काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् जातिसूत्रीयशरीराध्यायः ? ]
प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति ।।
उपविष्टाऽसकृत्तस्मादनिर्विण्णा(ऽ)त्रपान्विता । वृद्धस्त्रीद्रव्यसंपन्ना प्रजायेत प्रजार्थिनी ।।
इसलिये प्रसव की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह प्रसन्न मन वाली, लज्जा से रहित तथा वृद्धस्त्रियों एवं धन से युक्त हुई बार २ बैठी हुई प्रसव (प्रजननकार्य) को करे।
वचा लाङ्गलीकी कुष्ठं चिरबिल्वैलचित्रकाः । चूर्णितं मुख(हु)राजिघ्रेत्तथा शीघ्रं प्रजायते ।। आजिघ्रेद्भूर्जधूपं वा नमेरोगुग्गुलोस्तथा । अथ(धः) प्रपद्यते गर्भस्तथा क्षिप्रं विमुच्यते ।। पार्श्वसन्धिकटीपृष्ठं तैलेनोष्णेन प्रक्षितम् । मृद्नीयुरवकर्षेयुः शनैः प्राज्ञ्यः स्त्रियः सुखाः(खम्) ।।
चिरप्रसव की चिकित्सा अथवा उपाय—वचा, कलिहारी, कुष्ठ, चिरबिल्व (करञ्ज), छोटी इलायची तथा चित्रक का सूक्ष्म चूर्ण बार २ सूंघने के लिये देने से शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। अथवा भोजपत्र के धुएँ को या सरल देवदारु और गूगल के धुएँ को सूंघने से गर्भ शीघ्र ही नीचे की ओर आ जाता है तथा अपने स्थान से छूट जाता है। तथा बीच २ में निपुण स्त्रियां उसके पार्श्व, सन्धियां, कटी तथा पृष्ठ देश में धीरे २ सुखपूर्वक उष्ण तेल चुपड़कर मालिश करें तथा अवकर्षण करें अर्थात् गर्भ को नीचे लाने का प्रयत्न करें। चरक शा. अ. ८ में भी ये भी ही विधियां दी हैं-अथास्यै दद्यात्कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचा चित्रकचिरबिल्वचूर्णमुपाघ्रातुं, सा तन्मुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपाधूमं वा, तस्याश्चान्तरान्तरा कटीपार्श्वपृष्ठ सक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्नीयात्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ।।
दुर्बलां पाययेन्मद्यमित्येके, नेति कश्यपः । पूर्वक्लिष्टा तथैवास्या(ऽसौ)यवागूं तृषिता पिबेत् ।।
उपर्युक्त चिकित्साओं के अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि यदि वह दुर्बल हो तो उसे मद्य (Brandy) पिलाये, परन्तु भगवान् कश्यपं कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। क्लान्त एवं तृषित (प्यासी) होने पर उसे यवागू पीना चाहिये।
यदा गर्भोदकं योनौ सशूलं संप्रवर्तते । कालेन चोदितो गर्भो विमुच्य हृदयोदरम् ।। बस्तिशीर्षमधोभागमवगृह्णाति जन्मनि । ग्लानिश्च जायतेऽत्यर्थं योन्युत्पीडनभेदनम् ।। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्गर्भस्य परिवर्तनम् । अथास्याः प्रसवश्चेति ततः पर्यङ्कमारुहेत् ।। प्रावारमुपधानं वा ....................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ८७ तमं¹ पत्रम्² ।)
(शारीरस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)
जब शूल सहित गर्भोदक योनि में आ जाये तथा काल से प्रेरित हुआ गर्भ हृदय प्रदेश को छोड़कर नीचे आ जाता है, बस्तिशीर्ष तथा उसके अधोभाग को पकड़ लेता है, ग्लानि अत्यधिक होती है, योनि में उत्पीडन तथा भेदन (वेदना)
१. अस्मिंश्च पत्रे ताडपत्रीयपुस्तके आपाततो दर्शने २२ किल पत्राङ्काः प्रतिभान्ति, परन्त्रापूर्वापरग्रन्थसन्निकर्षौचित्येन ८७ तमत्रुटितपत्रस्थानीयत्वेनेदं निर्दिष्टम् । २. अस्याग्रे चतुष्पत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके ।