काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चममिन्द्रियस्थानम्
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ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः ।
(अथात ओषधभेषजीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ।।१।।)
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम औषधभेषजीय इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में औषध तथा भेषजरूप चिकित्सा संबन्धी इन्द्रियों (अरिष्ट लक्षणों) का वर्णन किया जायगा।
वक्तव्य—इस इन्द्रिय स्थान का केवल यही (अन्तिम) अध्याय ही उपलब्ध हुआ है। इससे पूर्व के सब अध्याय खण्डित हैं। इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान इसलिये रखा गया है कि इसमें इन्द्र (जीवात्मा) के ज्ञापक लिङ्ग (लक्षण) दिये गये हैं। इन्द्र जीवात्मा को कहते हैं। जीवात्मा के अन्य बहुत से ज्ञापक लिङ्गों में ‘मृत्यु होना’ मुख्य लिङ्ग है। इस स्थान में मृत्यु के निदर्शक चिह्न दिये गये हैं अर्थात् जिन्हें देखकर वैद्य यह जान सके कि रोग असाध्य है तथा रोगी की मृत्यु होने वाली है—उन २ लक्षणों, पूर्वरूपों, भावों तथा अवस्थाओं का इस स्थान में समावेश किया गया है। इसी लिये इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान है। मृत्यु के निदर्शक चिह्नों को रिष्ट या अरिष्ट भी कहते हैं। कहा भी है—रोगिणो मरणं यस्मादवश्यं भावि लक्ष्यते। तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।। चिकित्सा से पूर्व इन अरिष्ट लक्षणों का जानना आवश्यक है। रोगों की साध्यासाध्यता का विचार करके ही चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये क्योंकि मरणासन्न, असाध्य अथवा गतायुष रोगी की चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत अपनी प्रतिष्ठा की ही हानि होती है। इसी लिये सुश्रुत सू. अ. २९ में कहा है—असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः। अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ।। इसीलिये चिकित्सा से पूर्व इन्द्रियस्थान दिया गया है। चरक संहिता में भी इसी दृष्टि से चिकित्सास्थान से पूर्व इन्द्रिय स्थान दिया गया है ।।१-२।।
ओषधं भेषजं प्रोक्तं द्विप्रकारं चिकित्सितम्। तयोर्विशेषं वक्ष्यामि भेषजौषधयोर्द्वयोः ।।३।।
चिकित्सा दो प्रकार की कही है (१) ओषध चिकित्सा। (२) भेषज चिकित्सा। अब मैं ओषध तथा भेषज दोनों के अन्तर-भेद को कहता हूँ ।।३।।
ओषधं द्रव्यसंयोगं ब्रुवते दीपनादिकम्। हुतव्रततपोदानं शान्तिकर्म च भेषजम् ।।४।।
औषध तथा भेषज का अन्तर-दीपन आदि द्रव्यों के संयोग से जो चिकित्सा की जाती है उसे औषध कहते हैं तथा होम, व्रत, तप, दान एवं शान्ति कर्म आदि को भेषज कहते हैं ।।
उभयं तद्यदा जन्तोः कृतं न कुरुते गुणम्। क्षीणायुरिति सं(तं)ज्ञात्वा न चिकित्सेद्विचक्षणः ।।५।।
इन दोनों चिकित्साओं द्वारा चिकित्सा किये जाने पर भी यदि रोगी को लाभ न हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे क्षीणायु