काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १२९ |
|---|
कुछ ही समय में घटकर यह 98.8.°F. हो जाता है। यदि चार दिन तक शिशु का तापमान 100°F. या इससे अधिक रहे तो ध्यान पूर्वक इसका कारण मालूम करने का प्रयत्न करना चाहिये। शिशु की श्वासगति ३०-६० तक तथा नाडीगति १४०-१५० तक रहती है। शिशु का भार (तौल) तथा ऊँचाई आदि भी उसके स्वास्थ्य की निश्चित पहचान है। उत्पत्ति के समय शिशु का भार लगभग ६ से ८ पौण्ड होता है। प्रारंभ के दो तीन दिनों में यह भार थोड़ा सा घटता है परन्तु सप्ताह भर बाद यह फिर बढ़ जाता है तथा आगे नियमपूर्वक बढ़ता रहता है। शिशु के भार में यदि प्रतिसप्ताह वृद्धि न हो तो उसका कारण ढूंढ़ना चाहिये। प्रथम ३ मास तक शिशु का भार ७ औंस प्रति सप्ताह बढ़ता है। जन्म के समय उसकी लम्बाई लगभग १९-१/२ इञ्च होती है। शिशु के लिये सबसे आवश्यक उसका भोजन (माता का दूध) तथा निद्रा है। नियमित समय पर शिशु को स्तनपान कराना चाहिये। शिशु जब रोये तब ही मुंह में स्तन दे देने की प्रथा अच्छी नहीं है। एतदर्थ इसे चम्मच भर पानी अथवा अजवायन के अर्क में मधु मिलाकर दिया जा सकता है। अधिक दूध से बालक को अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि उपद्रव हो जाते हैं अतः दूध देने का समय निश्चित होना चाहिये। यदि माता का दूध न हो तो यथोक्त गुण वाला धात्री का दूध या कृत्रिम दूध भी आवश्यकतानुसार दिया जा सकता है। शिशु को दूध कितना, कितने अन्तर से तथा कब देना चाहिये इसके लिये निम्न तालिका है—
| आयु | अन्तर | रात्रि | मात्रा |
|---|---|---|---|
| १ म सप्ताह | २ घण्टे | २ बार | १-१-१/२ औंस |
| २ से ३ सप्ताह | ,, | ,, | १-१/२-३ ,, |
| ४ से ५ सप्ताह | ,, | १ बार | २-१/२-३-१/२ ,, |
| ६ से १२ सप्ताह | २-१/२ घण्टे | ,, | ३-४-१/२ ,, |
| ३ से ५ मास | ३ ,, | ,, | ४-५-१/२ ,, |
| ५ से ९ ,, | ,, ,, | Nil | ५-१/२-७ ,, |
| ९ से १२ ,, | ३-१/२ ,, | ,, | ७-१/२-९ ,, |
निन्द्रा—शिशु अपना अधिक समय सोने में बिताता है। प्रारंभ में वह २१ घण्टे सोता है तथा धीरे २ कम करते हुये ६ मास के बाद यह १४-१६ घण्टे पर पहुंच जाता है। नींद के लिये बालक को अफीम आदि का प्रयोग कराना कभी अच्छा नहीं होता है। शिशु के साथ २ माता के स्वस्थवृत्त का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। इस समय माता के शरीर में वायु की वृद्धि हुई होती है। इसलिये उसे भोजन में लघु आहार तथा सात्म्यानुसार घृत आदि किसी स्नेह में पञ्चकोल चूर्ण मिलाकर देना चाहिये अथवा ५-७ दिन तक लगातार दशमूल के क्वाथ में घृत अथवा एरण्ड तेल की योग्य मात्रा मिलाकर दोनों समय पीने को देनी चाहिये। इससे प्रकुपित हुआ वायु शान्त हो जाता है तथा विकार नहीं हो पाते हैं। फिर क्रमशः पुष्टिकारक आहार देकर उसके शरीर को पुष्ट कर दें। माता को २-४ दिन साधारण सा ज्वर हो जाना स्वाभाविक है जो उपर्युक्त उपचार से ठीक हो जाता है परन्तु यदि ज्वर अधिक दिन तक लगातार बना रहे तो उसे प्रसूति ज्वर (Perpual Fever) समझ कर प्रमाद रहित होकर सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये। दस दिन बाद बालक का नामकरण संस्कार किया जाता है। चरक तथा सुश्रुत में बालक के दो नाम रखने को लिखा है। (१) नक्षत्र नाम—अर्थात् जिस नक्षत्र में बालक उत्पन्न हुआ है उसके अनुसार तथा (२) अभीष्ट नाम। सुश्रुत शा. अ. १० में कहा भी है—'ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुकौ स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेतं नक्षत्र नाम वा। इसके बाद चरक तथा सुश्रुत में शिशु के वस्त्र, आभूषण, मणिधारण तथा खिलौने आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है यह सब पाठकों को वहीं से देखना चाहिये॥