भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 482
१२४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

उपस्थितप्रसवा के लक्षण—मुख की ग्लानि अथवा मुख का मुरझाना, अङ्गों का क्लम या शिथिलता, अक्षिबन्धन की शिथिलता, कुक्षि का शिथिल होना (उरोदेश से गर्भाशय के नीचे खिसक जाने से), अधोभाग (शरीर के निचले हिस्से) का भारी होना, पीठ, पार्श्व, कटि, बस्ति तथां वंक्षण (राननों) में अत्यन्त पीडा होना, योनिस्राव, उदारता, भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), अरति (अरुचि) तथा थकावट—ये उपस्थित, प्रसवा के लक्षण हैं। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति, तद्यथा—क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनं, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटिकुक्षिपाश्वपृष्ठनिस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति, ततोऽनन्तरभावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघना नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी॥ तथा इसके आगे फिर कहा है—तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटीपृष्ठं प्रति समन्ताद्वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिमूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च॥

एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । प्रविशेयुः स्त्रियो वृद्धाः कुशलाः शस्तधाविताः १ ॥

इन उपर्युक्त लक्षणों को देखकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर वृद्ध, कुशल, प्रशस्त तथा स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्रियां गर्भिणी के पास गर्भग्रह में प्रवेश करें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिः। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—प्रजनयिष्यमाणां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमारपरिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषिक्तामथैनां सम्भृतां यवागूमाकण्ठात् पाययेत्। ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णे शयने स्थितामाभुग्नसक्थीमुत्तानामशङ्कनीयाश्चतस्रः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुशलाः कर्तितनखाः परिचरेयुरिति॥

गर्भिणीं सान्त्वयेयुस्ता हर्षयेयुः प्रियंवदाः ।। आश्वासयेयुर्धर्मार्थों चोदयन्तं प्रजापतिम् ।। लोकान् पुत्रवतीनां च सुखानि विविधानि च । कीर्तयेयुरपुत्राणां दुःखानि निरयादिषु ।। अदितिं कश्यपं देवमिन्द्राणीमिन्द्रमश्विनौ । आयुष्मतां पुत्रवतां मङ्गल्यानां च कीर्तनम् ।।

प्रिय वचनों को बोलने वाली वे स्त्रियां धर्म और अर्थ के निमित्त प्रजापति ब्रह्मा को प्रेरित करती हुई गर्भिणी को सान्त्वना दें, उसे हर्षित (प्रसन्न) करें तथा उसे आश्वासन दें। उसके सामने पुत्रवती स्त्रियों के विविध सुखों तथा अपुत्रवती (पुत्र रहित) स्त्रियों के दुःखों का वर्णन करें। तथा उसके सामने अदिति और कश्यप देवता, इन्द्राणी, इन्द्रअश्विनीकुमार तथा अन्य आयुष्मान् पुत्रवान् तथा मङ्गलकारी देवताओं का कीर्तन करना चाहिए॥

तन्त्रीवर्णोऽल्पश२: स्त्रावः पिच्छिलः पुत्रजन्मनि । किंशुकोदकसंकाशः पुत्रिकाजन्म शंसति ।।

पुत्र की उत्पत्ति में स्त्री की योनि से गिलोय के रस के समान थोड़ा २ तथा चिपचिपा स्राव निकलता है। तथा कन्या (पुत्री) की उत्पत्ति में किंशुकोदक (पलाशढाक के फूल) के समान स्राव होता है॥

सूतेरूर्ध्वं तु ये स्त्रावा निन्दिताञ् शमयेत्तु तान् । तस्या अस्यामवस्थायामुपयाचेत देवताः ।।

प्रसव के बाद स्त्री की योनि से जो स्त्राव (Abnormal Dischargés) होते हैं, वे निन्दित माने गये हैं अतः उनको शान्त करे अर्थात् उनकी चिकित्सा करे। इस अवस्था में उसके लिये देवताओं से प्रार्थना करनी चाहिये॥


१. शस्ताः प्रशस्ताः, धाविताः शुद्धाश्चेत्यर्थः। २. गुडूची रस सदृश इत्यर्थः।