिक्त-