काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] |
|---|
कषायलघुरूक्षशीतयवान्नोपयोगः, पित्तक्षये कटुलवणाम्लतीक्ष्णोष्ण-क्षाराणां, कफक्षये स्निग्धमधुर-गुरुसान्द्रादीनाम् ।।१९०।। ...........................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ८५ पत्रम् १ ।)
आहार चार प्रकार का (पेय, लेह्य, भक्ष्य तथा भोज्य), होता है। यह मधुर आदि ६ रसों के आश्रित होता है तथा गुरु-लघु, शीत-उष्ण, स्निग्ध-रूक्ष, मन्द-तीक्ष्ण, स्थिर-सर, मृदु-कठिन, विशद-पिच्छिल, श्लक्ष्ण-खर, सूक्ष्म-स्थूल, सान्द्र-द्रव आदि विकल्पों (भेदों) से २० प्रकार का होता है। उस आहार से त्वचा से लेकर शुक्र पर्यन्त सम्पूर्ण धातुओं का पोषण होता है। समान गुण तथा समान गुण भूयिष्ठ द्रव्यों के सेवन से उनकी वृद्धि होती है परन्तु विरुद्धाशन नहीं होना चाहिये। वात आदि धातुओं को अन्य धातुऐं बढ़ाने वाली होती हैं। मांस का सेवन करने पर मांस धातु की वृद्धि होती है, शोणित का सेवन करने पर शोणित की वृद्धि होती है। परन्तु अधर्म के कारण इसका सेवन इष्ट (हितकर) नहीं माना जाता है। इसलिये उन्हीं धातुओं के गुण वाले अन्य पवित्र आहारों के द्वारा क्षीण हुई धातुओं को बढ़ाना चाहिये। शुक्र के क्षय में क्षीर एवं घृत का उपयोग तथा अन्य भी मधुर स्निग्ध एवं जीवनीय आदि अविदाही द्रव्यों का सेवन प्रशस्त माना जाता है। मूत्र के क्षय में ईख का रस, वारुणी, मण्ड, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, तक्र, गुड, त्रपुस आदि उपक्लेदी (शरीर को गीला रखने वाले) द्रव्य हितकर होते हैं। पुरीष के क्षय में यवान्न (यवकृतभक्त) विकृति, कुल्माष (कुलत्थ), माष (उड़द), षष्टिक (सांठी के चावल), यावक (यवागू), गोरस (गोदुग्ध आदि), अम्ल, लवण तथा स्निग्ध शाकों का प्रयोग करना चाहिये। वात के क्षय में कटु, तिक्त, कषाय, लघु, रूक्ष एवं शीत द्रव्य तथा यवान्न का, पित्त के क्षय में कटु, लवण, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण तथा क्षार द्रव्यों का और कफ के क्षय में स्निग्ध, मधुर, गुरु तथा सान्द्र आदि द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये।
**वक्तव्य—**आहार विहार आदि की समानता होने पर शारीर धातुओं में वृद्धि होती है। चरक सू. अ. १ में कहा है-सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। गुरु धातुएँ गुरु आहार-विहार से तथा लघु धातुएँ लघु आहार-विहार के सेवन से वृद्धि को प्राप्त होती हैं। इसीलिये चरक शा. अ. ६ में कहा है—‘‘एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद् ह्रासः, एतस्मान्मासमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यस्तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्जया, शुक्रं शुक्रेण गर्भस्त्वामगर्भेण’’। मांस के सेवन से अन्य धातुओं की अपेक्षा मांस अधिक बढ़ता हैं। रक्त से रक्त, मेद से मेद, वसा से वसा, तरुणास्थि से अस्थि, मज्जा से मज्जा, शुक्र से शुक्र तथा कच्चे गर्भ से गर्भ की वृद्धि होती है। परन्तु इस सामान्य नियम के अनुसार यदि किसी धातु की वृद्धि के लिये तत्समान धातु न मिल सके अथवा मिलने पर भी घृणा अथवा अन्य कारणों से उसका प्रयोग न किया जा सके तो उस अवस्था में उसके समान गुण वाले अन्य द्रव्यों का भी प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये शुक्र के क्षीण होने पर उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुसार उसकी सर्वश्रेष्ठ एवं आदर्श चिकित्सा में तो शुक्र का प्रयोग करना ही है इसीलिये नक्र के वीर्य अथवा बकरे के अण्डों (Testicles) का सेवन कराया जाता है। परन्तु घृणा के कारण यदि कोई व्यक्ति इसका सेवन न कर सके तो उसको शुक्र के गुणों के समान गुणवाले दूध एवं घी का प्रयोग कराना चाहिये। चरक शा. अ. ६ में उसका विस्तार से बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है—यत्रत्वेवं लक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणाम- सांनिध्यं स्यात् संनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वादप्रोपयोगे घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् तस्य ये समानगुणाः स्युराहार विकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनामप्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात्, तद्यथा-शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धसमाख्यातानां चापरेषामेव द्रव्याणां, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणो-
१. अस्याग्रे ताडपत्रपुस्तके ८६ तमं पत्रं त्रुटितम्।