काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् १२३
पक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्माण्डामध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णातीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणां, कर्माणि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यं, एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिक्षयौ यथाकालं कार्यौ, इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥१०॥ .......................................
यानि द्रव्याणि पुण्यानि मङ्गल्यानि शुचीनि च।
नवान्यभग्नखण्डानि पुन्नामानि प्रियाणि च॥
गर्भिण्यै तान्युपहरेद्वासांस्याभरणानि च। न स्त्रीनपुंसकाख्यानि धारयेद्वा लभेत वा ।।
गर्भिणी का आचार व्यवहार—पुण्यकारक, मङ्गलमय, पवित्र, नवीन, अभग्न तथा अखण्डित, पुरुष नाम वाले (अथवा पुल्लिंग) एवं प्रिय द्रव्य तथा वस्त्र आभरणादि गर्भिणी को देवे। स्त्री अथवा नपुंसक नाम अथवा लिङ्ग वाले द्रव्यों को गर्भिणी न धारण करे और न प्राप्त करे।
धूपितार्चितसंभृष्टं मशकाद्यपवर्जितम्। ब्रह्मघोषैः सवादित्रैर्वादितं वेश्म शस्यते ।।
(प्रातरुत्थाय) शौचान्ते गुरुदेवार्चने रता। अर्चेदादित्यमुद्यन्तं गन्धधूपार्घ्यवाजपैः ।।
क्षीयमाणं च शशिनमस्तं यान्तं च भास्करम्। न पश्येद्गर्भिणी नित्यं नाप्युभौ राहुदर्शने ।।
सोमार्कौ सग्रहौ श्रुत्वा गर्भिणी गर्भवेश्मनि। शान्तिहोमपराऽऽसीत मुक्तयोगं तु याचयेत् ।।
न द्विष्यादतिथिं भिक्षां दद्यान्न प्रतिवारयेत्। स्वयं प्रज्वालिते चाग्नौ शान्त्यर्थं जुहुयाद्धृतम् ।।
पूर्णकुम्भं घृतं माल्यं पूर्णपात्रं घृतं दधि। न किञ्चित् प्रतिरुन्धीयान्न च बध्नीत गर्भिणी ।।
सूत्रेण तनुना रज्ज्वा स्तम्भनं बन्धनानि च। वर्जयेद्गर्भिणी नित्यं कामं बन्धानि मोक्षयेत् ।।
गर्भिणी जिस घर में रहती हो उसमें सदा धूप जलानी चाहिये, पूजा होनी चाहिये, घर मच्छर आदि से रहित होना चाहिये तथा गाजे बाजों सहित घर में सदा गाना-बजाना होता रहना चाहिये। गर्भिणी को प्रातः उठकर शौच स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर गुरु तथा देवता की अर्चना करनी चाहिये तथा गन्ध, धूप, अर्घ्य (नैवेद्य) तथा जप आदि के द्वारा उदय होते हुए सूर्य की पूजा करनी चाहिये। गर्भिणी को चाहिये कि वह क्षीण होते हुए (कृष्ण पक्ष के) चन्द्रमा तथा अस्त होते हुए (सायंकालीन) सूर्य को न देखे तथा दोनों राहुओं (राहु तथा केतु) को भी न देखे। चन्द्र ग्रहण तथा सूर्यग्रहण का ज्ञान होने पर गर्भिणी को गर्भगृह में जाकर शान्ति होम आदि कार्यों में लगकर सूर्य तथा चन्द्रमा की ग्रह द्वारा मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिये। वह अतिथि से द्वेष न करे, उसे भिक्षा देवे, अतिथि को कभी खाली न लौटाये तथा स्वयं शान्ति के निमित्त प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति देवे। गर्भिणी स्त्री को जल से भरे हुए घड़े, घृत, माला, तथा घृत एवं दही से भरा हुआ पात्र इत्यादि किसी चीज का प्रतिरोध नहीं करना चाहिये। तथा गर्भिणी स्त्री को धागे अथवा पतली रस्सी आदि से स्तम्भन तथा बन्धन आदि नहीं बांधना चाहिये तथा उसे अपने सम्पूर्ण बन्धनों को ढीला रखना चाहिये। अर्थात् गर्भिणी स्त्री को कोई भी वस्त्र अथवा अन्य बन्धन आदि बहुत कस कर नहीं बांधना चाहिये।
अथ हीमानि रूपाणि गर्भिण्या उपलक्षयेत्।
यानिदृष्ट्वा विजानीयाद्गालजन्म(न्म)न्युपक्रमेत् (मम्) ।।
इसके बाद गर्भिणी के निम्न लक्षणों को देखकर यह जान ले कि अब बालक का जन्म होनेवाला है अर्थात् अब वह उपस्थित प्रसवा है॥
मुखग्लानिः क्लमोऽङ्गानामक्षिबन्धनमुक्तता। कुक्षेश्च स्यादवस्त्रंसस्त्वधोभागस्य गौरवम् ।।
पृष्ठपार्श्वकटीबस्तिवंक्षणं चातितुद्यति। योनिप्रस्रवणौदार्यभक्तद्वेषारतिक्लमाः ।।