काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] |
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नाभिनाल (Umbilical cord) के स्पन्दन बन्द हो जाने पर नाभि से २ इञ्च तथा ३ इञ्च दूर—जो बन्धन लगाकर बीच में से नाभिनाल को काट देना चाहिये। ये बन्धन रक्तस्राव को रोकने के लिये लगाये जाते हैं। दूसरा बन्धन गर्भ में कहीं दूसरा शिशु (यमल-Twin) न हो—उसकी रक्षा के लिये सावधानी के रूप में लगाया जाता है। नाभिनाल को काटने से पूर्व उसके स्पन्दनों का बन्द हो जाना आवश्यक है। उसके बाद नाभि पर (Dusting powder) या कोई अन्य अवचूर्णन ओषध लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिये। इसके बाद उसकी आंखों की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। उन्हें अच्छी प्रकार Boric lotion से साफ करके उसमें १/२% Caustic की एक २ बूंद डाल देनी चाहिये क्योंकि यदि माता को कोई औपसर्गिक रोग हो तो उससे मुख्यरूप से शिशु की आंख में विकृति (Opthalmia Neonotorum) होने का डर रहता है। इन सब आवश्यक कार्यों को करके अब बच्चे को सुला देना चाहिये क्योंकि वह प्रसवजन्य श्रम के कारण पर्याप्त थका हुआ होता है। इनके अतिरिक्त शिशु को साधारण जीवन प्रारंभ करने से पूर्व अन्य भी कई उपद्रव होने का डर रहता है। इनकी ओर परिचारिकाओं को ध्यान देना आवश्यक है। नवजात शिशु में कई दिन तक उष्णता का नियन्त्रण ठीक तरह से नहीं होता है जिसके परिणामस्वरूप उनको सर्दी-जुकाम आदि (Exposure to cold) बहुत जल्दी होते हैं तथा यदि सावधानी न रखी जाय तो ये अत्यन्त घातक परिणाम तक उत्पन्न कर देते हैं। इसी प्रकार उष्णता का नियन्त्रण न होने से उनके तापमान में वृद्धि भी बहुत जल्दी हो जाती है। शिशु को दो चार दिन तक तो यदि तापमान में थोड़ी वृद्धि (१००°F तक) रहे तो उसे सामान्य अवस्था ही समझनी चाहिये परन्तु यदि बिना किसी विशेष कारण के लगातार तापमान में अधिक वृद्धि (१०३°F या इससे अधिक) रहे तो शरीर में द्रव की कमी समझनी चाहिये। शिशु के इस ज्वर को Dehydration fever कहते हैं। इस अवस्था में शिशु को आधी शक्ति वाला Normal saline Solution धीरे २ कई बार देना चाहिये जिससे यह ज्वर की अवस्था ठीक हो जाती है। दूसरा मुख्य उपद्रव शिशु को श्वासावरोध का होता है। यदि शिशु के गले की श्लेष्मा (Mucus) अच्छी तरह साफ होने पर भी नासिका (Nasal passages) में बाधा हो तो उसे श्वास लेने में कठिनाई होती है। यद्यपि वह मुख से श्वास ले सकता है तथापि शिशु को नासिका से श्वास लेने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है इसलिये उसका श्वासावरोध होने लगता है। Robert Hutchison ने अपनी पुस्तक Diseases of children में लिखा है—The new born baby has such an intense instinctive urge to breathe through the nose (Probably because breast feeding can only be accomplished if the nose is used for breathing) that it will go blue in the face, struggle Cry and even stop breathing altogether rather than breath easily through the mouth इस अवस्था में एक रबड़ कैथेटर (Catheter) नाक के द्वारा बालक के गले में डालकर मार्ग को साफ कर देना चाहिये। भोजन—साधारणतया प्रथम तीन दिनों तक माता के स्तनों में शुद्ध दूध नहीं होता है अपितु एक भारी तथा पीला सा द्रव होता है जिसे खीस (Collustrum) कहते हैं। यह भारी तथा विरेचक (Lexative) होता है। इसलिये प्रारंभ में यह दूध नहीं दिया जाता है। आयुर्वेद में इस समय मधु एवं घृत (असमान मात्रा में) चटाने को लिखा है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—‘‘ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम्, तद्यथा—मधुसर्पिषीमन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं-प्रथमं प्राशितुमस्मै दद्यात्। स्तनमत ऊर्ध्वम्’’। सुश्रुत शा. अ. १० में उस समय सुवर्ण प्राशन का विधान दिया है—‘‘अथ कुमारं शीताभिरद्भिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्ता ब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्’’। परन्तु इसके विपरीत कई चिकित्सक शिशु को उन दिनों भी माता का दूध देना ही पसन्द करते हैं। उनकी राय में वह खीस वाला दूध भारी होने पर भी विरेचक होने से शिशु के पेट को साफ कर देता है। आंतों में जो सूखा हुआ मल जिसे Muconium कहते हैं—एकत्रित होता है वह निकल जाता है। तथा स्तन को मुंह में देने से दूसरा लाभ यह होता है कि प्रत्यावर्तन क्रिया (Reflex action) द्वारा माता का गर्भाशय भी सिकुड़ता है जिससे गर्भाशय का स्त्राव (Lochia) निकलता रहता है। इसके बाद कुछ काल तक शिशु के तापमान, श्वास प्रश्वास गति, नाड़ीगति तथा मलमूत्र आदि का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। प्रारंभ में शिशु का तापमान कुछ अधिक (99.8°F. के लगभग) रहता है परन्तु