भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२७

अनुभव हो—तब इन उपर्युक्त लक्षणों से यह जाना जाता है कि गर्भ का नीचे की ओर परिवर्तन हो गया है तथा प्रसव होने वाला है। इस अवस्था में उस उपस्थितप्रसवा स्त्री को प्रावार (चादर) तथा उपधान (तकिया) लगे हुए पलंग पर लिटाकर—(प्रवाहण करना प्रारम्भ कराये)

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में कहा है—स यदा जानीयाद्विमुक्तं हृदयमुदरमस्यास्तवाविशति, बस्तिशिरोऽवगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामावयः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रामयेत्। यह अध्याय यहीं पर मध्य में ही खण्डित हो गया है। प्रकरण को देखते हुए कहा जा सकता है कि सम्भवतः इससे आगे इसमें प्रवाहण द्वारा गर्भ की उत्पत्ति (Delivery) अपरापातन तथा माता एवं शिशु के जातकर्म का उल्लेख किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन विषयों को अन्य ग्रन्थों के आधार पर संक्षेप से देते हैं। उपस्थित प्रसवा स्त्री के प्रवाहण के लिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः, या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्मभवति, प्रजा चास्याविकृतिमापन्ना श्वासकाशशोषप्लीहप्रसक्ता वा भवति, यथा हि क्षवथूद्गारवातमूत्र पुरीषवेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालाान्न लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा, यथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां सन्धारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तकालस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तरं बलवत्तरं, तस्यां च प्रवाहमाणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः ‘प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्रम्’ इति, तथाऽस्या हर्षेणाप्यायन्ते प्राणाः। जब उसे प्रसववेदनाएं हो रही हों उस समय उसे प्रवाहण करना चाहिये। जब वेदनाएं न हो रही हों उस समय प्रवाहण का कोई लाभ नहीं होता। इस प्रकार वेदनाओं के साथ २ धीरे २ प्रवाहण को भी बढ़ा देना चाहिये। इससे गर्भ विशेष कष्ट के बिना बाहर आ जाता है। अपरापातन—गर्भ के बाहर आने के बाद परिचारिकाओं का सबसे प्रथम कर्तव्य यह देखना है कि अपरा (Placenta) बाहर आई है या नहीं। प्रसव के ४० मिनिट के बाद तक भी वह यदि बाहर नहीं आई है तो उसे निम्न विधि से गिराने का प्रयत्न करें ! एक स्त्री प्रसूता के पेट की दीवार में से गर्भाशय को इसप्रकार पकड़े कि उसका अंगूठा सामने तथा अंगुलियां गर्भाशय के पीछे रहें। अब गर्भाशय के आकुञ्चन (Contraction) के समय गर्भाशय को सामने से पीछे तथा नीचे की ओर दबाये। आकुञ्चन के साथ ही यह क्रिया करनी चाहिये। इस विधि में गर्भाशय को पार्श्व से नहीं पकड़ना चाहिये। इससे अपरा बाहर आ जाती है। इस विधि को (Crede's method) कहते हैं। योनि में तैल का अनुवासन तथा आस्थापन बस्ति द्वारा भी वायु के अनुलोम हो जाने से वात मूत्र एवं पुरीष के साथ ही अपरा भी बाहर आ जाती है। शिशुपरिचर्या—इस अपरापातन के साथ २ दूसरी ओर सद्योजात शिशु का भी ध्यान रखना चाहिये। अपत्यमार्ग से आते हुए शिशु को बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं अतः बालक कुछ मूर्च्छित सा होता है तथा पूरा श्वास भी नहीं लेता रहता है। उत्पन्न होने के बाद शिशु स्वयं रोता है। यह रोना (Cry) उसके लिये बहुत अच्छा एवं आवश्यक होता है क्योंकि इस रोने के द्वारा वह प्रथम बार श्वास लेता है तथा उसके फुफ्फुसों (Lungs) में हवा जाती है। यदि बालक स्वयं न रोये तथा होश में न आये तो उसे होश में लाने तथा डराकर रुलाने का प्रयत्न किया जाता है। इसके लिये चरक में उसके कानों के पास पत्थर बजाने तथा काले रंग के छाज से हवा करने को लिखा है। कहा है—अश्मयोः संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतोदकेनोष्णोदकेन वा मुखे परिषेकः, तथा संक्लेशविहितान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनिष्पूणीपुर्यद्यच्चेष्टः स्यात् यावत्प्राणानां प्रत्यागमनम्। सद्योजात शिशु ऐसे स्थान से बाहर आता है जहां कि बाह्य वायुमण्डल का किसी प्रकार का संसर्ग नहीं होता। बाहर आकर वह अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करता है। जीवन की दृष्टि से उसका अब माता के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है। उसके जीवन को प्रारम्भ करने के लिये ही उपर्युक्त विधि से उसमें (Cry) उत्पन्न की जाती है। इसके साथ ही शिशु के गले में श्लेष्मा आदि फंसी हो तो उसे भी अंगुली में कपड़ा लपेट कर उससे साफ कर देना चाहिये जिससे श्वास प्रश्वास ठीक तरह से हो सके। जब यह निश्चित रूप से मालूम हो जाय कि शिशु जीवित है अर्थात् स्वतन्त्र रूप से वह श्वास प्रश्वास लेने लगा है तब नाभिच्छेदन करना चाहिये। नाभिच्छेदन—शिशु की उत्पत्ति के कुछ ही देर बाद

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