काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२५
अव्यावृते स्त्रिया गर्भे विवृते चापरामुखे¹ । ग्राहीषु² वर्तमानासु सा विवर्तेत गर्भिणी ।।
स्त्री के गर्भ के अव्यावृत (संकुचित) होने पर, जरायु के मुख के फैल जाने पर तथा ग्राही (प्रसववेदनाओं Labour Pains) के उपस्थित होने पर गर्भिणी को इसके लिये तैयार हो जाना चाहिये ।।
न तीक्ष्णं³ ग्राहिशूलेषु क्षिप्रं नारी प्रजायते । विलम्बिताभिरावीभिर्गर्भः क्लेशयते स्त्रियम् ।।
प्रसव वेदनाओं के तीक्ष्ण (तीव्र-Acute) हो जाने पर गर्भिणी को शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। परन्तु यदि प्रसव वेदनायें ठीक समय पर न होकर देर में हो तो गर्भिणी को अत्यन्त क्लेश होता है।
केचिदस्यामवस्थायां व्यायामं मुसलादिकम् । जृम्भाचङ्क्रमणायं च भिषजो ब्रुवते हितम् ।।
कुछ वैद्य इस अवस्था में अर्थात् प्रसव वेदनाओं के देर में होने पर कहते हैं कि गर्भिणी को मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई तथा इधर उधर चलना फिरना हितकारी है। अर्थात् इन क्रियाओं द्वारा शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदावीभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात् उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृह्णीष्वानेनतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिंजहि, मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व, चङ्क्रमस्व चान्तरान्तरा इत्येवमुपदिशन्त्येके ।।
वर्जनीयं तु तत् सर्वं भगवानाह कश्यपः । नार्याः प्रसवकाले हि शरीरमुपमृद्यते ।।
त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति विचाल्यन्ते च धातवः । गर्भिणी तदवस्था हि यत्नधार्या विशेषतः ।।
परन्तु भगवान् कश्यप कहते हैं कि मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई एवं चङ्क्रमण आदि सब क्रियाओं का त्याग करना चाहिये। अर्थात् प्रसव को शीघ्र करने के लिये उपर्युक्त क्रियाओं का प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रसवकाल के समय स्त्री का शरीर अत्यन्त मृदु होता है, वातपित्त कफ तीनों दोष प्रकुपित होते हैं तथा उस समय शरीर की सब धातुएं अपने स्थान से विचलित हुई होती हैं। गर्भिणी की वह अवस्था अत्यन्त यत्नपूर्वक धारण करने योग्य होती है।
अधिकं सौकुमार्यं हि गर्भिण्याः क्लेद्यमेव च । स्रावकाले विशेषेण विषादभयसंश्रयः ।।
एकपादो यमकुले पाद एक इह स्थितः । दृष्ट्वा दुःखं स्त्रियस्तस्या इत्येवं ब्रुवते मिथः ।।
उस समय गर्भिणी अत्यन्त सुकुमार होती है तथा उसमें क्लेद की वृद्धि हुई होती है। उपर्युक्त क्रियाओं से जब गर्भ का स्राव होता है उस समय विशेष विषाद तथा भय होता है। उस समय अन्य स्त्रियाँ उसके दुःख (कष्ट) को देखकर परस्पर कहती हैं कि इसका एक पैर यम के घर में तथा एक पैर इस लोक में है अर्थात् इसकी इस प्रसवावस्था में कभी भी मृत्यु हो सकती है ।।
तस्यास्त्वस्यामवस्थायां व्यायामो न प्रशस्यते । व्यायामः सेव्यमानो हि गर्भिणीमाशु नाशयेत् ।।
अतिचङ्क्रमणेनापि हन्याद्गर्भमुपस्थितम् । अत्ययं प्राप्नुयाद्घोरं देहान्तकरणं महत् ।।
इसलिये गर्भिणी की इस अवस्था में व्यायाम हितकर नहीं है। व्यायाम करने से गर्भिणी की मृत्यु हो सकती है। अतिचङ्क्रमण (अधिक इधर उधर घूमने) से भी उपस्थित गर्भ नष्ट हो जाता है। उस स्त्री को देह का अन्त करने वाले, महान् तथा भयंकर रोग हो जाते हैं। उपर्युक्त मूसल आदि के व्यवहार तथा चङ्क्रमण आदि क्रियाओं का चरक में भी निषेध किया गया है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तन्नेत्याह भगवानात्रेयः–दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामस्मीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा
१. अपरामुखे जरायुमुखे इत्यर्थः ।
२. 'आवीषु' इति पाठश्चेत् साधु ।
३. 'न तीक्ष्णं' इत्यत्र 'तीक्ष्णेषु' इति पाठश्चेत् साधु ।